चाचा ने चूत में लंड का भोग लगाया-3

Chacha ne choot me land ka bhog lagaya-3

फिर उसके छू जाने की वजह से मेरे पूरे बदन में एक अजीब सा करंट फैल गया और मैंने महसूस किया कि चाचा भी उस वजह से एकदम घबरा गये थे और उनका जिस्म अचानक से अकड़ गया, लेकिन उनका हाथ अभी तक भी एकदम स्थिर था और ना वो मेरी जांघो से अपने हाथ को बाहर निकाल रहे थे और ना ही वो उसको बिल्कुल भी हिला रहे थे, लेकिन दोस्तों उनका चेहरा मेरे चेहरे से इतने करीब था कि उनके मोटे मोटे गाल और गुलाबी होंठ उनका सुंदर चेहरा और एकदम चमकीली नशीली आँखें एकदम पास थी, इतना पास कि उनकी गरम गरम सांसे मेरे चेहरे तक को छूकर मुझे महसूस हो रही थी जिसकी वजह से अब मेरा दिल कर रहा था कि में उनके होंठो पर अपने होंठ लगाकर उनको चूस लूँ और मेरे मन में इच्छा हो रही थी कि वो अपना हाथ अब धीरे से आगे बढ़ाते हुए मेरी जांघो के बीच से मेरी पेंटी में डाल दे.

फिर उतने में दूसरी तरफ से मेरे पापा की आवाज़ आई और वो बोली कि अरे भाई इधर आओ और हमें अपना पूरा घर दिखाओ और उसी समय चाचा जी उनकी आवाज को सुनकर होश में आकर हड़बड़ाकर उठे और मुझे अपनी गोद से खड़ा करके वो उस समय दूसरे कमरे में मेरी मम्मी, पापा के पास चले गये और वो उनको अपना घर दिखाने लगे और अब में भी अपनी नींद से जागकर उस सपने के बारे में सोचने लगी जो कुछ देर पहले मैंने अपनी खुली हुई आखों से अपने चाचा की गोद में बैठकर देखा था. उसको सोच सोचकर में पागल हो चुकी थी और यह वही घटना थी जिसके बाद मेरी सोच एकदम बदल गई और मुझे मेरे अंदर बहुत सारा परिवर्तन महसूस हुआ.

फिर एक दो दिन तक ऐसा कुछ नहीं हुआ और हम सभी लोग अपने अपने काम में लग गये, मुझे अब उस दिन के बाद से मेरे चाचा जी बहुत ही सुंदर लगने लगे थे और में हमेशा उनको दूसरी नजर से देखने लगी थी और मैंने उनको बहुत बार उस नज़र से मुझे देखते हुआ पाया और मेरा बड़ा दिल था कि उनके पूरे बदन को देखने का और उन्हे अपना हर एक अंग अंग दिखाने का. फिर एक दिन सुबह सुबह जब घर के सभी लोग सोए हुए थे तो मुझे उनके चलने की आवाज़ आई वो और उस समयी टॉयलेट की तरफ जा रहे थे और उन्होंने उस समय आधी बांह की बनियान और नीचे सफेद रंग का नाड़े वाला पजामा पहन रखा था.

फिर में उस समय उठकर एक सेकिंड रुककर अपनी दोनों आखों को अपने हाथों से रगड़ती हुई जैसे कि में भी नींद में हूँ ऐसा नाटक करते हुए में बाथरूम में चली गई.

फिर मैंने देखा कि उस समय मेरे चाचा जी खड़े होकर पेशाब कर रहे थे, लेकिन वो मुझे अंदर आता हुआ देखकर एकदम से चकित हो गए थे और उनकी दोनों चकित आखें उस समय मेरे चेहरे पर ही टिकी हुई थी और मेरी नजर नीचे उनके लंड पर थी और उन्होंने एक हाथ से अपने गोरे लंड को पकड़कर उसकी चमड़ी को पीछे कर रखा था और उनके हल्के गुलाबी रंग के टोपे से पेशाब की घार निकल रही थी.

में उधर घूरती रही और मेरे चाचा जी उस समय मुझे एकदम सहमे हुए से लगे और उनकी एक नज़र दरवाजे पर थी और वो डर रहे थे कि उस वक्त अगर कोई और इधर आ गया तो क्या सोचेगा? फिर किसी को ना आते देख चाचा जी ने एक दो बार अपना लंड झटका और पज़ामे में वापस उसको अंदर डालकर नाड़ा लगा लिया, वो जाते जाते मेरी मुस्कुराए और वो कहने लगे कि माफ़ करना, मुझे अंदर से दरवाजे को बंद कर लेना चाहिए था.

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मैंने भी मुस्कुराते हुए कहा कि कोई बात नहीं है चाचा जी ऐसा कभी कभी गलती से हो जाता है और मुझे भी आने से पहले दरवाजे को खटखटाकर अंदर आना चाहिए था. इसमे गलती तो कुछ मेरी तरफ से भी है, लेकिन यह सब जैसा भी था बहुत अच्छा था और वो मेरा जवाब सुनकर अपने कमरे में चले गये और फिर क्या था?

में भी बाथरूम से कुछ देर बाद बाहर निकलकर करीब 30 मिनट तक अपने बेड पर उस मनमोहक द्रश्य को याद कर करके अपने आप से खेलती रही और अपने शरीर में उस द्रश्य की वजह से पैदा हुई उस गरमी उस अजीब सी हलचल को महसूस करने लगी थी, जिसकी वजह से में उस दिन बहुत खुश थी और वैसे अभी स्कूल शुरू होने में थोड़ा वक्त था, मतलब कुछ महीनों तक मुझे घर में ही रहना था.

अब मेरे पापा मम्मी हर दिन सुबह से उठकर हमारे लिए कोई दूसरा घर ढूंढने बाहर निलने पड़ते थे और कभी कभी तो उनके साथ मेरी चाची भी चली जाती थी, जिसकी वजह से में चाचा के साथ घर में बिल्कुल अकेली रहने लगी थी और उस दिन भी में घर पर बिल्कुल अकेली अपने कमरे में पलंग पर लेटी हुई थी और अकेली होने की वजह से में अपना समय बिताने के लिए एक कॉमिक्स पढ़ रही थी. में उसको पढ़ने के बहुत व्यस्त थी क्योंकि मुझे उसकी कहानी बहुत अच्छी लग रही थी और में उसके मज़े लेती रही.

कुछ देर बाद अचानक से चाचा मेरे कमरे में आ गए उस समय में पेट के बल लेटी हुई थी और मेरे दोनों पैर दरवाजे की तरफ थे और मेरी स्कर्ट को मैंने खुद ही जानबूझ कर थोड़ी सी ऊपर कर रखी थी कि जिससे मेरी जांघे पेंटी की लाइन तक भी साफ दिखे, लेकिन मेरे लिए मेरा क्या क्या कितना अंग दिख रहा था यह बताना बहुत मुश्किल था, क्योंकि में पीछे मुड़कर अपने पीछे का खुला हुआ वो मनमोहक द्रश्य नहीं देख सकती थी, लेकिन मुझे यह तो बहुत अच्छी तरह से मालूम था कि चाचा जी दरवाजे पर दो चार मिनिट तक तो खड़े होकर मुझे अपनी चकित नजरों से ताकते रहे और मेरी गोरी जांघे कूल्हों को वो देखकर उनके मज़े लेते रहे जो उनके लिए बहुत अच्छा और कभी कभी दिखने वाला द्रश्य था. अब वो मेरे पास आकर मुझसे पूछने लगे कि तुम पूरा दिन कॉमिक्स ही पढ़ती हो या कोई स्कूल की किताब भी अपने साथ में लेकर आई हो जो जीवन में आगे जाकर तुम्हारे बहुत काम आने वाली है? वैसे में गणित में बहुत पक्का हूँ और मुझे उसमे बहुत कुछ आता है वो विषय मुझे सबसे अच्छा लगता है, तुम्हे अगर मुझसे कोई भी मदद चाहिए तो मुझे जरुर बता देना?

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