फिर सुबह होगी-1

Fir Subah Hogi-1

लेखिका : शमीम बानो कुरेशी

“कल सुबह सुबह तो तू मुम्बई जा रहा है ना अब्दुल?”

“हाँ बानो, बस जाने से पहले एक बार मेरी मुठ्ठ मार दे, तो मजा आ जाये !”

“भोसड़ी के, चोद ही ले ना एक बार?”

“उह्… नहीं बस मुठ्ठी मार दे एक बार जम कर, लण्ड का सारा कस बल निकल जाये !”

“तू भी भेन चोद ! एकदम चूतिया है, चिकनी चूत सामने धरी है फिर भी… खैर चल उतार अपनी जीन्स !”

अब्दुल खुश हो गया। उसने जल्दी से अपनी जीन्स उतारी और नंगा होकर मेरे सामने खड़ा हो गया। उसका झूलता हुआ लण्ड देख कर मैंने कहा,”यह तो मरदूद सोया पड़ा है, गाण्डू इसको जगा पहले, तेरे सामने बानो खड़ी है फिर भी तेरा लौड़ा …? धत्त यार …!”

“अरे तो चूस कर खड़ा कर दे ना?”

मैंने ज्योंही उसे छुआ, जादू का सा असर हुआ, वो सख्त होने लगा। उसे इधर उधर हिला हिल कर मैंने उसे लोहे जैसा कठोर कर दिया। फिर मैंने अपनी सलवार कुर्ती उतार दी और नंगी हो गई। मैंने उसका हाथ लेकर चूत की तरफ़ दबा दिया।

“चल भीतर अंगुली घुसेड़ दे और मुझे मस्त कर दे !” फिर मैंने उसके लण्ड को सहलाया। थोड़ा सा उस पर तेल लगाकर चिकना किया और उसके लण्ड पर ऊपर नीचे करने लगी। उसकी दो अंगुलियाँ मेरी चूत में फ़ंस चुकी थी। धीरे धीरे हम एक दूसरे पर हाथ चलाते रहे। मुझे तो बहुत मस्ती आने लगी। अब्दुल के मुख से भी सिसकारियाँ निकलने लगी। उसके लण्ड का सुपाड़े पर चमड़ी आर पार फ़िसल रही थी। उसका सुपाड़ा बार बार चमड़ी में से अपनी झलक दिखा रहा था। फिर मैंने उसकी सुपाड़े की चमड़ी को पूरी पीछे ही खींच कर उसे बाहर निकाल दिया। मेरी मुठ्ठी उसके लण्ड पर कसती गई और उसका डण्डा मसलने लगी। वो मस्ती से हाय हाय करने लगा।

“और जोर से मेरी बानो… मजा आ गया!”

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“ले भोसड़ी के, मस्त हो जा … ” और मैंने उसकी गाण्ड में एक अंगुली भी डाल दी। वो मस्ती से झूम उठा।

“हाय बानो, गाण्ड मार के मुठ्ठ मरवाने में गजब का मजा है … ले कर ना जोर जोर से !”

मेरा हाथ जोर जोर से चलने लगा। उसने मेरी चूत से अंगुली जाने कब बाहर निकाल दी। मैं तो तन्मयता से उसकी मुठ्ठ मार रही थी। तभी उसकी धार जैसी पिचकारी जोर से निकल पड़ी और साले ने मेरा चेहरा पूरा भिगा दिया। फिर भी जहाँ तक हो सका मैंने जल्दी से उसका वीर्य चाट लिया। उसका सारा कस बल निकल गया था। वो खड़ा खड़ा हांफ़ रहा था। उसने मुझे चूमा और बाय बाय कह कर चला गया। मेरी चूत साली प्यासी ही रह गई।

अब्दुल मुम्बई जा चुका था। मेरे दूसरे दोस्त जो मुझे बड़े प्यार से चोदा करते थे अनवर, युसुफ़ वगैरह तो पहले ही मुम्बई जा चुके जा थे। अब मेरा आशिक यहाँ पर अब कोई नहीं था। दिन पर दिन गुजरते गये। इन्हीं दिनों मेरी मौसी का लड़का आमिर मोहम्म्द मेरे यहाँ किसी काम से दिल्ली से आया। मेरा गेस्ट रूम, वही ऊपर का कमरा, जहा मैं अपने यारों से चुदवाया करती थी, उसे ठहरा दिया।

मेरी चूत कई दिनो से प्यासी थी, सारा शरीर कसमसाता था। रातों को मैं अंगुली किये बिना नहीं रह पाती थी बल्कि यूं कहिये कि बिना झड़े नींद ही नहीं आती थी। दिल में आग सी लग जाती थी और फिर इस आमिर ने तो जैसे आग में घी का काम किया। जवान था, कड़क चिकना था साला। लण्ड भी मस्त ही होगा। रोज मैं उसे ऊपर से नीचे तक निहारा करती थी। वो मुझे भा गया था। वो मेरे दोस्तों से जुदा था। भोला भाला सा लड़का मेरे दिल में उतरता चला गया। वो तो कई बार मेरी निगाहों को देख कर सिहर उठता था, झेंप भी जाता था। मेरी गालियों से वो डरता भी था। पर कुछ समझ नहीं पाता था। पर मैं तो उसकी बहन जो ठहरी, बहन जैसी थी ना… बस उसे यही समझ में आ रहा था।

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रात को उसकी याद में मैं अपने दोनों पैरों को आपस में रगड़ लेती थी। अपनी गेंदों को दबाने लगती थी। चूत को धीरे धीरे सहलाने के बाद अंगुली डाल लेती थी। हाय राम ! अब इस साण्ड को कैसे कब्जे में करूँ?

मैंने अब उसके कमरे के चक्कर लगाने शुरु कर दिये। मैंने जबरदस्ती ही उससे बातें करनी शुरू कर दी थी। उसे जब तब मैं बनारस घुमाने ले जाया करती।

“बानो आपा, आप इतनी गालियाँ क्यूँ देती हैं?”

“ओह, बुरा मत मानो आमिर, यह तो मेरी आदत है, अब्बू से सीख लिया था। मेरी अम्मी भी तो देखा नहीं कैसी कैसी गालियाँ देती है।”

“ना ना, मेरा मतलब यह नहीं था, तुम्हारे मुख से गालियाँ सुनने पर मन में कुछ होने लगता है !”

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“क्यूं भोसड़ी के, लण्ड खड़ा होने लगता है क्या?” फिर कह कर मैं खुद ही झेंप गई। अम्मा रे मेरे मुँह से यह क्या निकल गया।

“पता नहीं, कुछ दिल में गुदगुदी सी उठ जाती है … जैसे अभी हुई थी !”

मुझे मौका सही जान पड़ा। साला मुझे ही चला रहा है, जाल डालने का सही मौका था।

“हूं…… जी, दिल में गुदगुदी तो तब ही उठती है ना जब यह मादरचोद लण्ड सर उठाने लगता है?” मैंने उसे और सेक्सी बनाने की कोशिश की।

“बानो, सच कहूँ तो सही बात है, तेरी बातों से लण्ड खड़ा होने लगता है !” उसने भी अब एक कदम आगे बढ़ाया।

मैंने अब सही वक्त जाना और उसके लण्ड पर हाथ रख दिया।

“यह तो भड़वा कड़क हो रहा है?”

“अरे छोड़ ना … कोई देख लेगा !”

मैं हंस दी और लण्ड को थोड़ा सा और दबा कर उसे छोड़ दिया।

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“साला मस्त हो रहा था तेरा लौड़ा तो?”

“बानो … बाप रे ! तू तो क्या लड़की है … तुझे तो शरम भी नहीं आती है… यह सब ही करना था तो घर पर कर लेती ना? यहाँ बाजार में……? तू तो मरवायेगी मुझे !”

मैंने तो उसका लण्ड पकड़ कर जैसे मैदान ही मार लिया था। अब तो बस उसे निचोड़ना ही बाकी रह गया था। मैं बाजार में पूरे समय खुश ही होती रही। मेरा दिल बाग-बाग हो रहा था। बस अब चुदना ही बाकी था, जिसका मुझे बेसब्री से इन्तजार था।

शाम को भोजन के पश्चात, वो मुझे धीरे से बोला, “ऊपर कमरे में आयेगी क्या, बातें करेंगे।”

“जा रे भड़वे, बात क्या करनी है, अपनी मुठ मार और सो जाना !”

वो हंस दिया और अपने कमरे में ऊपर चला गया। मैंने भी सोचा कि साले हरामजादे को आज तो तड़पने दो, कल खुद ही अपना लण्ड उठा कर दौड़ा चला आयेगा। मैं जाकर अपने बिस्तर पर लेट गई। पर मन मतवाला फिर भटकने लगा। लण्ड सामने है और आज नहीं ले सकती। हाय, जालिम ये लड़के इतना तड़पाते क्यूँ हैं… आकर चोद क्यों नहीं देते। मैं बिस्तर पर बल खाती रही, तड़पती रही, फिर नींद की झपकियाँ आने लगी।

तभी मेरी नींद एकदम से उड़ गई। आमिर मेरी बगल में आकर चुप से लेट गया था। मैंने थोड़ा सा खिसक कर उसे जगह ठीक से दे दी।

“भेन के लण्ड, इतनी रात को यहाँ क्यूँ आ गया?” मन ही मन मैं खुश होती हुई बोली।

“बानो तेरे बिना नींद नींद नहीं आ रही थी !” उसका कसकती आवाज में जवाब आया।

कहानी जारी है……

 

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