गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा-21

Gendamal halwai ka chudakkad kunba-21

राजू नदी की तरफ बढ़ रहा था।
आज उसके चेहरे पर अलग ही मुस्कान थी, वो अपनी ही धुन में नदी की तरफ बढ़ रहा था, थोड़ी दूर चलने पर अचानक से उसका ध्यान किसी लड़की के हँसने की आवाज़ की ओर गया।

उसे ये आवाज़ कुछ जानी-पहचानी सी लगी, एक पल के राजू के कदम मानो जैसे रुक गए हों।

गन्ने के खेतों के बीच दो लड़कियों के हँसने की आवाज़ आ रही थी, थोड़ी देर बाद वो आवाज़ नज़दीक आने लगी और एकाएक चमेली की बेटी रज्जो, अपने पड़ोस में रहने वाली लड़की के साथ खेत से बाहर आई, दोनों की नजरें आपस में टकरा गईं।

राजू को देखते ही रज्जो के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई।

बदले में राजू ने भी उसकी तरफ मुस्करा कर देखा, तो रज्जो ने शर्मा कर अपने सर को झुका लिया और आगे बढ़ने लगी।

शौच के बाद जब राजू घर पहुँचा तो आज उसे ऐसा लग रहा था, जैसे वो इस आलीशान घर का नौकर ना होकर मालिक हो।

जब वो घर पहुँचा तो कुसुम रसोई में खाना बना रही थी।

कुसुम को खाना बनाते देख राजू ने कुसुम से पूछा।

राजू- मालकिन आज आप खाना क्यों बना रही हैं? चमेली काकी नहीं आई क्या?

कुसुम (खाना बनाते हुए)- आई थी.. पर आज उसकी लड़की को देखने वाले आए हुए थे.. इसलिए बोल कर चली गई, अब शाम को ही आएगी।

राजू (थोड़ा निराश होते हुए)- ओह्ह अच्छा।

कुसुम- जा मुँह-हाथ धो ले.. मैं खाना लगा देती हूँ।

राजू पीछे जाकर हाथ-मुँह धोने लगा। जब वो हाथ-मुँह धो कर आगे आया तो कुसुम रसोई में नहीं थी, राजू कुसुम के कमरे में गया, जहाँ पर कुसुम आईने के सामने खड़ी होकर अपने आप को संवार रही थी।

आईने में राजू के अक्स को देख कर कुसुम के होंठों पर कातिल मुस्कान फ़ैल गई- क्या देख रहे हो?

कुसुम ने मुस्कुराते हुए अपने बालों को संवारते हुए पूछा।

राजू- जी वो कुछ नहीं.. मैं तो खाना के लिए आया था।

कुसुम- उम्मह अच्छा रुक ज़रा मैं अपने बालों को बाँध लूँ।

राजू वहीं खड़ा होकर कुसुम को सँवरते हुए देखने लगा। कुसुम भी बार-बार आईने में से राजू की तरफ देख रही थी।

‘मालकिन एक बात बोलूँ.. अगर आप बुरा ना माने तो।’

कुसुम ने पीछे मुड़ कर राजू की तरफ देखा।

कुसुम- हाँ.. बोल ना मेरी जान।

राजू- मालकिन आज आप ये बाल खुले रहने दीजिए।

कुसुम (राजू की बात सुन कर कुसुम के होंठों पर मुस्कान और फ़ैल गई)- क्यों बँधे हुए बाल अच्छे नहीं लगते?

राजू- नहीं वो बात नहीं है.. बस आप इन खुले हुए बालों में बहुत खूबसूरत लग रही हो।

कुसुम उठ कर खड़ी हो गई और राजू के पास आकर उसके गले में अपनी बाँहें डालती हुई बोली- अब तुमने कहा है.. तो चल आज बाल खुले छोड़ देती हूँ।

कुसुम ने नीले रंग की साड़ी पहनी हुई थी, नीले रंग की साड़ी और ब्लाउज उसके ऊपर बहुत जंच रहा था।

राजू को भी पता नहीं चला, कब उसके हाथ कुसुम की कमर पर आ गए।

दोनों की गरम साँसें एक-दूसरे के होंठों से टकराने लगीं। जिसे महसूस करके कुसुम के होंठ काँपने लगे, राजू ने अपने होंठों को कुसुम के रसीले होंठों पर रख दिया और उसके होंठों को ज़ोर-ज़ोर से चूसने लगा।

कुसुम भी अपना आपा खोते हुए उससे एकदम से चिपक गई, राजू अपने हाथों से उसकी कमर को सहलाते हुए उसके चूतड़ों पर पहुँच गया और साड़ी के ऊपर से उसके चूतड़ों को मसलने लगा।

दोनों एक-दूसरे से ऐसे चिपके हुए थे, मानो जैसे उन्हें कोई अलग नहीं कर सकता.. पर तभी दरवाजे पर दस्तक हुई।

कुसुम ने अपने होंठों को राजू के होंठों से अलग किया और मुस्कुराते हुए बोली- चलो बाहर कोई आया है.. कुसुम ने बाहर दरवाजे के पास जाकर दरवाजा खोला तो बाहर कान्ति खड़ी थी।

उसे देखते ही कुसुम का पारा सातवें आसमान पर जा पहुँचा।

‘अरे चाची जी आप आईए ना..’ कुसुम ने अपने होंठों पर झूठी मुस्कान लाते हुए कहा।

कान्ति के अन्दर आने के बाद कुसुम ने दरवाजा बंद किया।

कान्ति (अन्दर आकर पलंग पर बैठते हुए)- और बहू क्या कर रही थी?

कुसुम- वो चाची.. खाना बनाया है अभी.. और इसको खाना देने वाली थी।

कुसुम ने राजू की तरफ इशारा करते हुए कहा जो कि कान्ति के सामने नीचे चटाई पर बैठा हुआ था।

कान्ति- क्यों आज वो मरी चमेली नहीं आई क्या?

कुसुम- नहीं चाची जी… आज उसके घर में कोई आया हुआ था।

कान्ति- अच्छा ठीक है।

कुसुम- चाची जी आप भी खाना खायेंगी?

कान्ति- हाँ.. बहू जा मेरे लिए भी ले आ।

कुसुम रसोई में गई और राजू और कान्ति के लिए खाना परोस कर ले आई।

खाना खाने के बाद राजू पीछे अपने कमरे में चला गया।

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रात को ठीक से ना सोने के कारण राजू को लेटते ही नींद आ गई।
दोपहर को जब राजू उठ कर अपने कमरे से बाहर आया तो उसने देखा कि कुसुम और चमेली आपस में कुछ बात कर रही थीं और चमेली का चेहरा भी कुसुम की तरह से खिला हुआ था।

कुसुम थोड़ी देर बात करने के बाद आगे चली गई और राजू कुएं के पास आ गया, जहाँ पर चमेली पानी निकाल रही थी।

‘क्या बात है काकी.. आज बहुत खुश नज़र आ रही हो?’

राजू चमेली के पास जाकर कहा।

चमेली (राजू की तरफ मुस्करा कर देखते हुए)- अरे राजू आ ना.. आज एक खुशखबरी है।

राजू- अच्छा बताओ हमें भी तो पता चले।

चमेली- वो रज्जो का रिश्ता पक्का हो गया है।

राजू चमेली की बात सुन कर थोड़ा सा निराश हो गया।

‘अच्छा.. पर अचानक से कैसे?’

चमेली- अब क्या करते.. इतना अच्छा रिश्ता आया था कि मना ही ना कर सके और वैसे भी बेटी माँ-बाप के सर पर बोझ होती है.. जितनी जल्दी शादी हो जाए, हम गंगा नहा आएँ।

राजू- ओह्ह ठीक है.. वैसे बेटी की शादी कब करवा रही हो?

चमेली- 3 दिन में ही चमेली की शादी करवा देंगे।

राजू- अच्छा ठीक है, मैं आगे जाकर मालकिन से पूछ लेता हूँ कि कोई काम तो नहीं है।

चमेली (राजू को पीछे से आवाज़ लगाते हुए) हाँ.. सेठ जी भी आ गए हैं। तुम्हारे बारे में पूछ रहे थे कि कहीं नज़र नहीं आ रहा।

राजू घर के आगे की तरफ आ गया, पर गेंदामल दुकान पर जा चुका था, दीपा और सीमा अपने-अपने कमरों में आराम कर रही थीं और कुसुम रसोई में चाय बना रही थी।
राजू रसोई में जाकर कुसुम के पीछे खड़ा हो गया।

जब कुसुम को अपने पीछे से क़दमों की आहट हुई, तो कुसुम ने पीछे मुड़ कर राजू की तरफ देखा और कुसुम के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई।
‘उठ गए जनाब..’ कुसुम ने आगे की तरफ मुँह करते हुए कहा।

राजू- हाँ.. वो बाबू जी कब आए।

कुसुम- आए थे चले गए दुकान पर और बाकी अपने-अपने कमरों में आराम कर रहे हैं।

राजू ने आगे बढ़ कर कुसुम को पीछे से बाँहों में भर लिया और उसकी पीठ के खुले हुए हिस्से पर अपने होंठों को रख दिया।

‘आह क्या कर रहा है.. सभी घर में हैं।’

कुसुम ने कसमसाते हुए कहा। राजू ने अपने हाथों को ऊपर ले जाकर कुसुम की चूचियों को हाथों में भर कर मसल दिया।

‘आह छोड़ ना.. क्या कर रहा है.. किसी ने देख लिया तो।’

राजू- पर फिर कब करने दोगी?

कुसुम (राजू के पीछे हटाते हुए)- अरे दो दिन सबर रख.. फिर मुझे चाहे सारा दिन अपनी बाँहों में लेकर रहना.. ठीक..

राजू- दो दिन.. क्या सेठ जी और बाकी सब फिर से बाहर जाने वाले हैं?

कुसुम- नहीं.. वो नहीं.. हम दोनों जाने वाले हैं।

राजू- हम दोनों.. पर कहाँ?

कुसुम- मेरे मायके और तुम्हारे सेठ जी ने कहा कि मैं अकेली नहीं जाऊँगी… तुम भी साथ में चलोगे.. मेरा सामान उठाने के लिए।

कुसुम ने मुस्कुराते हुए राजू को देखने लगी।

राजू भी कुसुम को मस्त निगाहों से देखने लगा।

‘अच्छा अब बाहर जाओ.. मैं दीपा और सीमा को चाय देने जा रही हूँ। अब परसों तक मेरे पास भी ना फटकना.. नहीं तो किसी को शक हो जाएगा।’

राजू रसोई से बाहर आ गया और पीछे बने अपने कमरे में जाने लगा।
पीछे चमेली अभी भी कपड़े धो रही थी।
राजू बिना चमेली की ओर ध्यान दिए अपने कमरे में चला गया, चमेली को ये बात कुछ रास नहीं आई और वो भी उठ कर राजू के पीछे उसके कमरे में आ गई।

चमेली- अरे राजू क्या हुआ..? बड़े खोए हुए से हो?

राजू (एकदम से चौंकते हुए)- कुछ नहीं काकी वो बस थोड़ी तबियत ठीक नहीं है।

चमेली (राजू के माथे पर हाथ लगाकर देखते हुए)- बुखार तो नहीं है.. कहीं आज कल मालकिन तुमसे कुछ ज्यादा ‘काम’ तो नहीं करवा रही है ना?

चमेली ने आँख नचाते हुए कहा।

राजू- नहीं वो बात नहीं, वो कल रात जब बारिश हो रही थी। तब पेशाब करने के लिए बाहर गया तो भीग गया था।

चमेली- ओह्ह.. अच्छा, लो मैं अभी तुम्हारी तबियत रंगीन कर देती हूँ।

ये कह कर चमेली राजू के सामने पलंग पर बैठ गई और राजू के पजामे के नाड़े को खोल कर सरका दिया।
जैसे ही राजू का लण्ड पजामे के क़ैद से बाहर आया, चमेली ने उसे अपनी मुठ्ठी में भर लिया।

‘ये क्या कर रही है काकी? कहीं मालकिन आ गई तो?’

चमेली- अरे तो चुप रह कर मज़ा ले ना.. वो नहीं आएगी। वैसे भी तेरे इस मूसल लण्ड का स्वाद कब से नहीं चखा।

चमेली ने राजू के मोटे लण्ड को देखते हुए कहा और फिर एकदम से झुक कर उसके लण्ड के सुपारे को मुँह में भर लिया और अपनी जीभ की नोक से उसके लण्ड के सुपारे को कुरेदने लगी।

एक लम्बी कथा जारी है।

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