गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा-23

Gendamal halwai ka chudakkad kunba-23

लता ने अपनी साड़ी को नीचे किया और उस मजदूर को घूरते हुए लुँगी को बांधने के लिए कहा और खुद कुसुम को दूसरे कमरे में ले गई।

‘अरे मेरी प्यारी गुड़िया क्या हुआ तुझे..? रो क्यों रही है?

कुसुम (सुबकते हुए)- माँ वो कल्लू आपको मार रहा था?

लता- नहीं तो तुमसे किसने कहा… वो तो मुझे चोट लग गई थी, इसलिए दवाई लगा रहा था।

कुसुम- माँ ऐसे भी कोई दवाई लगता है अपनी नूनी सी।

लता- वो क्या है ना.. मेरे सूसू वाली जगह के अन्दर चोट लगी है ना.. अब चुप कर और ये बात अपने बाबा से मत कहना.. ठीक है, नहीं तो वो भी रोने लगेंगे।

कुसुम- सच माँ.. ज्यादा चोट है।

लता- नहीं.. अब ठीक है..पर ध्यान रखना अपने बाबा से मत कहना।

कुसुम- ठीक है माँ।

उस वक़्त नादान कुसुम ना समझ सकी कि लता और कल्लू के बीच क्या हो रहा है..

पर जैसे-जैसे कुसुम सयानी हुई तो उसे सब पता चलता गया।

कल्लू और लता की रंगरेलियाँ जारी थीं, पर कुसुम ने अपना मुँह नहीं खोला।

कई बार तो कल्लू और लता को कुसुम ने देखा और पकड़ा भी.. पर लता जान चुकी थी कि कुसुम उससे बहुत प्यार करती है और वो कुछ नहीं बोलेगी।

दोनों के बीच आम सहेलियों जैसी बातें होने लगी थीं और लता कुसुम को अपने और कल्लू के किस्से खूब सुनाया करती थी, पर कुसुम की शादी के बाद कल्लू को खेतों में काम करते हुए साँप ने डस लिया और उसकी मौत हो गई।

उसके बाद से उसका पति ही उसकी महीने में एक-दो बार चोदता था.. पर लता जैसी गरम औरत को संतुष्ट नहीं कर पाता था।

कुसुम- और सुनाओ माँ.. सब कैसा है? कोई नया शिकार किया कि नहीं…

लता- अरे कहाँ.. तुम तो जानती हो। अब बहू सारा दिन घर में होती है और वैसे भी कल्लू के जाने के बाद तेरे बाबा ने खेतों में कोई ढंग का मजदूर नहीं रखा। मेरी छोड़ तू बता.. दामाद जी तो खूब निचोड़ते होंगे तुम्हें.. कि नहीं?

कुसुम- कहाँ माँ.. क्यों मज़ाक कर रही हो। अब वो तो मरी उस रखैल के कमरे से बाहर ही नहीं निकलते और वैसे भी पहले भी कहाँ कुछ करते थे, दुकान से आकर सो जाते थे।

लता- ये सब छोड़.. ये बता इस लड़के को कौन से कमरे में ठहराऊँ?

कुसुम- वो मेरे कमरे में रहेगा माँ।

लता ने हैरान होते हुए पूछा- अरे तू ये क्या कह रही है.. तू नौकर के साथ एक कमरे में रहोगी?

कुसुम (शर्मा कर मुस्कुराते हुए)- हाँ माँ।

लता (कुसुम के चेहरे पर उभरी हुई ख़ुशी को पढ़ते हुए)- क्या सच कह रही है… तू उस नादान के साथ… मेरा मतलब अभी तो उसकी उम्र ही क्या है?

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कुसुम- माँ.. जिसे तुम बच्चा समझ रही हो.. वो तो तुम्हारी चूत को भी सुजा देगा।

लता- धत.. कैसी बेशर्मों जैसी बातें कर रही है। उस लड़के को देख कर तो ऐसा नहीं लगता और वैसे भी अगर किसी को पता चला कि तू उस नौकर के साथ एक कमरे में रह रही है, वो भी मेरे मौजूदगी में… तो लोग क्या कहेंगे.. मैं तो कहीं की नहीं रहूंगी।

कुसुम (अपनी माँ लता के गले में बाहें डालते हुए)- ओह्ह.. माँ तुम भी ना बच्चों जैसी बात करती हो.. तुम्हारे सिवा और कौन जान सकता है.. इस घर में क्या हो रहा है? वैसे भी माँ तुम तो जानती हो अब मेरे जिंदगी में ये सुख के पल कभी-कभार ही आने वाले हैं।

लता (थोड़ी देर सोचने के बाद)- अच्छा.. चल ठीक है, पर जो तू उस छोरे के बारे में कह रही है.. क्या वो सच है?

कुसुम (मुस्करा कर लता की तरफ देखते हुए) अगर यकीन ना हो तो एक बार उसका लण्ड चूत में लेकर देख लो… अगर दो मिनट में झड़ ना जाओ, तो मेरा नाम कुसुम नहीं।

लता (सवालिया नज़रों से कुसुम की ओर देखते हुए)- और तू ये सब बर्दाश्त कर लेगी?

कुसुम- क्यों नहीं.. आख़िर तुमने मेरे माँ ना होने के बावजूद भी इतना प्यार दिया है। तो अगर मेरी किसी चीज़ से तुम्हें सुख मिलता है तो…मुझे क्या ऐतराज हो सकता है?

लता- पर वो क्या मानेगा?

कुसुम- बस माँ.. तुम आज रात का इंतजार करो.. अभी वो भी थका हुआ है, थोड़ी देर बेचारे को आराम करने दो, मैं उससे ऊपर कमरे में छोड़ कर आती हूँ।

कुसुम राजू को अपने कमरे में ले गई और राजू को ऊपर कमरे में आराम करने के लिए बोला और खुद नीचे अपनी माँ के कमरे में आकर लेट गई।

कुसुम तो सो गई, पर कुसुम की बातों ने लता की चूत में आग लगा दी थी।
आख़िर आज कई सालों बाद उसे एक लण्ड मिलने वाला था।

वो भी एक जवानी की दहलीज पर खड़े लड़के के लम्बे लंड का स्वाद मिलने वाला था।

दूसरी तरफ चमेली के घर पर रज्जो की शादी की तैयारी जोरों पर थी।

कल रज्जो की शादी का दिन तय हुआ था, अब आप ज़रा रज्जो की ससुराल के लोगों से मिल लीजिए।

जैसा कि आप जानते ही हैं कि रज्जो के होने वाले पति का नाम रतन है और उसके ससुर का नाम किसन है।
इसके अलावा उसकी ससुराल में उसकी सास कमला और रतन की चाची शोभा है।

शोभा के एक लड़का और एक लड़की है.. दोनों अभी कम उम्र के हैं।

शोभा के पति का देहांत आज से दस साल पहले हो चुका था।

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इन सब किरदारों का रोल अपने वक्त आने पर सामने आएगा।

फिलहाल हम कुसुम के मायके का रुख़ करते हैं.. क्योंकि वहाँ आज की रात कुछ ज्यादा ही रंगीन होने वाली है।

यह कहानी आप HotSexStory.xyz में पढ़ रहें हैं।

उधर लता के घर पर रात के समय था।

सब खाना खा चुके थे और राजू और कुसुम ऊपर अपने कमरा में थे।

राजू कुसुम को बाँहों में भरे हुए उसकी मांसल चूचियों को मसल रहा था।

कुसुम (राजू के हाथों को कुसुम के चूचियों पर से हटाते हुए)- आज नहीं.. आज मैं बहुत थक गई हूँ.. तुम तो दोपहर को खूब सो लिए।

राजू (थोड़ा उदास होते हुए)- अच्छा ठीक है मालकिन.. जैसी आप की मर्ज़ी।

राजू पलट कर बिस्तर की तरफ जाने लगा।

कुसुम (पीछे से राजू को बाँहों में भरते हुए) ओह्ह.. नाराज़ हो गया मेरा बच्चा।

कुसुम की चूचियाँ राजू के पीठ पर धँस गई। कुसुम अपना हाथ आगे लाकर राजू के लण्ड पर ले आई और उसके पजामे के ऊपर से लण्ड को पकड़ कर मसलने लगी।

‘आहह.. मालकिन..’ राजू के मुँह से मस्ती भरी ‘आहह’ निकल गई और आँखें बंद हो गईं।

कुसुम ने दूसरे हाथ से राजू के पजामे के नाड़े को खोल कर उसके लण्ड को बाहर निकाल लिया और लण्ड पकड़ कर पीछे खड़े हुए तेज़ी मुठ्ठ मारने लगी।

कुछ ही पलों में राजू का लण्ड तन कर अपनी औकात पर आ गया।

इस बात से अंजान कि दरवाजे पर खड़ी लता ये सब देखते हुए अपने पेटीकोट के ऊपर से अपनी चूत को मसल रही थी।

लता को अपनी आँखों पर यकीन नहीं हो रहा था..राजू का 8 इंच लंबा और 3 इंच मोटा लण्ड किसी मूसल के तरह खड़ा हुआ था।
जिसे देखते ही लता की चूत में नमी आने लगी।

अचानक से दरवाजा हिलने की आवाज़ से दोनों चौंक गए।
चौंका तो सिर्फ़ राजू था और कुसुम तो सब जानते हुए बनने का नाटक कर रही थी।

जैसे ही राजू की नज़र लता पर पड़ी.. मानो उसकी गाण्ड फट गई हो।

कुसुम तो कब से पीछे हट कर लता की तरफ पीठ करके सर झुकाए खड़ी थी।

राजू कभी लता की तरफ देखता.. कभी कुसुम की तरफ देखता.. तो कभी अपने झटके खाते हुए लण्ड की तरफ देखता।

‘आज तो मर गया तू..’ राजू ने मन ही मन सोचा, पर अगले ही पल लता के होंठों पर वासना से भारी मुस्कान फ़ैल गई।
जिससे देख राजू उलझन में पड़ गया।

‘वो अपना पजामा ठीक कर।’ लता ने राजू के लण्ड की तरफ इशारा करते हुए कहा।

‘और तुम कुसुम ज़रा बाहर आओ.. ये क्या गुल खिला रही थी?’

यह कह कर लता वापिस चली गई.. कुसुम अपनी हँसी को छुपाते हुए कमरे से बाहर चली गई और राजू वहीं ठगा सा खड़ा रह गया। कुछ पलों के लिए मानो उसके दिमाग़ ने काम करना बंद कर दिया हो।

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जब उससे होश सा आया तो उसने लपक कर अपने पजामे को ऊपर किया.. उसका पूरा बदन डर से थरथर काँप रहा था.. अब क्या होगा?

सेठ को पता चला तो वो मुझे जान से मार देंगे… नहीं नहीं.. मैं यहाँ से भाग जाऊँगा।

राजू अपने सर को पकड़ कर बिस्तर पर बैठ गया।

कुसुम के जाने के बाद राजू उस कमरा में ऐसा महसूस हो रहा था, जैसे वो किसी क़ैद खाने में बैठा हो और अभी बाहर से कुछ लोग आयेंगे और उसकी पिटाई शुरू हो जाएगी।

एक अजीब सा सन्नाटा उस कमरा में फैला हुआ था.. तभी कमरे के बाहर से कुछ क़दमों की आहट हुई।

जिससे सुन कर राजू के हाथ-पैर काँपने लगे.. लेकिन तभी कुसुम कमरे में दाखिल हुई, उसके चेहरे से ऐसा लग रहा था.. जैसे उसको कोई फर्क ना पड़ा हो।

राजू (हकलाते हुए)- क्या.. क्या हुआ मालकिन?

कुसुम (एकदम से सीरियस होकर बिस्तर पर बैठते हुए)- राजू अब सब तुम्हारे हाथ में है.. अगर तुम चाहो तो ये बात माँ किसी को नहीं कहेगी।

राजू- मैं.. पर कैसे मालकिन?

कुसुम- तू एक काम कर.. यहाँ पर बैठ… माँ थोड़ी देर में आ रही हैं। वो तुझ से जो भी कहें कर लेना.. मना मत करना अब सब तुम्हारे हाथ में ही है।

यह कह कर कुसुम बिना राजू से आँख मिलाए कमरे से बाहर निकल गई, एक बार फिर से वो जान निकाल देने वाला सन्नाटा कमरा में छा गया।

राजू को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वो क्या करे।

कुसुम जब सीड़ियाँ नीचे उतर रही थी, तब लता उसे सीड़ियों पर मिली।
दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा और फिर दोनों के होंठों पर वासना से भरी मुस्कान फ़ैल गई।

‘ध्यान से माँ.. छोरे का लण्ड बहुत तगड़ा है।’ कुसुम ने लता के पास से गुज़रते हुए कहा।

कुसुम की बात सुन कर लता सीड़ियों पर खड़ी हो गई।

‘तो मैं कौन सा पहला लण्ड चूत में लेने वाली हूँ।’

कुसुम ने पीछे मुड़ कर लता की तरफ देखा और एक बार फिर दोनों के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई, फिर कुसुम नीचे की ओर चली गई।
उधर कमरे में बैठा, राजू अपनी किस्मत को कोस रहा था कि आख़िर वो कुसुम के साथ यहाँ क्यों आया।

एक बार फिर से कमरे के बाहर से आ रही क़दमों की आहट सुन कर राजू के रोंगटे खड़े हो गए।

एक लम्बी कथा जारी है।

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