गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा-29

Gendamal Halwai Ka Chudakkad Kunba-29

अगली सुबह रतन जब सुबह उठा तो उसने शोभा को वहाँ पर नहीं पाया, शोभा रोज सुबह जल्दी उठती थी..और नहाने के बाद घर के काम-काज में लग जाती थी।

रतन उठ कर घर में बने हुए गुसलखाने की तरफ बढ़ा.. उसे बहुत तेज पेशाब लगी हुई थी, पर गुसलखाने के दरवाजे पर परदा टंगा हुआ था, जिसका मतलब था कि गुसलखाने के अन्दर घर की कोई ना कोई औरत नहा रही है।

हालांकि रतन की माँ और शोभा काकी रतन को बच्चा समझ कर अभी तक उससे परदा नहीं करती थे।

रतन ने गुसलखाने के बाहर से चिल्लाते हुए आवाज लगे- अन्दर कौन है…मुझे पेशाब करना है।

शोभा ने अन्दर से आवाज़ दी- मैं हूँ बेटा… थोड़ी देर रुक जा।

रतन- काकी मुझे बहुत ज़ोर से लगी है।

शोभा- तो फिर अन्दर आकर कर ले।

रतन एकदम से अन्दर घुस गया और अपना पजामे को नीचे करके मूतने लगा।

सुबह-सुबह पेशाब के कारण उसका साढ़े 5 इंच का लण्ड एकदम तना हुआ था।

रतन ने बैठ कर नहा रही शोभा की तरफ कोई ध्यान नहीं दिया, जो एकदम मादरजात नंगी बैठी थी।

रतन एक तरफ दीवार के साइड में मूत रहा था और उसका लण्ड की चमड़ी आगे सुपारे पर से खिसकी हुई थी।
उसका गुलाबी सुपारा देख कर शोभा की आँखें एकदम से चौंधिया गईं।

ऐसा नहीं था कि शोभा ने कभी रतन के लण्ड को नहीं देखा था.. पर जब भी देखा था तब रतन का लण्ड मुरझाया हुआ होता था और छोटी से नूनी की तरह दिखता था, पर आज वो पहली बार वो रतन के काले 5 इंच के लण्ड को देख रही थी.. जो किसी सांप की तरह फुंफकारते हुए झटके खा रहा था।

मूतने के बाद रतन गुसलखाने से बाहर चला गया, पर शोभा का हाथ उसकी चूत पर कब आ गया था, उससे पता भी नहीं चला।

शोभा ‘आह’ भर कर रह गई, आज जब उसने रतन के खड़े लण्ड को देख लिया तो वो कल की बात पर पछताने लगी कि उसने कल इतना अच्छा मौका कैसे गंवा दिया।

दोपहर को रतन खाना खाने के बाद अपने दोस्तों के साथ खेलने के लिए घर से निकल गया।

दोस्तों के साथ खेलते-खेलते वो खेतों की तरफ निकल गया।

दोपहर की गरमी के कारण रतन भी जल्द ही थक गया और एक पेड़ के नीचे छाया में बैठ गया।

उसके दोस्त हरी घास पर लेट गइ और ऊंघने लगे, पर रतन बैठा हुआ इधर-उधर देख रहा था।

वो और उसके दोस्त अक्सर खेलने के बाद वहाँ पर आराम करते थे और उसके बाद अपने घरों को लौट जाते थे।

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गरमी की वजह से रतन को बहुत प्यास लग रही थी.. उसने अपने साथ के एक दोस्त को साथ चलने के लिए कहा, पर उसने मना कर दिया।

थोड़ी दूर एक कुँआ था।

रतन उठ कर अकेला ही कुँए की तरफ चल पड़ा।

धूप की वजह से चारों तरफ सन्नाटा फैला हुआ था, जैसे ही वो कुँआ के पास पहुँचा.. उसे कुँए से कुछ दूर उगी हुई झाड़ियों में कुछ हरकत होती सी दिखाई दी।

जिज्ञासा-वश रतन उस तरफ को गया, झाड़ियों को हटाते हुए रतन आगे बढ़ ही रहा था कि अचानक से उसके कदम रुक गए, उसके सामने जो हो रहा था, वो उसकी समझ के परे था।

उसी के पड़ोस में रहने वाली, एक लड़की जिसका नाम गुंजा था.. ज़मीन पर एक पुराने से कपड़े पर लेटी हुई थी.. उसका लहंगा उसकी कमर तक चढ़ा हुआ था और उसी के गाँव का लड़का जिसकी उम्र कोई 22 साल के करीब थी.. वो उसके ऊपर लेटा हुआ तेज़ी से उसकी चूत में अपना लण्ड डाल कर धक्के लगा रहा था।

गुंजा दबी आवाज़ में सिसिया रही थी..

जहाँ पर रतन खड़ा था, वहाँ से गुंजा की चूत में अन्दर-बाहर हो रहा उस लड़के का लण्ड साफ दिखाई दे रहा था।
दोनों झड़ने के बेहद करीब थे।

गुंजा- जल्दी करो ना.. मेरे माँ मुझे ढूँढ़ रही होगी.. आह आह्ह.. ज़ोर से चोद मुझे.. आह..

लड़का- बस मेरी रानी.. मेरा पानी निकलने ही वाला है… ओह्ह ये ले.. हो गया.. ले पी अपनी चूत में.. आह्ह..

दोनों झड़ कर हाँफने लगे, पर उसके बाद जैसे ही दोनों मुड़े.. दोनों के चेहरे का रंग रतन को देख कर उड़ गया।

उस लड़के ने जल्दी से अपने कपड़े पहने और रतन के पास आकर बोला- दोस्त रतन.. जो तूने अभी देखा वो किसी मत बताना.. वरना गाँव वाले हमें गाँव से निकाल देंगे।

गुंजा- हाँ रतन.. देख तू जो बोलेगा.. मैं करूँगी.. तुम्हें जो चाहिए वो तुम्हें ये भैया लाकर देंगे.. पर किसी को बताना नहीं।

सब कुछ रतन की समझ से ऊपर जा रहा था, वो बोला- पर आप ये कर क्या रहे थे?

लड़का रतन की नादानी को ताड़ गया और उसको प्यार से पुचकारते हुए.. अपने साथ उस कपड़े पर बैठा लिया- हम चुदाई का खेल रहे थे..रतन यार, पता इसमें बहुत मज़ा आता है..

रतन ने एक बार दोनों की तरफ देखा- मज़ा आता है.. पर कैसे..?
लड़का- देख जब लड़का और लड़की बड़े हो जाते हैं, तो लड़का अपना लण्ड लड़की की चूत में डाल कर अन्दर-बाहर करता है…उसे चुदाई कहते हैं, सच में बहुत मज़ा आता है।

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रतन- नहीं.. तुम जरूर कोई ग़लत काम कर रहे थे, इसमें क्या मज़ा आता है?

लड़का- अच्छा तो तू मज़ा लेकर देखना चाहता है।

एक बार लेकर देख फिर तुम्हें पता चलेगा कि चुदाई में कितना मज़ा आता है।

ये कहते हुए.. उस लड़के ने गुंजा को इशारा किया, गुंजा रतन के पास बैठ गई और एक हाथ धीरे-धीरे से उसकी जांघ के ऊपर रख कर सहलाने लगी।

गुंजा के नरम हाथों का स्पर्श रतन को अपनी जाँघों पर बहुत उत्तेजक लग रहा था, इसलिए रतन ने कुछ नहीं बोला।

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रतन को चुप देख कर गुंजा ने अपना हाथ आगे बढ़ा कर रतन के लण्ड को पजामे के ऊपर से पकड़ लिया..और धीरे-धीरे उसके लण्ड को सहलाने लगी।

रतन का बदन बुरी तरह से काँप गया, उसकी आँखें मस्ती में बंद हो गईं.. मौका देखते ही लड़के ने गुंजा को इशारा किया और वो उठ कर वहाँ से चला गया।

गुंजा ने रतन के पजामे का नाड़ा खोला तो रतन को जैसे होश आया, ‘ये क्या कर रही है दीदी..’ रतन ने सवाल किया।

‘तू बस अब मज़े ले.. देख कितना मज़ा आता है..’

ये कह कर उसने रतन के पजामे को नीचे कर दिया। उसका लण्ड पूरी तरह से तन चुका था।

‘अरे वाह रतन तेरा लण्ड भी बहुत बड़ा है।’ ये कहते हुए गुंजा ने झुक कर उसके लण्ड को मुँह में भर कर चूसना चालू कर दिया।

रतन को आज पहली बार वो मज़ा आ रहा था, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

उसकी आँखें मस्ती में बंद होने लगीं।

गुंजा लगातार ज़ोर-ज़ोर से उसके लण्ड को अपने मुँह के अन्दर-बाहर करते हुए, उसके लण्ड को चूस रही थी और रतन जन्नत की सैर कर रहा था।

ये सब रतन देर तक नहीं झेल पाया और गुंजा के मुँह में पहली बार झड़ गया।

आनन्द अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुका था, कुछ ही पलों में रतन का लण्ड मुरझा गया।

गुंजा ने अपने मुँह को साफ़ करते हुए कहा- क्यों रतन मज़ा आया?

रतन- हाँ दीदी.. बहुत मज़ा आया..

गुंजा- चल.. अब अपना पजामा पहन ले।

रतन- पर दीदी मुझे भी वैसे करना है… जैसे वो लड़का तुझे कर रहा था।

गुंजा- आज नहीं रतन.. मुझे बहुत देर हो गई है, आज के लिए इतना ही काफ़ी है।

यह कह कर गुंजा चली गई।

रतन भी अपने दोस्तों के साथ आकर बैठ गया। वो ये सब किसी से कहना चाहता था..पर किसे बताए.. ये वो तय नहीं कर पा रहा था।
फिर वो अपने दोस्तों के साथ घर वापिस आ गया।

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शाम ढल चुकी थी और रतन की माँ अपने घर के पीछे खेतों में जा रही थी।

उनके खेतों के बीचों-बीच भैंसों को बाँधने के लिए दो कमरे बने हुए थे।
रतन की माँ कमला दूध दुहने के लिए खेतों में जा रही थी.. रतन भी अपनी माँ के साथ हो लिया।

जैसे वो भैसों के कमरे के पास पहुँचे, तो रतन को पीछे से गुंजा की आवाज़ आई।

गुंजा- अरे काकी कैसी हो.. दूध दुहने आई हो।

कमला- हाँ बेटी.. दूध दुहने ही आई थी, आज तुम्हारी माँ नहीं आई दूध दुहने?

‘नहीं काकी.. माँ की तबियत थोड़ी खराब है।’

गुंजा ने रतन की तरफ मुस्कुरा कर देखते हुए कहा और हल्की सी आँख भी दबा दी।

कमला- अच्छा.. अच्छा..

गुंजा अपने खेत में बने हुए कमरे के तरफ बढ़ गई, जहाँ वो अपनी भैंसों को बांधती थी।

रतन- माँ.. मैं गुंजा दीदी के साथ जाऊँ?

कमला- हाँ जाओ..पर ज्यादा शरारत मत करना।

रतन- ठीक है माँ।

रतन गुंजा के पीछे चल पड़ा.. गुंजा ने एक बार पीछे मुड़ कर रतन की तरफ देखा, उसके होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई, फिर गुंजा और रतन दोनों उस कमरे के अन्दर चले गए.. जहाँ पर गुंजा के घर वाले भैंसें बांधते थे।

अन्दर आते ही गुंजा ने रतन को अपने पास खींच लिया और उसका एक हाथ पकड़ कर अपनी चूत पर लहँगे के ऊपर से रखा और रतन की तरफ नशीली आँखों से देखते हुए बोली- दोपहर को मज़ा आया था ना..

रतन का दिल जोरों से धड़क रहा था, हाथ-पैर अनजानी उत्सुकता के कारण काँप रहे थे। रतन ने गुंजा की तरफ देखते हुए ‘हाँ’ में सर हिला दिया।

गुंजा ने एक बार कमरे से बाहर झाँक कर देखा, बाहर दूर-दूर तक कोई नहीं था, फिर गुंजा एक दीवार से सट गई और अपने लहँगे को अपनी कमर तक ऊपर उठा दिया।

यह देख कर रतन के दिल की धड़कनें और तेज हो गईं।

उसके सामने गुंजा के एकदम साफ़.. बिना झांटों वाली चूत थी.. जिसकी फाँकें आपस में सटी हुई थीं।

गुंजा की चूत देखते ही, रतन के दिमाग़ में कल रात देखी.. अपनी काकी शोभा की चूत आँखों के सामने घूम गई।

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एक लम्बी कथा जारी है।

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