गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा 3

Gendamal halwai ka chudakkad kunba-3

कुसुम ने आगे बढ़ कर दीपा के हाथ से सुराही ली और जानबूझ कर दूसरी तरफ देखने लगी ताकि दीपा और राजू को शक ना हो कि वो उन दोनों की रंगरेलियाँ देख रही है।

दूसरी तरफ गेंदामल और सीमा अपने काम में मशरूफ थे। उन्हें तो जैसे दीन-दुनिया की कोई खबर ही नहीं थी, पर इधर दीपा का बुरा हाल था।

राजू ने अपने हाथों की उँगलियों को दीपा के चूतड़ों की दरार में चलाना शुरू कर दिया।

दीपा एकदम मस्त हो चुकी थी। उसकी चूत की फाँकें कुलबुलाने लगीं। राजू की ऊँगलियाँ दीपा के गाण्ड के छेद और चूत की फांकों से रगड़ खा रही थीं।

दीपा के आँखें मस्ती में बंद हो गईं और वो अपनी आवाज़ को दबाने के लिए कोशिश कर रही थी।

कुसुम के होंठों पर जीत की ख़ुशी साफ़ झलक रही थी। उधर दीपा की चूत की फांकों में आग लगी हुई थी।

कुसुम के दिल में आज सुकून था, जब से उसे गेंदामल की तीसरी शादी की बात का पता चला था, तब से वो अन्दर ही अन्दर सुलग रही थी और आज अपने घर की इज़्ज़त के रूप में गेंदामल की इज़्ज़त को एक नौकर के हाथ का खिलौना बना देख कर कुसुम का मन सुकून से भरा हुआ था।

गेंदामल एकदम मस्त होकर अपनी नई पत्नी से अपने लण्ड की मुठ्ठ मरवा रहा था और वो झड़ने के बेहद करीब था।

उसने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर सीमा के हाथ को कस कर पकड़ लिया और उसके हाथ को तेज़ी से हिलाते हुए अपनी मुठ्ठ मरवाने लगा।

गेंदामल की आँखों के सामने जन्नत सा नशा तैर गया।

उसके लण्ड ने वीर्य की बौछार कर दी।

गेंदामल का पूरा बदन हल्का हो गया, सीमा को जब अहसास हुआ कि उसका पति झड़ गया है, तो उसने अपना हाथ उसके लण्ड से हटा लिया।

बाकी का सफ़र आराम से कट गया।

शाम के 5 बजे गेंदामल अपने परिवार के साथ अपने गाँव में पहुँच गया।

गेंदामल का घर पूरे गाँव में सबसे बड़ा था और होता भी क्यों ना…!

आख़िर उसकी दुकान आसपास के इलाक़े में सबसे मशहूर थी।

ऊपर से गेंदामल सूद पर पैसे भी देता था।

गेंदामल के घर में कुल 7 कमरे थे।

एक रसोईघर और नहाने-धोने के लिए घर के पीछे एक बड़ा सा गुसलखाना था।

घर के सभी लोग पीछे बने गुसलखाने में ही नहाते थे।

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गेंदामल के घर मैं एक कुआं भी था, जो उस समय घर में होना शान की बात माना जाता था।

यूँ तो गेंदामल के घर का काम करने के लिए और साफ़-सफाई करने के लिए एक नौकरानी और थी, जिसका नाम चमेली था।

पर अगर घर वालों को बाजार से कुछ सामान मंगवाना होता तो, उन्हें गेंदामल को सुबह-सुबह ही बताना पड़ता था.. या फिर अगर गेंदामल का दोपहर को घर में चक्कर लगता, तब उस सामान को मंगाया जा सकता था।

गेंदामल के घर में एक कमरा गेंदामल और उसकी दूसरी पत्नी इस्तेमाल करते थे..

पर अब गेंदामल ने तीसरी शादी कर ली थी, इसलिए गेंदामल ने अपने कमरे के साथ वाले कमरे में कुसुम का सामान रखवा दिया था। बस इसी बात से कुसुम आग में जल रही थी।

उसकी नई सौत के आने से पहले ही उससे उसका कमरा भी छिन गया था।

पिछले 10 साल से कुसुम किसी रानी की तरह उस घर पर राज करती आई थी, पर अब उससे अपनी सत्ता खत्म होते हुए महसूस हो रही थी।

कुसुम को जो कमरा दिया गया था, उसके बगल वाला कमरा दीपा का था। इन तीनों कमरों के सामने दूसरी तरफ 3 कमरे और थे।

जिसमें से एक उसके माता-पिता का था, जो अब चल बसे थे।

सामने के 3 कमरे खाली थे।

जैसे ही गेंदामल का परिवार घर में दाखिल हुआ, तो कुछ दिनों से सुनसान पड़े घर में जैसे बहार आ गई हो।

चारों तरफ चहल-पहल सी हो गई थी।
चमेली भी आ गई थी और गेंदामल के परिवार के लिए खाना और चाय बनाने में लग गई थी।

सब अपना-अपना सामान अपने कमरों में रख कर बाहर आँगन में इकठ्ठे होकर बैठ गए।

राजू भी बाहर ही खड़ा था.. उस बेचारे पर तो किसी का ध्यान नहीं था।

वो अपना थैला अभी भी उठाए खड़ा था।

जब गेंदामल ने उसकी तरफ देखा तो बोला- अरे भाई… तुम ये अपना झोला उठाए अभी तक खड़े हो…! हम तो कब के घर पहुँच गए।

राजू- बाबू जी, आप बताईए मैं इसे कहाँ रखूं?

राजू की बात सुन कर गेंदामल कुछ देर सोचने के बाद बोला- चमेली ओ चमेली..!

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इतने में बावर्चीखाने से चमेली बाहर आई- जी सेठ जी..!

चमेली ने आदर सहित कहा।

गेंदामल- चमेली, इसे घर के पीछे जो कमरा है.. वो दिखा दो..ये वहीं रहेगा…!

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इससे पहले कि कोई कुछ बोलता या कहता, कुसुम बीच में बोल पड़ी- जी.. उसमें तो जगह ही कहाँ हैं… वो तो पुराने सामान से भरा पड़ा है और वैसे भी पीछे इतनी दूर इसको बुलाने कौन जाएगा.. आगे तीन कमरे खाली हैं तो…!

कुसुम की बात सुन कर गेंदामल कुछ देर के लिए सोच में पड़ गया, पर गेंदामल जानता था कि राजू नौकर है और नौकर का घर के बीच में रहना ठीक नहीं है।

इसलिए गेंदामल ने ये कह कर मना कर दिया कि जिस सामान की ज़रूरत नहीं है.. उससे फेंक दिया जाए या जलावन के लिए इस्तेमाल किया जाए..!

गेंदामल की बात सुन कर कुसुम थोड़ा हताश ज़रूर हुई, पर राजू को पीछे वाले कमरे में ठहरने से भी कुसुम को कुछ अलग ही सूझ रहा था।

आख़िरकार घर की सभी औरतें पीछे जाकर ही तो नहाती थीं।

घर में सबसे पहले गेंदामल नहाता था और गेंदामल के दुकान पर जाने के बाद दीपा और कुसुम नहाती थीं और अब सीमा भी शामिल हो गई थी।

गेंदामल ने फैसला सुना दिया था।

चमेली ने राजू को अपने साथ चलने के लिए कहा।

जैसे ही चमेली राजू को लेकर घर के पीछे की तरफ गई, उसने पीछे मुड़ कर एक बार राजू को देखा।

उसकी आँखों में अजीब सी चमक थी, जब से उसने राजू को देखा था।

चमेली का पति सेठ गेंदामल की दुकान पर ही काम करता था, वो एक नम्बर का पियक्कड़ था, कोई काम-काज नहीं करता था।

बस सारा दिन गाँव के आदमियों के साथ इधर-उधर घूमता रहता, दारू पीता और घर आकर सो जाता।

इसलिए गेंदामल से कह कर चमेली ने अपने पति को दुकान पर लगवा दिया था और गेंदामल ने भी चमेली के पति को खूब फटकारा था, जिससे वो काफ़ी हद तक सुधर गया था।

अब वो दुकान में ही रहता था, बस 7-8 दिन में एक बार गाँव आता था।

गेंदामल उसकी तनखाह चमेली को ही देता था और कुछ पैसे उसके पति को भी देता था।

जब चमेली उसे पीछे बने कमरा की तरफ ले जा रही थी, तो वो बार-बार पीछे मुड़ कर उसकी तरफ देख रही थी।

चमेली की उम्र 30 साल थी और एक बेटे और बेटी की माँ भी थी.. बेटी बड़ी थी।

चमेली की शादी छोटी उम्र में हुई थी और एक साल बाद ही उसने बेटी को जन्म दिया था, जिसका नाम रज्जो था।

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रज्जो दीपा से उम्र में एक समान थी।

राजू को चमेली का यूँ बार-बार मुड़ कर देखना और देख कर मुस्कराना अजीब सा लग रहा था क्योंकि चमेली राजू से दुगनी उम्र की थी और राजू इन
सब बातों और इशारों को समझने के लिए परिपक्व नहीं था।

कमरे की तरफ जाते हुए, चमेली अपने चूतड़ों को कुछ ज्यादा ही मटका कर चल रही थी, चमेली और उसके पति के बीच चुदाई का खेल अब खत्म हो चुका था।

जब से चमेली ने गेंदामल से अपने पति को फटकार लगवाई थी, तब से उसने चमेली से चुदाई करना बंद कर दिया था। चमेली को चुदाए हुए कई साल हो चुके थे।

जब चमेली ने कमरे के सामने जाकर दरवाजा खोला और राजू के तरफ पलटी और अपने होंठों पर मुस्कान लाते हुए कहा- ये लो… आज से ये तुम्हारा कमरा है।

राजू सर झुकाए हुए कमरे में घुस गया और इधर-उधर देखने लगा।

कमरा पुराने सामान से भरा हुआ था।

इतने में पीछे से गेंदामल भी आ गया और कमरे के अन्दर झांकता हुआ बोला- हाँ.. सच में अन्दर तो पुराना सामान भरा हुआ है… ऐसा करो, अपना झोला यहीं रखो… कल यहाँ से बेकार सामान बाहर निकलवा देते हैं और आज रात का तुम्हारे सोने का इंतज़ाम कहीं और करवा देता हूँ।।

गेंदामल की बात सुन कर चमेली ने झट से कहा- सेठ जी… अगर आप बोलें तो, ये आज हमारे घर पर ही सो जाता है।

गेंदामल को चमेली की बात ठीक लगी और गेंदामल ने चमेली को ‘हाँ’ कह दी।

रात ढल चुकी थी, सब खाना खा चुके थे और अपने कमरों में जाकर सोने की तैयारी कर रहे थी।

गेंदामल तो इस घड़ी के लिए पहले से ही बहुत उतावला था।

चमेली अपना सारा काम निपटा कर राजू के पास गई.. जो खाना खा कर आँगन में ज़मीन पर ही लेटा हुआ था।

‘चलो अब चलते हैं… सारा काम खत्म हो गया है।’

राजू ने बेमन से चमेली की तरफ देखा।

जो उसकी तरफ देखते हुए कातिल मुस्कान अपने होंठों पर लाए हुए थी और फिर राजू उठ कर खड़ा हो गया।

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