गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा-31

Gendamal Halwai Ka Chudakkad Kunba-31

जब शोभा अन्दर आई तो उसने देखा कि रतन बिस्तर पर बैठा हुआ दूध पी रहा था।

अन्दर आने के बाद उसने दरवाजे बन्द किया और रतन की तरफ मुस्कुरा कर देखते हुए बोली- दूध पी लिया?

रतन ने ‘हाँ’ में सर हिलाते हुए खाली गिलास नीचे रख दिया।

शोभा अकसर कमरे में कपड़े बदलने के वक़्त लालटेन की रोशनी कम कर देती थी, पर आज उसने ऐसा नहीं किया और फिर अपने ब्लाउज के बटन खोलने लगी। रतन उसके पीछे बैठा, टेड़ी नज़रों से उसकी तरफ देख रहा था।

जैसे ही शोभा के बदन से उसका पेटीकोट अलग हुआ तो रतन का लण्ड फिर से उसकी चड्डी के अन्दर कुलाँचे भरने लगा।

सामने ऊपर से बिल्कुल नंगी शोभा उसकी तरफ पीठ किए खड़ी थी, उसकी कमर जो सांप की तरह बल खा रही थी।
उस पर से रतन चाह कर भी अपनी नज़र हटा नहीं पा रहा था।

शोभा ने अपना ब्लाउज टाँग कर दूसरा पतला सा ब्लाउज पहन लिया, पर उसके हुक बंद नहीं किए और फिर रतन की तरफ मुड़ी।

रतन की साँस मानो जैसे रुक गई हो, उसकी काकी उसके सामने खुले ब्लाउज में खड़ी थी.. उसके एक इंच लम्बे और आधा इंच मोटे चूचुक उसके ब्लाउज में से साफ़ झलक रहे थे।

गोरे रंग की चूचियों पर गहरे भूरे रंग के चूचुक एकदम कयामत ढा रहे थे, जिन्हें बड़ी ही कामुक निगाहों से रतन देख रहा था।

यह देख कर शोभा मन ही मन खुश हो रही थी।

पर अचानक से उसके दिमाग़ में एक सवाल उमड़ा कि क्या जो वो कर रही है, वो ठीक है?

नहीं.. ये बिल्कुल ठीक नहीं है.. मैंने रतन को हमेशा अपने बेटे की तरह माना है। उसे अपने हाथों से पाला-पोसा है…
ये सब ग़लत बात है।

यही सब सोचते हुए, उसने अपना पेटीकोट का नाड़ा खोल कर उसे अपने बदन से अलग कर दिया। एक बार फिर से अंजाने में ही उसने अपनी झाँटों भरी फूली हुई चूत को रतन को दिखा दिया।

रतन के दिमाग़ में शाम की घटना घूम गई।

जब वो उसकी चूत चाट रहा था, तब गुंजा कैसे मस्त होकर तड़फ रही थी और वही तड़फ अपनी काकी के चेहरे पर देखने का ख्याल भोले रतन के मन में आ गया।

जैसे ही शोभा ने अपना पेटीकोट टांगा.. रतन दौड़ता हुआ शोभा के बदन से जा चिपका। उसने अपने घुटनों को ज़मीन पर टिका दिया।

शोभा ने एकदम से हड़बड़ाते हुए रतन को पीछे हटाने की कोशिश करते हुए कहा- क्या.. क्या.. कर रहा है रतन.. पीछे हट…

रतन ने अपने चेहरे को शोभा की जाँघों में छुपाते हुए कहा- काकी वो कल वाला चूहा..

यह कह कर उसने अपने चेहरे को शोभा की जाँघों के बीच.. ठीक चूत के सामने सटा दिया।

रतन के नथुनों से बाहर आ रही गरम सांसों को महसूस करके एक बार फिर से शोभा के बदन वासना की खुमारी छाने लगी।

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शोभा- कहाँ है चूहा.? पीछे हट।

शोभा ने रतन को अपने से अलग करने के कोशिश की और कहा- जा नहीं है… चूहा.. जाकर बैठ..

रतन- नहीं.. पहले आप भी साथ चलो।

यह कहते हुए रतन ने अपने होंठों को शोभा की चूत की फांकों पर रगड़ दिया।

शोभा की तो मानो जैसे साँस ही अटक गई हो, पूरा बदन काँप गया, गला ऐसे सूख गया जैसे कई दिनों से पानी ना पिया हो, पूरा बदन झटके खाने लगा और मुँह से हल्की सी मस्ती भरी ‘आह’ निकल गई।

चूत की फांकों पर होंठ पड़ते ही चूत ने अपने कामरस के खजाने से दो बूँदें बाहर निकल कर बरसों से सूख रही चूत की दीवारों को नम कर दिया।

शोभा ने काँपती हुई मदहोशी से भरी आवाज़ में कहा- रतनऊऊ.. हट नाआ…ओह्ह।

शोभा की मस्ती से भरी सिसकी सुन कर नादान रतन को लगा कि जैसे गुंजा को मज़ा आ रहा था, वैसे ही काकी को भी मज़ा आ रहा है।

रतन शोभा की बातों की तरफ ध्यान नहीं दे रहा था।

‘अच्छा चल मैं साथ चलती हूँ..’ यह कह कर उसने रतन को पीछे के तरफ धकेला, पर रतन अपनी बाँहों को उसकी कमर में कस कर लपेटे हुए था।

जैसे ही रतन पीछे की ओर लुड़का.. पीछे बिस्तर होने के वजह से रतन गिरते हुए बिस्तर पर बैठ गया।

शोभा ने अपने आप को संभालने के लिए रतन को उसके कंधों से थाम लिया, पर अपने आप को संभालने की कोशिश में शोभा की गदराई हुए जाँघें खुल गईं और रतन के होंठ ठीक शोभा की जाँघों के बीच चूत पर आ गए।

रतन ने एकदम से उसकी चूत की फांकों को अपने होंठों में दबा कर खींच दिया।

शोभा के बदन में मानो करंट कौंध गया। आँखें ऐसे खुल गईं..जैसे कभी बंद ही ना हुई हों।

उसने एक बार अपने आप को संभालते हुए.. रतन को पीछे किया। शोभा अब भी वैसी ही हालत में थी।

उसके ब्लाउज के सारे हुक्स खुले हुए थे और नीचे से वो मादरजात नंगी थी।

शोभा ने अपने आपको संभालते हुए लड़खड़ाती हुई आवाज़ में कहा।

‘चल.. अब अब लेट जा.. बहुत रात हो गई है..’

रतन ने शोभा का हाथ पकड़ लिया।

‘काकी आप भी साथ में लेट जाओ ना…’ रतन ने मासूमियत भरे हुए चेहरे से कहा, मन्त्र-मुग्ध हो चुकी शोभा भी बिना कुछ बोले उसी हालत में लेट गई।

दोनों एक-दूसरे की तरफ करवट लिए हुए लेटे थे।
शोभा असमंजस में थी कि उससे क्या हो रहा है।
क्या रतन ये सब जानबूझ कर तो नहीं कर रहा, या फिर ये सब उससे नादानी में हो गया।

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शोभा जैसे ही करवट के बल लेटी, उसके ब्लाउज का पल्लू जो खुला था.. नीचे से ढलक गया।

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उसकी 38 साइज़ की चूचियां बड़े-बड़े गहरे भूरे रँग के चूचुक रतन की आँखों के सामने थे। रतन से रहा नहीं गया और उसने एक ओर नादानी कर दी.. जो शायद शोभा की जिंदगी को बदल कर रख देने वाली थी।

रतन ने शोभा के बड़े-बड़े भूरे रंग के चूचकों की ओर देखते हुए कहा- काकी क्या मुन्ना अभी भी यहाँ से दूध पीता है?

शोभा ने बड़े प्यार से रतन के बालों को सहलाते हुए कहा- नहीं क्यों.. अब वो दूध नहीं पीता।

रतन- तो क्या इसमें अभी भी दूध आता है?

शोभा रतन की बातों से हैरान थी कि रतन ने कभी पहले ऐसे सवाल नहीं किए थे।

‘मुझे नहीं पता.. पर तू क्यों पूछ रहा है?’

रतन- वैसे ही पूछ रहा था.. मैं पीकर देखूं?

शोभा ने हंसते हुए उसके माथे को चूमते हुए कहा- तू दूध पिएगा…. नहीं.. जब बच्चे बड़े हो जाते हैं तो वो ये दूध नहीं पीते।

रतन- नहीं.. मुझे पीना है।

यह कहते हुए रतन ने शोभा का बाएं चूचुक को मुँह में भर लिया। इससे पहले कि शोभा कुछ बोल पाती या करती।

रतन की गरम जीभ को अपने मोटे भूरे रंग के चूचुक पर महसूस करते ही उसके बदन में मस्ती की तेज लहर दौड़ गई।

उसने रतन हटाना चाहा.. पर उसके बदन में मानो जैसे जान ही ना बची हो।

‘आह्ह.. रतन हट जाअ.. ना… कर.. नहीं तो तुझे डांट दूंगी.. ओह्ह से..इईईई रतन बेटा क्या कर रहा है… ओह रुक जा छोरे, नहीं तो तेरी काकी से आज पाप हो जाएगा…आहह।’

पर रतन तो जैसे उसकी बात सुन ही नहीं रहा था, वो इतना उत्तेजित हो गया था कि उसने जितना हो सकता था.. अपना मुँह खोल कर उसकी चूची को मुँह में भर कर चूसना चालू कर दिया।

रतन कोई बच्चा नहीं था.. शोभा की चूचियों को आज तक उसके बच्चों के सिवाए किसी नहीं चूसा था, यहाँ तक कि उसके पति ने भी नहीं।

शोभा की हालत खराब होती जा रही थी, अब वो बदहवासी में बड़बड़ाते हुए रतन को अपने से अलग करने के नाकामयाब कोशिश कर रही थी।

रतन पूरे ज़ोर से उसकी चूची के चूचुक को चूस रहा था, बरसों से दबा कामवासना का ज्वालामुखी फिर से दहकने लगा था।

अपने आप को इस पाप से बचाने के लिए शोभा ने आख़िर कोशिश की.. उसने रतन को कंधों से पकड़ कर पीछे हटाना चाहा.. पर रतन पीछे हटता।

उसके उलट वो खुद पीछे के ओर होते हुए एकदम सीधी हो गई।

पर रतन तो उससे ऐसे चिपका हुआ था.. मानो उसे अपनी काकी से कोई अलग ना कर सकता हो।

नतीजा यह हुआ कि अब शोभा पीठ के बल सीधी लेटी हुई थी और रतन उसके ऊपर झुका हुआ उसकी चूची को चूस रहा था..
उसका धड़ का नीचे वाला हिस्सा बिस्तर पर था।

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रतन ने शोभा की चूची चूसते हुए नीचे की तरफ देखा.. उसकी कमर रह-रह कर झटके खा रही थी।
नीचे घुंघराले बालों से भरी हुई चूत का नज़ारा कुछ और ही था।

रतन को याद आया कि वो लड़का कैसे गुंजा के ऊपर चढ़ कर उससे चोद रहा था.. ये सोचते ही रतन शोभा के ऊपर आ गया।

बदहवास हो चुकी शोभा को समझ में नहीं आ रहा था कि आख़िर हो क्या रहा है, इससे पहले के शोभा कुछ और कर पाती.. रतन शोभा के ऊपर आ चुका था।

उसका लण्ड उसकी चड्डी में एकदम तना हुआ था, जिससे वो ठीक शोभा काकी की चूत की फांकों के बीच आ टिका।

शोभा- आह.. रतन.. हट जाअ.. ओह ओह्ह तुम एई… सब्बब्ब सब्बब्ब क्यों ओह्ह..

शोभा इससे आगे नहीं बोल पाई, उसकी आँखें मस्ती में बंद हो गईं.. हाथ अपने भतीजे की पीठ पर आ गए और कामातुर होकर वो अपने भतीजे की पीठ को सहलाने लगी।

रतन समझ गया कि अब उसकी काकी को भी मजा आने लगा है।

अपनी चूत के मुहाने पर रतन के सख्त लण्ड को महसूस करके शोभा एकदम मदहोश हो गई।

उधर रतन अपनी जाँघों को शोभा की जाँघों के बीच में करने की कोशिश कर रहा था.. क्योंकि गुंजा ने भी चुदते वक़्त अपनी जाँघों को फैला कर उस लड़के की कमर पर लिपटाए रखा था और जब रतन का लण्ड झटका ख़ाता।

तो शोभा की चूत में सरसराहट दौड़ जाती और उसकी चूत लण्ड लेने के लिए मचलने लग जाती।

ऊपर तो रतन ने शोभा की चूची के चूचुक का चूस कर एकदम लाल कर दिया था।

शोभा के चूचक एकदम कड़क हो गए थे और नीचे रतन अपनी जाँघों को शोभा की जाँघों के बीच में सैट करने की कोशिश कर रहा था।
इसी धींगा-मस्ती में रतन का लण्ड चड्डी के ऊपर से शोभा की चूत की फांकों को फैला कर चूत के छेद पर जा लगा।

‘ओह्ह रतन..’ शोभा ने सिसयाते हुए अपनी जाँघों को ढीला छोड़ दिया।

रतन की जाँघें अब शोभा काकी की जाँघों के बीच में आ गईं।

रतन ने अपना एक हाथ नीचे ले जाकर अपने चड्डी को नीचे सरकाना शुरू किया।

जब शोभा को इस बात का अहसास हुआ तो शोभा एकदम से हैरान रह गई और मन ही मन सोचने लगी- हे भगवान ये छोरा क्या करने जा रहा है। कहाँ से सीखा इसने ये सब.. मुझे इससे यहीं रोक देना चाहिए।

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एक लम्बी कथा जारी है।

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