गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा-32

Gendamal Halwai Ka Chudakkad Kunba-32

शोभा ने अपनी नशीली आँखों को बड़ी मुश्किल से खोला और रतन की तरफ देखा.. जो उसकी अब दूसरी चूची को चूसने में लगा हुआ था और फिर कहा- ये क्या कर रहा है… रतन ये.. ठीक नहीं है बेटा ओह्ह..’

रतन ने अपने दाँतों को हल्का सा शोभा के चूचुक पर गड़ा दिया.. शोभा के आँखें फिर से मस्ती और दर्द के कारण बंद हो गईं।

पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी.. रतन ने अपनी चड्डी को अपनी जाँघों तक सरका दिया था और अपने लण्ड को उसकी चूत की फांकों पर रख कर पागलों की तरह धक्के लगाने लगा।

नादान रतन को चूत का छेद नहीं मिला.. पर अपने लण्ड के सुपारे को शोभा की चूत की फांकों और इधर-उधर रगड़ते हुए रतन पागल हुआ जा रहा था।

वो लगातार अपने लण्ड को उसकी चूत की फांकों पर रगड़ने लगा।

शोभा कामवासना से बेहाल हो गई और वो रतन की पीठ को अपने हाथों से और तेज़ी से सहलाने लगी..

जब रतन का लण्ड शोभा की चूत की फांकों के बीच रगड़ ख़ाता हुआ.. उसकी चूत के दाने से घिसटता.. तो शोभा का पूरा बदन मस्ती की लहर में काँप जाता।

शोभा की चूत में से पानी निकल कर उसकी गाण्ड के छेद को भिगोने लगा और वो अपनी गाण्ड के छेद पर गीला पर महसूस करके और मदहोश हो गई।

शोभा- आह रुक जा बेटा… मैं ये पाप नहीं कर सकती… ओह रतन में पागल हो जाऊँगी.. रुक जा.. अह रुक जा..

शोभा अब पूरी तरह गरम हो चुकी थी, उसकी चूत का छेद कभी सिकुड़ता और कभी फ़ैलता, उससे अब और रुक पाना बर्दाश्त के बाहर था।
कामातुर होकर शोभा ने अचानक से रतन के चेहरे को अपने दोनों हाथों से पकड़ कर ऊपर उठा दिया।
उसका चूचुक खींचता हुआ रतन के मुँह से बाहर आ गया।
मस्ती की मीठी लहर उसके बदन में दौड़ गई।
दोनों एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे।

शोभा बुरी तरह हाँफ रही थी, उसकी चूचियां साँस लेने से ऊपर-नीचे हो रही थीं.. फिर अचानक से जैसे एक तूफान आ गया हो.. उसने पलक झपकते ही, रतन के होंठों को अपने होंठों में भर लिया और पागलों की तरह उसके होंठों को चूसने लगी।

रतन को चुदाई के खेल में मानो एक नई चीज़ मिल गई हो, वो भी अपनी काकी के क़दमों पर चलते हुए, उसके होंठों को चूसने की कोशिश करने लगा, पर कहाँ एक भरे-पूरे जवान मदमस्त गदराई हुई औरत और कहाँ वो रतन.. जो अभी जवानी की दहलीज पर कदम रख रहा था।

वो भला शोभा का क्या मुक़ाबला कर पाता, पर कामवासना में जलती हुई शोभा ने मानो जैसे अपने आप को उस लड़के के सामने समर्पित कर दिया हो।

शोभा ने अपने होंठों को हल्का सा खोल कर ढीला छोड़ दिया.. रतन तो जैसे सातवें आसामान में उड़ रहा था।

वो पागलों की तरह शोभा के होंठों पर टूट पड़ा और उसके होंठों को चूस-चूस कर लाल करने लगा।

अपने रसीले होंठों को एक नई उम्र के लौंडे से चुसवाते हुए, शोभा बहुत ज्यादा उतेज़ित हो रही थी।

नीचे रतन अभी भी अपनी कमर को चोदने वाले ढंग से हिला रहा था।
होंठों को चूसते हुए उसको ये भी नहीं पता था कि उसका लण्ड अब शोभा के गदराए हुए पेट पर रगड़ खा रहा है।
शोभा अब पूरी तरह बहक चुकी थी।

उसने अपनी जाँघों को पूरा खोल कर फैला लिया और अपना एक हाथ नीचे ले जाकर रतन के लण्ड को पकड़ लिया।

काकी के नरम हाथों का स्पर्श अपने लण्ड पर पाते ही रतन ने अपनी कमर हिलाना बंद कर दिया और अपने होंठों को काकी के होंठों से हटाते हुए.. उसकी तरफ देखने लगा।

शोभा ने बड़ी मुश्किल से अपनी आँखों को खोल कर रतन के तरफ देखा।

शोभा ने थरथराती आवाज में कहा- तुझे पता है… तू क्या करने जा रहा है?

रतन ने मासूमियत के साथ कहा- काकी मैं तुम्हें चोदने जा रहा हूँ।

शोभा को यकीन नहीं हो रहा था.. जो रतन कह रहा है, पर अब शोभा के पास सोचने का वक़्त नहीं था।

उसने रतन के लण्ड को पकड़ कर अपनी चूत के छेद पर उसके सुपारे को लगा दिया।

गरम सुपारे को अपनी रिसती हुई चूत के छेद पर महसूस करते ही.. शोभा के बदन में बिजली सी कौंध गई।

रतन को लगा जैसे उसका लण्ड किसी जलती हुई चीज़ के साथ लगा दिया गया हो।

शोभा ने अपनी आँखें बंद किए हुए उखड़ी हुई आवाज़ में बोला- ले मेरे लाल चोद ले अपनी काकी को..

ये कहते हुए शोभा ने अपनी जाँघों को फैला कर घुटनों से मोड़ कर ऊपर उठा लिया और रतन के लण्ड को जड़ से पकड़ कर अपनी चूत को ऊपर की तरफ करने लगी।

रतन का लण्ड शोभा की गीली चूत की फांकों को फ़ैलाता हुआ अन्दर घुसने लगा।

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शोभा रतन के लण्ड के सुपारे को अपनी चूत की दीवारों पर महसूस करके बेहाल होने लगी।

धीरे-धीरे रतन का आधा लण्ड शोभा की चूत में चला गया और रतन ने जोश में आकर जोरदार धक्का मारा, उसका लण्ड काकी की चूत में फिसलता हुआ चूत की गहराईयों में समा गया।

‘आह्ह.. रतन… चोदद्द डाल.. अपनी काकी को ओह्ह से..इईईईई…’ शोभा ने सिसयाते हुए कहा।

शोभा की चूत में लण्ड पेल कर रतन खुशी से फूला नहीं समा रहा था, पर वो ये सब पहली बार कर रहा था और उससे डर था कि वो कहीं कुछ ग़लत ना कर दे।

रतन ने शोभा की और देखते हुए कहा- काकी अब क्या करूँ?

शोभा ने मदहोशी भरी आवाज़ में कहा- अब अपने लण्ड को धीरे-धीरे अन्दर-बाहर कर.. पूरा बाहर मत निकालना.. आह्ह..

रतन ने धीरे-धीरे से अपने आधे लण्ड को बाहर निकाला और फिर से अन्दर करने लगा, पर जैसे ही उससे अपने लण्ड के सुपारे पर चूत की दीवारों से रगड़ खा कर पैदा हुई सनसनी महसूस हुई.. रतन अपना आपा खो बैठा और उसने पूरी रफ़्तार से अपने लण्ड को शोभा की चूत में ठूँस दिया।

शोभा तो मानो ऐसे लण्ड के धक्के के साथ स्वर्ग में पहुँच गई हो।
उसकी चूत की दीवारों ने उसके लण्ड को जकड़ लिया।
मानो अन्दर ही अन्दर उसके लण्ड को निचोड़ रही हो और चूम रही हो।

‘ओह रतन मैं पागल हो जाऊँगी… चोद ना.. मुझे चोद.. अपनी काकी की फुद्दी को… ओह बहुत सुकून मिला है.. आज्ज्जज्ज.. तेरी काकी की चूत…को..’
ये कहते हुए शोभा ने अपने पैरों को मोड़ कर रतन की कमर पर लपेट लिया।

रतन के चेहरे को अपने हाथों से भर कर उसके होंठों पर फिर से अपने होंठों को रख दिया।

रतन एक बार फिर से अपनी काकी के रसीले होंठों का रसपान करने लगा।

नीचे से उसकी काकी लगातार गाण्ड को ऊपर की ओर उछालते हुए, रतन के लण्ड को अपनी चूत के अन्दर ले रही थी।

चूत गीली होने के कारण रतन का लण्ड आसानी से उसकी चूत के अन्दर-बाहर हो रहा था और शोभा भी अपनी गाण्ड उछाल-उछाल कर रतन का साथ दे रही थी।

कामवासना की आग में जल रही शोभा पहले से ही बहुत ज्यादा गरम थी।

वो खुद ही अपने हाथों से अपनी चूचियों के चूचकों को मसल रही थी।

दरअसल वो जानती थी कि रतन उससे बीच रास्ते में छोड़ सकता है और इतने दिनों बाद चुदाने के बाद वो अगर नहीं झड़ती, तो शायद पागल हो जाती।

रतन का लगातार आत्मविश्वास बढ़ता जा रहा था और उसके धक्कों की रफ्तार तेज होती जा रही थी।
जो शोभा को उस चरम सुख की ओर ले जा रही थी… जो उसे कई सालों बाद मिलने वाला था।

फिर तो जैसे वासना का भूत शोभा पर सवार हो गया, उसने अपनी बाँहों को रतन के पीठ पर कस लिया और पूरी रफ़्तार से अपनी गाण्ड को ऊपर की ओर उछालते हुए रतन के लण्ड पर अपनी चूत पटकने लगी।

शोभा- आह्ह.. रतन मेरे बच्चे.. उहह ओह्ह..इईईई आह्ह.. आह बस.. मेरे लाल.. थोड़ा औ..र ओह ओह..

रतन- काकी मेरा पानी निकलने वाला है।

शोभा- आह्ह.. ओह्ह चोद मुझे ओह मेरी.. चूत में निकाल दे…अई ओह ओह्ह..

शोभा का बदन एकदम से अकड़ गया।
झड़ते हुए उसका बदन बुरी तरह से काँप रहा था, रतन भी शोभा की चूत की गरमी को झेल ना पाया और उसकी चूत में अपने पानी की बौछार कर दी।

जब थोड़ी देर बाद शोभा को होश सा आया तो उसने अपने आप को रतन के नीचे एकदम नंगा पाया। उसका लण्ड झड़ने के बाद भी पूरी तरह से सिकुड़ा नहीं था।
शोभा अभी भी अपनी चूत में रतन के अधखड़े लण्ड को महसूस कर पा रही थी।

उसने रतन को अपने ऊपर से हटाया और बिस्तर पर उठ कर बैठ गई।
उसकी चूत से ढेर सारा पानी बाहर की तरफ बह रहा था, अपनी चूत से निकल रहे गरम पानी को देख एक बार तो शोभा के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई..पर फिर मन में विचार आया, ‘कहीं उसने कुछ ग़लत तो नहीं कर दिया… रतन का क्या…वो तो अभी बच्चा है…पर मुझे नहीं बहकना चाहिए था।’

शोभा बिस्तर से नीचे उतरी और अपना पेटीकोट पहन बाहर चली गई.. रतन ने भी अपनी चड्डी ऊपर की और लेट गया, दिन में दो बार झड़ने के कारण रतन को जल्द ही नींद आ गई।

उधर शोभा के मन में तूफान उठा हुआ था। वो इस सारी घटना का खुद को ज़िम्मेदार मान रही थी, उसने मन ही मन सोच लिया था कि आज जो हो गया। वो फिर दोबारा कभी नहीं होने देगी।

अपनी चूत साफ़ करने के बाद शोभा जब कमरे में आई, तब तक रतन सो चुका था।
शोभा ने दरवाजे बंद किए और रतन की तरफ पीठ करके सो गई।

एक लम्बी कथा जारी है।

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