गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा-33

Gendamal Halwai Ka Chudakkad Kunba-33

शोभा बिस्तर से नीचे उतरी और अपना पेटीकोट पहन बाहर चली गई.. रतन ने भी अपनी चड्डी ऊपर की और लेट गया.. दिन में दो बार झड़ने के कारण रतन को जल्द ही नींद आ गई।

उधर शोभा के मन में तूफान उठा हुआ था।
वो इस सारी घटना का खुद को ज़िम्मेदार मान रही थी, उसने मन ही मन सोच लिया था कि आज जो हो गया, वो फिर दोबारा कभी नहीं होने देगी।

अपनी चूत साफ़ करने के बाद शोभा जब कमरे में आई, तब तक रतन सो चुका था।
शोभा ने दरवाजे बंद किए और रतन की तरफ पीठ करके सो गई।

करीब आधी रात के 2 बजे अचानक से शोभा की नींद टूटी.. उसे अपनी चूत पर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ, जिसे महसूस करके शोभा की आँखें पूरी तरह खुल गईं।

कमरे में अभी भी लालटेन जल रही थी।
एक बार उसने उस तरफ देखा, जहाँ पर रतन लेटा हुआ था, पर रतन अपनी जगह पर नहीं था।

तभी उसके बदन में एकदम से सिहरन सी दौड़ गई।
उसे अपनी चूत के छेद पर कुछ गरम सा अहसास हुआ और शोभा को समझते देर ना लगी कि ये मखमली और गरम स्पर्श रतन की जीभ का है।

शोभा ने एकदम चौंकते हुए अपना सर उठा कर अपनी फैली हुई टाँगों के बीच में देखा.. काकी के बदन में हरकत महसूस करते ही, रतन ने भी अपने मुँह को चूत से हटा लिया और शोभा के चेहरे की ओर देखने लगा।

शोभा की आँखों में नींद और मस्ती की खुमारी भरी हुई थी।

शोभा ने कुछ बोलने के लिए अभी मुँह खोला ही था कि रतन ने फिर से काकी की चूत के छेद पर अपना मुँह लगा दिया।

‘आह रतन..’ शोभा के मुँह से मस्ती भरी हुई धीमी सी आवाज़ निकाली और उसकी आँखें फिर से बंद हो गईं।

रतन ने अपने दोनों हाथों से उसकी जाँघों के नीचे से घुटनों से पकड़ कर उसकी टाँगों को मोड़ कर ऊपर उठा दिया।
शोभा की गदराई हुई जाँघें एकदम फ़ैल गईं।
उसकी चूत का गुलाबी छेद अब रतन के आँखों के सामने नुमाया हो गया।

रतन अपनी चाहत भरी नज़रों से उसकी चूत की लबलबा रहे छेद को देख रहा था और अपनी जीभ को बाहर निकाल जीभ के नोक को उसकी चूत की फांकों को फैला कर चूत के गुलाबी हिस्से को चाट रहा था..

शोभा बिस्तर पर लेटी हुई मचल रही थी, उसको समझ नहीं आ रहा था कि आख़िर वो रतन को कैसे रोके..
क्योंकि रतन से ज्यादा उसकी चूत लण्ड लेने के लिए मचल रही थी।

फिर अचानक से शोभा को अपनी चूत पर रतन की जीभ का महसूस होना बंद हो गया.. शोभा ने अपनी आँखें खोल कर देखा.. तो रतन उसके ऊपर झुका हुआ था।

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शोभा की चूत का कामरस उसके होंठों पर लगा हुआ था और वो अपने होंठों को शोभा के होंठों की तरफ बढ़ा रहा था।

शोभा ने अपना चेहरा दूसरी तरफ कर लिया।
जिससे रतन के होंठ शोभा के सेब जैसे लाल गालों से आ टकराए और वो अपनी काकी के लाल गालों को चूमने लगा..

नीचे उसका लण्ड काकी की चूत की फांकों से बार-बार टकरा रहा था।

जैसे वो काकी की चूत को अपने अन्दर लेने के गुज़ारिश कर रहा हो, जिससे महसूस करके शोभा ना चाहते हुए भी फिर से मदहोश हुए जा रही थी।

जब रतन ने देख कि उसके काकी अपने होंठों को उसके होंठों से बचाने की कोशिश कर रही है, तो उसने भी कोई ज्यादा ज़ोर नहीं दिया और झुक कर एक झटके में उसके ब्लाउज के हुक्स खोल दिए और काकी की एक चूची को मुँह में जितना हो सकता था, भर लिया।
रतन की गरम जीभ अपने एक इंच लंबे और मोटे चूचुक पर महसूस करते ही.. शोभा एकदम से मदहोश हो गई।

उसके पूरे बदन में बिजली की सरसाहरट कौंध गई।

शोभा के बदन के रोम-रोम में मस्ती की लहर दौड़ गई।

‘आह रतन हट ना..’ शोभा ने रतन से सिसयाते हुए कहा..पर रतन पूरी लगन के साथ उसके चूचुक को चूसने लगा।

उसका लण्ड पूरी तरह तना हुआ किसी लोहे की रॉड की तरह काकी की चूत की फांकों पर रगड़ ख़ाता हुआ अन्दर घुसने का रास्ता खोज रहा था।

जब बीच में उसका लण्ड शोभा की चूत की फांकों को रगड़ खा कर उसकी चूत के छेद से रगड़ ख़ाता।

तो शोभा के बदन में काम ज्वाला भड़क उठती।

इसी उथल-पुथल में रतन का तना हुआ लण्ड खुद ब खुद ही उसकी चूत के छेद पर आ टिका।

अपने भतीजे के लण्ड को अपनी चूत के छेद पर महसूस करके शोभा एकदम से मचल उठी और उसका अपनी कमर और गाण्ड पर काबू ना रहा।

काम-विभोर होकर शोभा की गाण्ड ऊपर की ओर उठने लगी और रतन के लण्ड का सुपारा शोभा की चूत के छेद के अन्दर सरकने लगा।
जैसे ही शोभा की चूत के छेद में रतन के लण्ड का सुपारा घुसा, शोभा का पूरा बदन मस्ती में काँप गया।

उसने अपने होंठों को अपने दाँतों से काटते हुए मस्ती भरी सिसकारियाँ भरना शुरू कर दीं।

शोभा ने रतन की पीठ पर तेज़ी से अपने दोनों हाथ घुमाते हुए कहा- आह्ह.. रतन ओह डाल दे..अपना लण्ड अपनी काकी की फुद्दी में आह्ह.. मेरी जान…

शोभा अभी भी लगातार अपनी गाण्ड को धीरे-धीरे ऊपर की ओर उठा रही थी और रतन का लण्ड अपनी काकी की चूत में धीरे-धीरे अन्दर बढ़ रहा था।

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काकी की चूत ने एक बार फिर से अपने भतीजे के लण्ड का चूम कर स्वागत किया और चूत ने अपनी दीवारों के बीच लण्ड के सुपारे को जकड़ लिया।

रतन अपनी काकी को एक बार से चुदाई के लिए तैयार देख कर जोश में आ गया और अपनी पूरी ताक़त से जोरदार झटका मारा।

रतन का बाकी का लण्ड भी शोभा की चूत में समा गया।

अपने भतीजे के इस जोरदार धक्के से शोभा का पूरा बदन हिल गया।

उसके होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई और बदन में कामवासना और भड़क उठी।

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शोभा ने रतन के चेहरे को अपने हाथों में लेते हुए कहा- आहह.. रतन तू ऐसा क्यों कर रहा है, तुमने मुझसे आख़िर ये पाप करवा ही दिया।

रतन- नहीं काकी.. मैं तो आप को प्यार करता हूँ।

रतन की बात सुन कर शोभा ने उसके होंठों को अपने होंठों में भर लिया और दोनों एक-दूसरे के होंठों को चूसने लगे।
नीचे रतन धीरे-धीरे अपने लण्ड को काकी की चूत में अन्दर-बाहर कर रहा था और लगातार उसके होंठों को चूसते हुए उसकी चूचियों को दबा रहा था।

शोभा भी अपनी जाँघें पूरे खोले हुए, अपनी गाण्ड को धीरे-धीरे ऊपर की और उछाल कर रतन का लण्ड ले रही थी।

कामवासना ने उन दोनों को रिश्ते को ताक पर रख दिया और शोभा को अपनी जवानी की आग को शांत करने के लिए एक जवान लण्ड मिल गया था।

रतन धीरे-धीरे इस खेल में अब माहिर होता जा रहा था.. अब कभी धक्का मारते वक़्त अगर उसका लण्ड अगर काकी की चूत से बाहर भी जाता, तो वो बिना पलक झपकाए अपने लण्ड को दोबारा काकी की चूत की गहराईयों में उतार देता।

तो दोस्तो, यह था.. रतन और शोभा की जिंदगी का इतिहास.. जो अब रज्जो के लिए नासूर बन गया था।

रज्जो अपनी माँ-बाप की ग़रीबी के चलते अपने आप को बेसहारा महसूस कर रही थी।

दूसरी तरफ राजू जैसे स्वर्ग में पहुँच गया था। ना किसी काम की चिंता, ना कोई फिकर..

सुबह-सुबह जब राजू उठा तो उसने देखा कि कुसुम बिस्तर पर एकदम नंगी उल्टी लेटी हुई थी, उसके और राजू के ऊपर रज़ाई पड़ी थी।
राजू कुसुम की तरफ पलटा और कुसुम की गाण्ड को सहलाने लगा, जिससे कुसुम भी जाग गई।

उसने राजू के हाथ को अपनी गाण्ड पर रेंगता हुआ महसूस किया, तो उसके होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई।

उसने अपनी खुमारी भरी आँखों को खोल कर राजू की तरफ मुस्कुराते हुए देखा।

‘कब उठे तुम?’ कुसुम ने राजू से पूछा।

‘अभी थोड़ी देर पहले..’ ये कहते हुए राजू कुसुम के ऊपर आ गया।

कुसुम उल्टी लेती हुई थी.. जिसके कारण राजू का लण्ड कुसुम की गाण्ड की दरार में जा धंसा।

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राजू के गरम लण्ड को अपनी गाण्ड के छेद पर महसूस करके कुसुम मदहोश हो गई।

‘आह.. क्या कर रहे हो.. सुबह-सुबह ये… तू भी ना राजू…’ कुसुम ने अपनी गाण्ड को धीरे-धीरे से इधर-उधर हिलाते हुए कहा।
जिसे राजू का लण्ड का सुपारा ठीक उसकी गाण्ड के छेद पर जा लगा।

‘आह्ह.. सी..इईईईईई राजू..’ कुसुम एकदम मस्तया गई।

यह देख कर राजू ने झुक कर कुसुम के होंठों को अपने होंठों में भर कर चूसना चालू कर दिया।

राजू का लण्ड उसकी गाण्ड के छेद पर तना हुआ दस्तक दे रहा था।

कुसुम ने अपने होंठों को राजू के होंठों से अलग करते हुए कहा- ओह्ह.. क्या इरादा है तुम्हारा? कहीं.. अपनी मालकिन की गाण्ड तो नहीं मारनी?

राजू- मैं तो कब से आप से भीख माँग रहा हूँ.. पर आप करने ही नहीं देतीं।

कुसुम- नहीं राजू.. मुझे बहुत डर लगता है… मैंने कभी गाण्ड में किसी का लण्ड नहीं लिया..

तभी दरवाजे पर आहट हुई.. राजू कुसुम के ऊपर से उठ कर नीचे बगल में लेट गया और लता कमरे में दाखिल हुई।

अपनी बेटी और राजू को रज़ाई के अन्दर नंगे देख कर लता के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई।

‘तुम खुश हो ना यहाँ बेटी?’ लता ने कुसुम की तरफ देखते हुए कहा।

‘हाँ माँ.. मुझे भला यहाँ तुम्हारे रहते हुए क्या परेशानी हो सकती है..’ कुसुम ने भी अंगड़ाई लेते हुए कहा।

लता ने मेज पर चाय रखी और मुड़ कर चली गई।

लता के जाते ही, राजू ने एक बार फिर से कुसुम को अपनी बांहों में भर लिया.. पर कुसुम ने राजू को पीछे हटा दिया, ‘हटो ना रात भर सोने नहीं दिया.. अब तो बस करो।’

यह कह कर कुसुम उठ कर अपने साड़ी पहनने लगी।

राजू भी बेमन से उठा और अपने कपड़े पहन कर चाय पी कर बाहर चला गया।

दूसरी तरफ रतन को आज रज्जो को उसके मायके लेकर जाना था।

रतन के घर वाले इसकी तैयारी कर रहे थे और फिर रतन और रज्जो को तांगें में बैठा कर उसके घर के लिए रवाना कर दिया।

जब रज्जो अपने पति रतन के साथ अपने मायके पहुँची, तो चमेली अपनी बेटी और जमाई को देख कर बहुत खुश हुई.. उसने और उसके पति ने अपने जमाई के बहुत आवभगत की।

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एक लम्बी कथा जारी है।

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