गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा 5

Gendamal halwai ka chudakkad kunba-5

बिस्तर लगाने के बाद रज्जो अपने बिस्तर पर पसर गई, उसे घर में राजू जैसे अंजान लड़के के होने से कोई फरक नहीं पड़ रहा था ऐसा शायद नींद की वजह से था।

रज्जो बिस्तर पर पेट के बल लेट गई, जिसके कारण पीछे से उसकी भरी हुई गाण्ड बाहर की ओर आ गई थी।

वो उस समय सलवार-कमीज़ पहने हुए थी।

उसकी सलवार उसके चूतड़ों पर एकदम कसी हुई थी, जिसे देखे वगैर राजू से रहा नहीं गया।

अपनी बेटी की गाण्ड को यूँ घूरता देख कर चमेली ने राजू की तरफ तीखी आँखों से देखा और फिर रज्जो के ऊपर रज़ाई उढ़ा दी और बुदबुदाते हुए बिस्तर पर लेट गई।

राजू वहाँ ठगा सा खड़ा था।

जब चमेली ने अपने ऊपर रज़ाई ओढ़ते हुए राजू की तरफ देखा तो वो अभी भी रज्जो की तरफ ही देख रहा था।

‘अब तूँ क्यों वहाँ खड़ा है? चल लेट जा.. सुबह सेठ के घर जाकर बहुत काम करना है।’ चमेली ने तीखी आवाज में कहा।

राजू- जी।

राजू चमेली के साथ वाले बिस्तर पर लेट गया, उसके लण्ड पर आज बहुत ज़ुल्म हो रहा था।

अभी भी उसका लण्ड एकदम तना हुआ था।

उसने अपने ऊपर रज़ाई ओढ़ी और अपने पजामे का नाड़ा खोल कर अपना हाथ अन्दर सरका कर अपने लण्ड को पकड़ कर हिलाना चालू कर दिया।

रज़ाई के अन्दर चलते हाथ से थोड़ी सरसराहट होने लगी।

चमेली पीठ के बल लेटी हुई थी। जब उसने वो आवाज़ सुनी तो उसने कनखियों से राजू की तरफ देखा।

उसकी रज़ाई कमर वाले हिस्से से थोड़ा हिल रही थी।

चमेली समझ गई कि छोरा अपना लण्ड को हिलाते हुए मुठ्ठ मार रहा है।

यह बात दिमाग़ में आते ही उसके दिल के धड़कनें बढ़ गईं।

उसकी चूत की फाँकें यह सोच कर कुलबुलाने लगीं कि उसके बगल में एक जवान लड़का लेटा हुआ अपना लण्ड हिला कर मुठ्ठ मार रहा है।

यह सब चमेली के बर्दाश्त से बाहर था।

लेटे हुए चमेली के दिमाग़ में पता नहीं क्या आया, उसने अपनी करवट बदली और राजू की तरफ अपनी पीठ कर ली।

आवाज़ सुन कर राजू एक पल के लिए रुक गया, जब उसने देखा कि चमेली ने दूसरी तरफ मुँह कर लिया है.. उसने फिर से अपने लण्ड को हिलाना चालू कर दिया।

उसका लण्ड अब पूरी तरह अकड़ा हुआ था, वो तेज़ी से अपने लण्ड को हिलाए जा रहा था।

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मस्ती के कारण उसकी आँखें बंद हो गईं। कुछ देर बाद फिर से कुछ आहट हुई.. राजू झड़ने के बेहद करीब था.. आहट सुनकर राजू एकदम से घबरा गया और उसने अपने लण्ड को हिलाना बंद कर दिया।

फिर अपनी अधखुली आँखों से चमेली की तरफ देखा।

चमेली अभी भी करवट बदल कर ही लेटी हुई थी।

जब राजू ने अपनी नज़र को थोड़ा सा नीचे किया, तो उसका मुँह खुला का खुला रह गया।

चमेली की पीठ अभी भी उसकी तरफ थी।

चमेली के बदन के कमर के ऊपर वाला हिस्सा रज़ाई में था और कमर से नीचे वाला हिस्सा रज़ाई से बाहर था।

उसने अपने घुटनों को मोड़ कर अपने पेट से सटा रखा था और उसका लहंगा, उसकी कमर के ऊपर तक चढ़ा हुआ था। ऊपर की तरफ का पूरा बदन ढका हुआ था ताकि रज्जो अगर जाग भी जाए तो चमेली को इस हालत में ना देख सके।

पीछे से उसकी गाण्ड बाहर की तरफ निकली हुई थी, जिसे देखते ही उसका लण्ड फिर से झटके खाने लगा।

जिस अवस्था में राजू लेटा हुआ था,उस अवस्था में उसे उसकी गाण्ड का ऊपर हिस्सा ही दिखाई दे रहा था।

पर इतना देखने भर से ही उसके लण्ड में जो कसाव आया, वो उसकी बर्दाश्त से बाहर था।

राजू धड़कते हुए दिल के साथ धीरे से उठा और जिस तरफ चमेली के पैर थे, उस तरफ सरक कर लेट गया।

भले ही चमेली का मुँह दूसरी तरफ था, पर उसे पता था कि उसकी पीठ के पीछे राजू क्या कर रहा है।

जैसे ही राजू उसके पैरों की तरफ लेटा, चमेली ने अपने घुटनों को और मोड़ कर पेट से सटा लिया।

चमेली की जाँघें आपस में सटी हुई थीं।

वाह.. क्या नज़ारा था..!

राजू की आँखों के सामने, सटी हुई जाँघों के बीच चमेली की चूत बाहर की तरफ निकली हुई दिखाई दे रही थी।

गहरे गुलाबी रंग की फांकों को देख राजू का हाथ एक बार फिर से अपने आप चलने लगा।

चमेली दूसरी तरफ मुँह किए लेटी हुई, राजू की तेज चल रही साँसों को साफ़ सुन पा रही थी।

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राजू अब पूरी रफ़्तार से चमेली की चूत को देखते हुए अपने लण्ड को हिलाने लगा, उसका लण्ड और चमेली की चूत के बीच मुश्किल से एक फुट का फासला था।

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उसके लण्ड की नसें अब पूरी तरह वीर्य से भर चुकी थीं और अगले ही पल राजू के आँखें बंद हो गईं और उसके लण्ड से एक के बाद एक वीर्य के पिचकारियाँ छूटने लगीं, जो सीधा जाकर सामने लेटी चमेली की चूत और चूतड़ों पर गिरने लगी।

इस बात से अंजान राजू अपनी आँखें बंद किए जन्नत की सैर कर रहा था।

जैसे ही राजू का गरम वीर्य की धार चमेली की चूत की फांकों और चूतड़ों पर गिरी, चमेली के पूरे बदन में सिहरन दौड़ गई..

उसकी चूत की फाँकें गरम वीर्य को महसूस करते ही कुलबुलाने लगीं।

चमेली के ऊपर अजीब सा नशा छा गया था।

उसकी आँखें मस्ती में बंद हो गईं और वो आँखें बंद किए राजू के वीर्य को अपनी चूत की फांकों पर बहता हुआ महसूस करने लगी।

थोड़ी देर बाद जब राजू की आँखें खुलीं, तो चमेली की चूत पर अपने वीर्य को देख कर एकदम से घबरा गया, उसे कुछ समझ में ही नहीं आया।

उसने दूसरी तरफ करवट बदली और रज़ाई ओढ़ कर लेट गया, ये सोच कर कि चमेली को पता ना चले..

जैसे ही राजू ने दूसरी तरफ मुँह किया, चमेली ने अपने आप को अच्छे से रज़ाई से ढक लिया।

उसने अपना एक हाथ पीछे ले जाकर अपने चूतड़ों और चूत की फांकों को छुआ, उसके हाथ की ऊँगलियाँ राजू के लण्ड से निकले वीर्य से सन गईं।

उसने अपनी चूत पर लगे वीर्य पर अपनी उँगलियों को घुमाया और फिर पता नहीं उसके दिमाग़ में क्या आया, उसने राजू के वीर्य से सनी अपनी एक ऊँगली को अपनी चूत में घुसा लिया और अन्दर-बाहर करने लगी।

उसके दिमाग़ में जैसे राजू के लण्ड की छवि सी बन गई थी, जिसे अभी तक उसने देखा भी नहीं था।

वो अपनी ऊँगली को तेज़ी से अन्दर-बाहर करने लगी और मन में कल्पना करने लगी कि राजू का लण्ड उसकी चूत के अन्दर-बाहर हो रहा है..

पर उस पतली से ऊँगली से उसकी चूत की आग कहाँ बुझने वाली थी।

वो तो और भड़क रही थी, आख़िर हार कर चमेली ने अपने लहँगे को ठीक किया और सीधी होकर लेट गई।

अगली सुबह जब चमेली उठी तो उसने देखा कि ना तो रज्जो अपने बिस्तर पर है और ना ही राजू बिस्तर पर है।

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वो जल्दी से बिस्तर से उठी और आँगन में आई।

रज्जो बाहर आँगन में झाड़ू मार रही थी, पर राजू नहीं था।

‘वो राजू कहाँ गया है?’ चमेली ने रज्जो से पूछा।

रज्जो- वो तो बाहर गया है शौच के लिए।

यह कह कर रज्जो फिर से झाड़ू लगाने लगी।

चमेली ने मुँह-हाथ धोया और चाय बनाने लगी।

थोड़ी देर बाद राजू भी आ गया, चाय पीने के बाद चमेली राजू को लेकर गेंदामल के घर पहुँच गई।

गेंदामल उस समय नहाने जा रहा था, राजू को देख कर वो रुक गया और बोला- अरे राजू जब तक चमेली नाश्ता तैयार करती है, तू खुद जाकर उस कमरे से बेकार सामान बाहर निकाल दे… चल मेरे साथ, मैं बताता हूँ कि कौन-कौन सा सामान बाहर निकलवाना है और कौन सा रखना है।

राजू- जी बाबू जी चलिए।

गेंदामल- अरे सुन यार.. ये बाबू जी मुझे थोड़ा अटपटा लगता है, सभी मुझे यहाँ ‘सेठ जी’ बुलाते हैं। तुम भी ‘सेठ जी’ ही कहा करो।

राजू- जी.. सेठ जी।

राजू गेंदामल के साथ घर के पीछे बने कमरे में आ गया।

वहाँ आकर गेंदामल ने राजू को वहाँ पड़े दो पुराने पलंग और कुछ कुर्सियां बाहर निकालने को कहा।

गेंदामल- अगर ये सामान बाहर निकाल लोगे, तो इधर काफी जगह हो जाएगी।

यह कह कर गेंदामल नहाने के लिए चला गया और राजू वहाँ पड़ा सामान बाहर निकालने लगा, जैसा कि गेंदामल ने उससे बताया था।

राजू को वक्त का पता ही नहीं चला।

अब दस बज चुके थे, गेंदामल अपनी दुकान पर जा चुका था।

उधर सब लोग नाश्ता कर चुके थे और चमेली राजू के लिए नाश्ता लेकर अभी पीछे जाने ही वाली थी कि कुसुम ने उससे आवाज़ देकर रोक लिया।
कुसुम- अरे ओ चमेली.. ज़रा इधर आ.. कहाँ जा रही है?

चमेली (कुसुम की तरफ जाते हुए)- वो मैं राजू को नाश्ता देने जा रही थी।

कुसुम- अच्छा ठीक है.. जा नास्ता देकर आ, मैं तुम्हारा अपने कमरे में इंतजार कर रही हूँ… एक ज़रूरी काम है तेरे से।

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