गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा 8

Gendamal halwai ka chudakkad kunba-8

जैसे ही चमेली के हाथ की उँगलियों ने दीपा की कुँवारी चूत की फांकों को छुआ, दीपा के मुँह से मस्ती भरी ‘आहह’ निकल गई।

उसने अपने होंठों को अपने दाँतों में दबा लिया और चमेली की पीठ पर तेज़ी से हाथ फेरने लगी।

मानो जैसे उसने राजू को ही अपने आगोश में ले रखा हो।

चमेली ने अपनी उँगलियों से दीपा की चूत की फांकों को धीरे से सहलाया।

दीपा का पूरा बदन झनझना उठा, उसका पूरा बदन अकड़ कर झटके खाने लगा और दीपा बिन पानी की मछली के तरह तड़पते हुए अपनी कमर को हिलाते हुए अपने चूतड़ों को ऊपर उछालने लगी।

दीपा को तो जैसे होश नहीं था।

दीपा की चूत ने अगले ही पल पानी छोड़ना शुरू कर दिया, अनुभवी चमेली अपनी उँगलियों पर दीपा की चूत से निकाल रहे पानी को महसूस करते ही समझ गई कि लौंडिया झड़ गई है।

उसने अपना हाथ उसकी सलवार से बाहर निकाला और अपनी साड़ी के पल्लू से पोंछ लिया।

दीपा अपनी साँसों के दुरस्त होने का इंतजार कर रही थी, जवान दीपा की चूत ने आज पहली बार अपना कामरस बहाया था। उसके होंठों पर संतुष्टि से भरी मुस्कान फ़ैल गई।

जब दीपा थोड़ी देर बाद सामान्य हुई, तो उसने अपनी सलवार के नाड़े को बंद किया और खड़ी होकर नहाने के लिए चली गई।

जैसे ही दीपा नहाने के लिए घर के पिछवाड़े में गई तो सीमा और कुसुम नहा कर वापिस आ रही थीं।

दीपा सर झुकाए हुए, उनके पास से गुजर गई।

कुसुम ने आगे निकल कर चमेली से पूछा- अरे मरी कहाँ जा रही है.. उसकी मालिश अच्छे से की या नहीं?

चमेली मुस्कुराते हुए कुसुम की तरफ देखने लगी।

‘बहुत गरम छोरी है.. दीपा… जैसे ही उसकी चूत को छुआ, उसकी चूत ने पानी छोड़ दिया.. वो किसी मछली के तरह तड़फ रही थी।’

चमेली की बात सुन कर कुसुम के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई।

कुसुम जो चाहती थी, उस मंज़िल के तरफ वो एक कदम आगे बढ़ चुकी थी।

उधर घर के पीछे जब दीपा गुसलखाने की तरफ पहुँची, तो उसने देखा कि राजू उस सामान को एक कोने में इकठ्ठा कर रहा था.. जिसे उसने बाहर निकाला था।

जैसे ही दीपा गुसलखाने के पास पहुँची, दोनों ने एक-दूसरे की तरफ देखा, पर दीपा ने अपने सर को झुका लिया।

कुछ देर पहले जब वो चमेली को अपनी बाँहों में भींचे हुए थी, तब उसके दिमाग़ में राजू की ही छवि बनी हुई थी।

जिसके चलते दीपा राजू से आँखें नहीं मिला पा रही थी, पर राजू तो कल से उससे देखने के लिए बेकरार था।

जैसे ही राजू सामान को रख कर दीपा की तरफ जाने लगा, तो उसने देखा कि चमेली उसकी तरफ आ रही थी।

चमेली को देख कर वो रुक गया।

दीपा भी गुसलखाने में घुस गई, पता नहीं क्यों…

पर राजू चमेली की तरफ देखने से कतरा रहा था।

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वो सीधा कमरे के अन्दर चला गया और वहाँ पढ़े एक पुराने पलंग पर बैठ गया।

चमेली उसके पीछे कमरे में आ गई।

चमेली ने राजू की तरफ मुस्करा कर देखते हुए कहा- नाश्ता कर लिया?

राजू (सर झुकाए हुए)- जी कर लिया।

चमेली ने राजू की तरफ देखा, सुबह से सफाई कर रहे राजू के बदन पर धूल जमी हुई थी।

‘मैं नदी पर नहाने जा रही हूँ… तुम भी चलो, नहा लो, बहुत धूल से भर गए हो तुम… यहाँ पर सब नौकर नदी पर ही नहाने जाते हैं।’

राजू ने अपनी हालत देखी.. सुबह से सामान को बाहर निकालते हुए.. उसके कपड़े धूल से सन चुके थे।

वो बिना कुछ बोले खड़ा हुआ और अपने बैग में से कपड़े निकालने लगा।

यह देख कर चमेली के होंठों पर मुस्कान फ़ैल गई!

फिर राजू चमेली के साथ गेंदामल के घर से बाहर आ गया और दोनों चमेली के घर की तरफ जाने लगे।

जब दोनों घर पहुँचे तो चमेली ने अपनी बेटी रज्जो से कहा- रज्जो सुन.. मैं नहाने जा रही हूँ, तू सेठ जी के घर जा और वहाँ की साफ़-सफाई कर दे। मैं आकर दोपहर का खाना बना दूँगी।

रज्जो- अच्छा माँ जाती हूँ.. पर जल्दी आ जाना, मुझे घर की सफाई भी करनी है।

यह कह कर रज्जो सेठ के घर चली गई।

चमेली ने अपने कपड़े लिए और दोनों नदी की तरफ चल पड़े।

राजू आज पहली बाद इस गाँव के गलियों को उजाले में देख रहा था।

गाँव से बाहर आकर दोनों एक सुनसान रास्ते पर चलते हुए नदी की तरफ जाने लगे..

रास्ते में कोई भी नज़र नहीं आ रहा था.. जिसके चलते राजू थोड़ा असहज महसूस कर रहा था।

‘गाँव के सभी लोग नदी पर नहाने जाते हैं?’ राजू ने झिझकते हुए चमेली से पूछा।

चमेली ने पीछे मुड़ कर राजू की तरफ देखते हुए कहा- नहीं सर्दियों में नदी पर कम ही आते हैं.. गर्मियों में सभी आते हैं।

इससे आगे राजू ने कुछ नहीं बोला और वो चमेली के पीछे बिना कुछ बोले चलता रहा।

थोड़ी देर बाद दोनों नदी के किनारे पहुँच गए।

नदी के दोनों तरफ काफ़ी पेड़ थे और बहुत झाड़ियाँ थीं।

नदी के किनारे पहुँच कर चमेली ने अपने कपड़े को नीचे साफ़ घास पर रखा और अपनी साड़ी उतारने लगी।

राजू उसके पीछे खड़ा मुँह फाड़े उसे देख रहा था।

घर पर तो उसकी माँ ने भी कभी उसके सामने साड़ी नहीं उतारी थी।

यह सब राजू के लिए अलग था, एक जवान और मदमस्त औरत उसके सामने खड़ी अपने जिस्म से साड़ी को अलग कर रही थी।

चमेली ने साड़ी को उतार कर कपड़ों के पास रख दिया और राजू की तरफ मुड़ी।

‘अरे ये क्या.. अभी तक कपड़े पहने खड़े हो, नहाना नहीं है क्या.. जल्दी करो, घर जाकर मुझे दोपहर का खाना भी बनाना है।’

चमेली राजू की हालत को समझ रही थी।

वो अपनी मुस्कान को होंठों पर आने से नहीं रोक पाई।

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फिर चमेली पलट कर नदी में उतर गई।

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‘हाय राम मर गई…’

राजू चमेली की आवाज़ सुन कर घबरा गया।

‘क्या हुआ काकी?’

राजू घबराए हुए स्वर में बोला।

चमेली (मुस्कुराते हुए)- कुछ नहीं पानी बहुत ठंडा है.. अब जल्दी कर ना, घर वापिस जाकर खाना भी तैयार करना है।

चमेली की बात सुन कर अपने कपड़े उतारने लगा।

चमेली की नज़रें राजू के गोरे बदन पर अटकी हुई थीं, पर राजू का उस तरफ ध्यान नहीं था।

राजू ने अपनी कमर पर एक सफ़ेद रंग की धोती बाँध ली और अपना पजामा खोल कर नदी में उतर गया।

चमेली नदी में डुबकी लगा रही थी, उसका ब्लाउज और पेटीकोट भीग कर उसके बदन से चिपक गया।

चमेली ने नहाते हुए अपनी पीठ राजू की तरफ कर ली।

पानी.. चमेली की जाँघों तक था। जैसे ही चमेली पानी में खड़ी हुई, तो सामने का नजारा देख कर काँप रहे राजू के बदन में मानो जैसे आग लग गई हो।

चमेली का पीले रंग का पेटीकोट उसके चूतड़ों पर चिपका हुआ था, पतले से पेटीकोट में से चमेली के चूतड़ों का पूरा भूगोल दिखाई दे रहा था।

यहाँ तक कि उसकी गाण्ड की दरार भी राजू के आँखों से छुपी नहीं थी।

इतने ठंडे पानी में भी जैसे उसके धोती के अन्दर आग लग गई हो, उसका लण्ड धोती के अन्दर हलचल करने लगा।

जब राजू ने अपने लण्ड की तरफ देखा, तो उसकी धोती का भी वही हाल था। उसके लण्ड पर उसके गीली धोती चिपकी हुई थी और उसका लण्ड साफ़ नज़र आ रहा था।

उसने फिर चमेली की तरफ देखा, वो चाह कर भी चमेली के चूतड़ों पर से नज़र नहीं हटा पा रहा था।

फिर चमेली ने अपनी चूचियों को ब्लाउज के ऊपर से रगड़ना शुरू कर दिया।

वो जानती थी कि राजू उसकी तरफ ही देख रहा है,

पर इस बात से चमेली को कोई फर्क नहीं पड़ रहा था, वो जानती थी कि उसके चूतड़ों की पूरी गोलाईयां राजू को दिखाई दे रही होंगी और वो चाहती भी यही थी।

इधर राजू का लण्ड एक बार फिर से अपनी औकात पर आ चुका था।

अपने बदन को मलते हुए चमेली अचानक राजू के तरफ पलटी..

उसका ब्लाउज भी गीला होकर उसकी चूचियों से चिपका हुआ था।

काले रंग के चूचक उसके ब्लाउज में ऊपर से साफ़ दिखाई दे रहे थे।

राजू का मुँह खुला का खुला रह गया।

उससे तो इतना भी होश नहीं था कि उसकी गीली धोती, उसके 8 इंच के लण्ड के ऊपर चिपकी हुई है, जिसे देख कर चमेली का कलेजा मुँह में आ गया था।

चमेली हैरत भरी नज़रों से राजू के विशाल और मोटे लण्ड को देख रही थी।

जब राजू को इस बात का अहसास हुआ तो वो नदी के किनारे बनी सीढ़ियों पर बैठ गया और अपनी जाँघों को आपस में सटा कर अपने खड़े लण्ड को छुपाने के कोशिश करने लगा।

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राजू के मूसल लण्ड की एक झलक देखने के बाद, चमेली की चूत की फाँकें फुदकने लगीं।

उसने अपने होंठों पर कामुक मुस्कान लाकर राजू से कहा- बड़ा तगड़ा हथियार है तुम्हारा।

राजू को इस बात का बिल्कुल अंदाज़ा नहीं था कि चमेली इस कदर खुल कर उसके लण्ड के बारे में कह देगी, वो एकदम से झेंप गया।

वो हड़बड़ाते हुए बोला- क्या.. क्या.. काकी..

चमेली को राजू की हालत पर हँसी आ रही थी, पर उसने अपनी हँसी दबा ली- तुम्हारा लण्ड और क्या..!

एक बार फिर राजू चमेली की बात सुन कर बुरी तरह चौंक गया।

उसने अपने सर को झुका लिया।

चमेली उसकी तरफ देखते हुए.. अपनी चूचियों को ब्लाउज के ऊपर से रगड़ते हुए नहाने लगी, पर राजू की हिम्मत नहीं हुई कि वो दुबारा चमेली की तरफ देख सके।

राजू का लण्ड देख कर तो चमेली की चूत में तो जैसे आग दहकने लगी थी, पर गाँव की नदी पर कभी कोई भी आ सकता था।

इसलिए वहाँ और कुछ करना चमेली ने ठीक नहीं समझा।

दोनों नहाने के बाद घर वापिस आ गए।

घर आने पर चमेली रसोई में चली गई और राजू को कुसुम ने कुछ छोटे-मोटे काम करने के लिए दे दिए।

राजू कुसुम के बताए हुए काम करने लगा।

काम निपटा कर राजू अपने कमरे में चला गया।

जब से वो यहाँ आया था, तब से उसके साथ ये सब हो रहा था।

उसका लण्ड तो अब सूजने की हालत में पहुँच चुका था।

अगले दिन सुबह चमेली सब को नाश्ता देने के बाद राजू को नाश्ता देने गई।

‘आज चलोगे नहाने, वैसे कल से सर्दी कुछ ज्यादा ही बढ़ गई है..’

राजू जो अब तक चूत और गाण्ड देख कर पागल हो चुका था। उसने भी चमेली के साथ चलने के लिए हामी भर दी।

दोनों नदी की तरफ चल पड़े।

सुबह के 10 बजे थे, पर सूरज देव का नामो-निशान नहीं था, चारों तरफ घना कोहरा छाया हुआ था।

लगभग गाँव के सभी लोग अपने-अपने घर में दुबके हुए थीं।

‘आज रहने देते हैं काकी.. आज सच में बहुत ठंड है।’

चमेली ने पीछे मुड़ कर देखा और मुस्कुराते हुए बोली- चल ठीक है… वैसे आज ठंड कुछ ज्यादा ही है।

यह कह कर चमेली वापिस गाँव की तरफ मुड़ गई, चमेली और राजू जब नदी पर आने से पहले चमेली के घर पर गई थीं, तब चमेली ने अपनी बेटी रज्जो को सेठ के घर जाकर सफाई करने को कहा था।

चमेली ने सोचा इस समय उसके घर पर कोई नहीं होगा तो हो सकता है, आज उसकी चूत की आग ठंडी हो जाए।

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एक लम्बी कथा जारी है।

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