गेंदामल हलवाई का चुदक्कड़ कुनबा 9

Gendamal halwai ka chudakkad kunba-9

उसने भी चमेली के साथ चलने के लिए हामी भर दी।

दोनों नदी की तरफ चल पड़े।

सुबह के 10 बजे थे, पर सूरज देव का नामो-निशान नहीं था, चारों तरफ घना कोहरा छाया हुआ था।

लगभग गाँव के सभी लोग अपने-अपने घर में दुबके हुए थीं।

‘आज रहने देते हैं काकी.. आज सच में बहुत ठंड है।’

चमेली ने पीछे मुड़ कर देखा और मुस्कुराते हुए बोली- चल ठीक है… वैसे आज ठंड कुछ ज्यादा ही है।

यह कह कर चमेली वापिस गाँव की तरफ मुड़ गई, चमेली और राजू जब नदी पर आने से पहले चमेली के घर पर गई थीं, तब चमेली ने अपनी बेटी रज्जो को सेठ के घर जाकर सफाई करने को कहा था।

चमेली ने सोचा इस समय उसके घर पर कोई नहीं होगा तो हो सकता है, आज उसकी चूत की आग ठंडी हो जाए।

चमेली- चलो, पहले मेरे घर चलते हैं, ये कपड़े तो वापिस रख दें।

उसके बाद चमेली राजू को लेकर अपने घर पर आ गई।

चमेली के बेटी गेंदामल के घर पर जा चुकी थी।

‘चलो आज नहाया तो नहीं, कम से कम मुँह हाथ तो धो ही लेती हूँ।’

ये कह कर चमेली आँगन में आकर एक चौकी पर बैठ गई और अपने लहँगे को घुटनों से ऊपर सरका कर.. अपने पैरों को साफ़ करने लगी।

राजू बाहर आँगन में खड़ा चमेली की तरफ देख रहा था।

कल से वो देख-देख कर पागल हो चुका था।

कुसुम के साथ तो कुछ करने के उसकी हिम्मत नहीं थी, पर चमेली… वो भी तो उसी की तरह नौकर थी।

हाथ-पाँव धोने के बाद चमेली कमरे में गई और अपनी चोली उतारने लगी।

उसने कमरे का दरवाजा बंद नहीं किया था। बाहर खड़ा राजू अब अपने आप पर काबू रखने की हालत में नहीं था।

चमेली ने जैसे ही अपनी चोली उतारी, उसकी नंगी पीठ राजू की आँखों के आगे आ गई।

चमेली जानती थी कि राजू की आँखें उसी पर लगी हुई हैं। फिर चमेली एक संदूक के तरफ बढ़ी और उसमें से अपने लिए कपड़े निकालने के लिए झुकी, तभी चमेली को वो झटका लगा, जिसके लिए वो पिछले कुछ दिनों से अन्दर ही अन्दर सुलग रही थी।

‘आह्ह.. ओह.. क्या कर रहा है छोरे.. छोड़ मुझे..’ चमेली ने कसमसाते हुए कहा।

राजू ने अचानक से पीछे से जाकर चमेली की चूचियों को अपनी हथेलयों में भर लिया था।

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उसकी 38 इन्च की गुंदाज चूचियाँ राजू के हाथों में समा नहीं रही थीं।

राजू का लण्ड जो उसके पजामे में तंबू बनाए हुए था।

सीधा चमेली के लहँगे के ऊपर से उसकी चूतड़ों की दरार में धंस गया।

चमेली ने अपने हाथों से राजू के हाथों को पकड़ लिया…

वो भले ही राजू को छोड़ने के लिए कह रही थी, पर वो विरोध बिल्कुल भी नहीं कर रही थी।

चमेली कसमसाते हुए- आहह.. छोड़ राजू कोई आ जाएगा.. छोड़ दे.. ऊंह राजू ओह…

चमेली के इधर-उधर हिलने से राजू का लण्ड उसके लहँगे के ऊपर से गाण्ड की दरार में सरकता हुआ सीधा उसकी चूत की फांकों में जा लगा।

चमेली एकदम से मचल उठी और उसने अपने हाथों को पीछे ले जाकर राजू के सर को पकड़ लिया।

अब राजू के हाथ आज़ाद थे, जिसका पूरा फायदा उसने उठाना शुरू कर दिया।

उसने धीरे-धीरे चमेली की चूचियों को अपने हाथों में भर कर दबाना शुरू कर दिया।

चमेली एकदम मस्त हो चुकी थी, उसने अपने सर को राजू के कंधों पर टिका दिया.. उसकी आँखें मस्ती में बंद हो गईं।

चमेली- राजू छोड़ दे बेटा.. कोई आ जाएगा, मान जा.. मेरी बात.. ऊंह सीईई क्या कर रहा है धीरे राजू आह्ह…

चमेली ने राजू के हाथों को पकड़ कर अपनी चूचियों से हटाया और राजू से अलग होकर राजू की तरफ देखने लगी।

उसकी चूचियाँ तेज सांस लेने से ऊपर-नीचे हो रही थीं।

राजू एकटक चमेली की ऊपर-नीचे हो रही गुंदाज चूचियों को देख रहा था।

आज सालों बाद जवान लड़के के हाथों का स्पर्श पाकर उसकी चूचियों के काले चूचुक एकदम तन गए और उसे अपने चूचकों के पास खिंचाव महसूस होने लगा।

राजू ने जैसे ही अपना हाथ आगे बढ़ा कर उसकी चूची को छुआ.. चमेली एकदम मस्त हो गई और राजू की ओर अपनी अधखुली आँखों से देखते हुए कहने लगी (मस्ती से भारी लड़खड़ाती आवाज़ में)- तुम किसी को बताओगे तो नहीं।

राजू- नहीं काकी।

राजू ने बस इतना ही कहा था कि चमेली ने राजू आगे बढ़ कर अपनी बाँहों में भर लिया।

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उसकी चूचियां राजू के छाती में धँस गईं।

‘ओह्ह राजू कब से तड़फ रही हूँ और जब से तुम्हारा लण्ड देखा है.. मेरी चूत में आग लगी हुई है.. तुम मुझे चोदेगा ना…’

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राजू- आहह.. काकी… आपने भी तो मुझे अपनी चूत दिखा-दिखा कर पागल कर दिया है… देखो ना मेरा लण्ड कैसे खड़ा हो गया है..

चमेली- चल पीछे हट.. पहले मुझे बाहर का दरवाजा बंद करके आने दे।

तब तक तुम नीचे बिस्तर लगा.. फिर देख कैसे तेरे लण्ड का रस निचोड़ कर इसकी अकड़ निकालती हूँ।

यह कह कर चमेली थोड़ा सा पीछे हटी और अपने लहँगे को खोल कर ऊपर करके अपनी चूचियों पर बाँध कर बाहर चली गई।

जब चमेली बाहर के दरवाजे को बंद करके वापिस आई तो राजू ज़मीन पर बिस्तर लगा रहा था।

चमेली ने मुस्कुराते हुए उसे देखा और फिर कमरे का दरवाजा भी बंद कर दिया।

दरवाजा बंद करने के बाद चमेली, राजू के पास आकर खड़ी हो गई और अपने लहँगे के नाड़े को जो कि उसकी चूचियों पर बँधा हुआ था.. को खोल दिया।

लहँगे के नाड़े की पकड़ उसकी चूचियों पर ढीली पड़ते ही.. लहंगा सरकता हुआ चमेली के कदमों में आ गिरा।

राजू के सामने चमेली अब पूरी तरह से नंगी खड़ी थी।

उसकी 38 साइज़ की चूचियां तेज से साँस लेने के कारण ऊपर-नीचे हो रही थीं और नीचे चूत पर काली घनी और लंबे झांटें साफ़ दिखाई दे रही थीं जो कुसुम की चूत से बिल्कुल अलग थी।

राजू चमेली को यूँ अपने सामने नंगा खड़ा देख कर पागल हो गया।

उसने आगे बढ़ कर उसे अपनी बाँहों में कसते हुए उसकी बाईं चूची को मुँह में भर लिया।

जैसे ही चमेली की चूची का चूचुक पर राजू के जीभ का स्पर्श हुआ, चमेली सिसक उठी।

उसने राजू के सर को अपने बाँहों में कस लिया।

‘आह्ह.. सीई ओह राजू चूस्स्स ले.. सब तेरे ही लिए है आज.. चूस और ज़ोर से चूस्स्स बेटा ओह..’

चमेली पागलों की तरह राजू की बाँहों में छटपटा रही थी।

उसके हाथ तेज़ी से राजू के सर के बालों में घूमने लगे और होंठ राजू के कंधों पर रगड़ खाने लगे।

मस्ती से अधीर हो चुकी चमेली की चूत कि फाँकें कुलबुलाने लगीं।

नीचे राजू का लण्ड चमेली के पेट से सटा हुआ था, चमेली अपना हाथ नीचे ले गई और राजू के लण्ड के मोटे गुलाबी सुपारे को दो उँगलियों और अंगूठे के बीच में पकड़ लिया।

अंगूठे के नाख़ून से उसने राजू के लण्ड के सुपारे से हल्का सा कुरेद दिया।

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राजू- आह.. काकी ये क्या कर रही हो ?

राजू की आँखें भी मस्ती में बंद होने लगीं, चमेली लगातार अपने अंगूठे को गोल-गोल घुमा कर राजू के लण्ड के सुपारे को नाख़ून से कुरेद रही थी।

राजू का लग रहा था, जैसे चमेली उसके लण्ड को निचोड़ कर पूरा रस निकाल लेना चाहती हो।

अब राजू भी चमेली के हर हरकत का जवाब देने के लिए बिल्कुल तैयार था।

उसने चमेली के चूचुक को मुँह से निकाला और दूसरी चूची को मुँह में भर कर चूसना चालू कर दिया।

चमेली एक बार फिर से सिसक उठी।

‘ओह हाआआ राजू बेटा चूस दोनों तेरी हैं.. ऊंह सीईई और ज़ोर से चूस..’

राजू चमेली की चूची को चूसते हुए धीरे-धीरे अपना हाथ नीचे ले गया और चमेली की जाँघों को फैला कर उसकी चूत की फांकों को अपने हाथ से दबोच लिया।

चमेली का बदन एकदम से अकड़ गया, मानो जैसे उसकी साँस ही रुक गई हो, उसका मुँह खुल गया और उसने अपनी जाँघों को फैला लिया।

मौका देखते ही राजू ने अपनी एक ऊँगली को चमेली की चूत में पेल दिया।

‘ओह्ह राजू अब और खड़ा नहीं रहा जाता बेटा ओह..’

चमेली के बात सुन कर राजू ने चमेली की चूत से अपनी ऊँगली निकाली और अपनी बाँहों में भर कर उससे नीचे लेटा दिया।

जैसे ही चमेली नीचे लेटी, उसने अपनी टाँगों को घुटनों से मोड़ कर फैला कर ऊपर उठा लिया, जिससे उसकी झाँटों से भरी चूत का मुँह खुल कर राजू की आँखों के सामने आ गया।

चूत का गुलाबी कामरस से भीगा हुआ छेद देख राजू का लण्ड और ज्यादा अकड़ गया।

चमेली अब पूरी तरह गरम हो चुकी थी और उसकी चूत में सरसराहट इस कदर बढ़ गई थी कि वो एक पल और इंतजार नहीं करना चाहती थी।

‘ये ले बेटा.. देख मेरी चूत कैसे अपना पानी बहा रही है… अब और मत तड़फा बेटा… घुसा दे अपना मूसल सा लण्ड अपनी काकी की फुद्दी में…।’

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एक लम्बी कथा जारी है।

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