गुलदस्ता-2

Guldasta-2

जैसे ही कुसुम सो जाती, वह चुपके से रीतेश के कमरे में चली जाती और रीतेश तो उसकी प्रतीक्षा में रहते ही थे। कितना भी सोचे, उनका मन उन्हें बहकाता रहता था और उनके सारे संकल्प धरे रह जाते। मिनी तो फूलों की डाल जैसी ही लगती थी उन्हें। वैसी ही कोमल चमकती त्वचा और उलझे उलझे बाल और इन सबसे बेखबर वह फुदकती सी चलती जैसे नन्हीं गौरैया।

उसे देख किसी के लिए भी मन पर नियंत्रण रखना मुश्किल हो सकता था। हरदम हंसती, मुस्कुराती और अपने सौंदर्य के प्रति लापरवाह होना उसके आकर्षण को और भी बढ़ा देता था। रीतेश इस बात का हमेशा ध्यान रखता कि कुसुम को इस बात का बिल्कुल पता नहीं लगे। कभी-कभी व्याकुल होकर रीतेश सोचते क्या ऐसा नहीं हो सकता कि मिनी हमेशा के लिए यहीं रह जाए?

लेकिन कुसुम को दुख भी नहीं पहुँचाना चाहते थे। वह तो कई बार कह चुकी थी कि मां को तकलीफ होती होगी, मिनी को वहाँ पहुँचा दें। लेकिन यह सोचते ही वे बेचैन हो जाते, फिर कहते- अरे चली जाएगी ना ! देखो तो कितना काम कर देती है, बच्चे को भी देखती है। उसकी परीक्षा के पहले पहुँचा दूंगा।

टीचर शाम चार बजे उसे आकर पढ़ा जाता। घर के कामों के बाद वह पढ़ती ही तो रहती है।

रीतेश अपने कमरे में लेटे लेटे अखबार पढ़ते रहते और जब समझते कि कुसुम सो गई होगी तो चुपचाप मिनी के कमरे में चले जाते। होंठों पर उंगली रखकर उसे चुप कराते।

रीतेश का इस तरह कमरे में आना उसे बांहों में भरना उसे बहुत अच्छा लगता। रीतेश के जाने के बाद भी वह उन सुखद अनुभूतियों में डूबी रहती।

रीतेश कभी-कभी सोचते वे उसे जाने ही नहीं देंगे। इतनी बेचैनी महसूस करते थे जब वे उसके जाने की बात सोचते थे। उसके बिना जीना उन्हें अब मुश्किल लगने लगा था, हर पल उन्हें मिनी का ही ध्यान रहता था, सोचते थे अगर कुसुम को पता चल गया तो क्या करेंगे?

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फिर सोचते कुसुम कुछ कहेगी तो कहेंगे कि साथ रहना है तो रहो, नहीं तो जो जी चाहे करो !

लेकिन दूसरे ही पल वे सोचते- क्या कुसुम को रोता देख पाएंगे वे?

कितना मजबूर अपने को पाते थे वे आजकल। समाज में जो इज्जत है, वह दो कौड़ी की रह जाएगी।

फिर मिनी की अगर बदनामी हो जाएगी तो उसका तो जीवन ही बर्बाद हो जाएगा।

कोई हल नहीं मिलता और वे बेचैन हो जाते, उनकी आंखों से आंसू टपकने लगते।ऑफिस में बैठे-बैठे वे यही सब सोचे जा रहे थे। काम बहुत था ऑफिस में। आने में आज बहुत देर हो गई थी। अब तो शाम के सात बज रहे थे। कैसी उतावला था मन कि उड़कर जाने का करता था !

ज्यादा बेचैनी तो मिनी की एक झलक पाने के लिए थी। घर पहुँचते-पहुँचते अंधेरा तो हो गया था।

मेन गेट से जब वे अन्दर घुसे उन्होंने कुछ आहट सुनी तो इधर-उधर देखने लगे।

उन्होंने देखा कि वह मेंहदी की झाड़ जो काफी घनी हो गई थी जोरों से हिल रही थी लगा जैसे कोई उसके पीछे छुपा है।

रीतेश ने सोचा शायद उन्हें भ्रम हुआ होगा, फिर सोचा स्कूटर गराज में लगाकर फिर देखता हूँ।

तभी पड़ोस का मोन्टी मेन गेट से निकलता नजर आया।

उन्होंने पूछा- क्या बात है मोन्टी?

तो वह कुछ सहमा सा और डरा सा लगा उन्हें।

उसने कहा- मेरी गेंद उधर चली गई थी, मैं उसे ही लेने गया था।

लेकिन उसके बोलने के अंदाज से लग रहा था जैसे वह कुछ छुपा रहा हो।

अच्छा ! कोई बात नहीं ! रीतेश ने कहा और वे घर के अन्दर चले गए।

मिनी डाइनिंग टेबल पर सिर पकड़े बैठी थी।

रीतेश ने पूछा- क्या हुआ मिनी?

तो उसने खांसते हुए कहा- कुछ अटक गया था गले में !

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उसका चेहरा लाल लग रहा था और एक अनजाना-सा भय उसके चेहरे पर पसर गया था।

तभी बाथरुम से निकली कुसुम ने लगभग रोते हुए रीतेश को पकड़ लिया और रोती हुई बोली- कहाँ रह गए थे? रोज तो चार बजे आ जाते है। कितना डर लग रहा था। उस पुल पर आज फिर एक्सीडेन्ट हुआ है, बहुत घबराहट हो रही थी।

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रीतेश ने उसे गले से लगाते हुए कहा- आज काम बहुत था और रास्ते में भीड़ भी बहुत थी। आते आते देर हो गई।

अचानक रीतेश ने देखा मिनी के बाल कुछ ज्यादा ही उलझे थे और उसमें मेंहदी के कुछ पत्ते उलझे हुए थे।

अपने कमरे में जाते हुए उसने कुसुम से पूछा- यह मिनी जानती है मोन्टी को?

कुसुम ने कहा- हाँ कभी कभी गणित के कुछ सवाल नहीं समझ में आता है तो उसे बुला लेती है और वह आकर उसे समझा देता है। बस इतना ही जानती है।

लेकिन अब रीतेश को विश्वास हो गया कि उस झाड़ी के पीछे मिनी भी थी, नहीं तो मोन्टी इस तरह उसे देख घबराता क्यों?

उनके दिल को बहुत चोट पहुँची यह सोचकर कि मिनी उससे भी मिलती रहती है। कितनी सरलता से उन्हें धोखा देती रहती है और वे सोचते हैं कि सिर्फ वे ही उसे प्यार करते हैं। पता नहीं कहाँ तक पहुँचे हैं दोनों?

लगा जैसे किसी ने उनके विश्वास की नींव हिला दी हो। कितनी बेशर्म है मिनी। बहुत भोली बनने का नाटक करती रहती है? हम लोग भी तो उसे बच्ची ही समझते रहे।

मोन्टी इस बार आई एस सी की परीक्षा देने वाला था। तैयारी के लिए कालेज की छुट्टियाँ चल रही थी। फिर तो रोज ही उससे मिलती होगी जब मैं ऑफिस चला जाता हूँ। उसके बगल का मकान ही तो है वर्मा साहब का। बाड़ तो मेंहदी की बहुत ऊँची है पर मेन गेट से आने में कोई मुश्किल भी तो नहीं है। शायद मैंने जो अन्याय कुसुम के प्रति किया उसी की सजा भगवान ने दी है। बेकार मैं उसे इतना प्यार करता रहा। उनकी आंखें भर आई। मैं ही भटक गया था।

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गलती तो मेरी ही थी और रीतेश बाथरूम में घुसकर रोने लगे।

लेकिन एक प्रश्न उन्हें बार बार रुला दे रहा था कि मिनी ने ऐसा क्यों किया?

दूसरे दिन अचानक ही वे यह जानने के लिए बीच में ही घर आ गए कि कहीं उन्हें धोखा तो नहीं हुआ था?

ऐसे किसी पर शक करना गलत है। लेकिन जब उसका स्कूटर गेट से अन्दर घुसा उसने देखा कि बगीचे के पिछले वाले भाग में मिनी और मोन्टी आपस में लिपटे थे। अब शक की कोई गुंजाइश नहीं थी। क्रोध और नफरत की एक लहर उठी थी मन में पर चुप रह गए। शायद वे अपने को संभाल नहीं लेते तो रो ही पड़ते।

आवाज सुनते ही मिनी दौड़ती हुई उसके पास आ गई- आज इस समय कैसे जीजू?

तो व्यंग्य से मुस्कुराते हुए रीतेश ने कहा- एक चोर को पकड़ना था।

वह चौंकी लेकिन दूसरे ही पल आश्वस्त हो गई, नहीं किसी ने नहीं देखा उसे।

और अगले ही रविवार को वे उसे मां के पास पहुँचा आए थे। लेकिन जब तब उसकी याद आ ही जाती, अनजाने ही कितना प्यार करने लगे थे उसे। वह थी भी तो ऐसी जैसे फूलों का गुलदस्ता। सुन्दर कोमल और प्यारी सी। कुछ ही दिनों के बाद दोनों के विवाह की वर्षगाँठ आई तो फूलों का एक बड़ा सा गुलदस्ता खरीद कर कुसुम को देने के लिए ले आए रीतेश पर उसे अपने शरीर से सटा कर बहुत देर चुपचाप रोते रहे।

ऐसी ही तो थी मिनी।

कहाँ भुला पाए थे वे उसे?

लगा जैसे मिनी ही उनके हाथों में गुलदस्ता बनी हुई है।

मन में एक बेचैनी होती कि सारी मर्यादाएं छोड़कर वे मिनी के पास ही चले जायें लेकिन जबरन मन को मारना पड़ता था क्या पता वह औरों से भी इसी प्रकार का संबंध बना ले? फिर तो दुखी होंगे ना? और उन्होंने अपने को संभाल लिया था।

//समाप्त//

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