हिटलर दीदी को वासना चढ़ी मुझे पढ़ते समय-2

(Hitler Didi Ko Vasna Chadhi Mujhe Padhate Samay-2)

फिर में तो चकित होकर एकदम से उसको देखता ही रह गया और वो उस समय अपने किसी काम में बिल्कुल मगन हो चुकी थी और में अपने सर को नीचे झुकाए किताब को देखने की कोशिश कर रहा था। अब उनकी पेंटी चूत के बीच में आ चुकी थी, जिसकी वजह से मुझे उनकी उभरी हुई चूत का आकार उभार एकदम साफ स्पष्ट हो रहा था। फिर मैंने देखा कि उनकी चूत एक छोटी पाव रोटी की तरह उभरी हुई थी जो दिखने में आकार में भी मुझे कुछ बड़ी नजर आ रही थी। फिर थोड़ी देर के बाद उन्होंने अपने आसन को बदल लिया जिसकी वजह से वो बड़ा मस्त सेक्सी नजारा मेरी आँखों से एकदम ओझल हो गया, लेकिन अब मुझे उनके बड़े गले के सूट से बूब्स का मनमोहक द्रश्य दिखने लगा था, जो मेरे मन को बहलाने लगा था और उसकी वजह से में मन ही मन बड़ा खुश था। दोस्तों अब में हर दिन उनके यहाँ पर जाने के लिए बैचेन रहने लगा था, में उनकी हर बात को मानने लगा था जिसकी वजह से वो भी अब मुझसे ज़्यादा सख्ती से पेश नहीं आती थी। अब हम दोनों के बीच कभी कभी हंसी मजाक भी होने लगा था। फिर कुछ दिनों के बाद गर्मियों की छुट्टियाँ लग गयी और अब मेरी मम्मी घर पर ही रहने लगी थी, लेकिन फिर भी मेरा उनके यहाँ पर जाकर पढ़ाई करने का वो काम वैसे ही चालू था।

फिर उन्ही दिनों उनके भाई की भी छुट्टियाँ लग चुकी थी और इसलिए वो उनकी मम्मी को अपने साथ में लेकर कुछ दिनों के लिए उनके मामा के यहाँ चला गया। एक दिन में किसी काम से बाज़ार गया हुआ था और इस वजह से मुझे उनके घर पर जाने में थोड़ी देर हो गयी, वो दोपहर का समय था और इसलिए धूप भी बड़ी तेज़ हो रही थी। फिर मैंने देखा कि वो बाहर अपने घर की बाल्कनी में खड़ी होकर मेरा इंतज़ार ही कर रही थी, में दोपहर में करीब तीन बजे बाजार से वापस आया और फिर में अपने घर पर सामान को रखने के लिए जाने लगा था। अब वो वहीं से मुझे देखकर मुझसे पूछने लगी कि आज कहाँ रह गया था? तब मैंने उनसे कहा कि दीदी बस में अभी आता हूँ और इतना कहकर अपने घर पहुंचकर मैंने फटाफट सामान रखा और उसके बाद पानी पिया। फिर में अपनी किताबें उठाकर उनके यहाँ भाग गया और उन्होंने फटाफट दरवाज़ा खोल दिया, उस दिन घर पर उनके अलावा कोई नहीं था। दोस्तों उस समय मेरा चेहरा धूप और गरमी की वजह से एकदम लाल हो चुका था और मुझे बहुत पसीना भी आ रहा था। फिर अंदर जाते ही उन्होंने मेरा एक कान पकड़कर कहा क्यों तू कहाँ दोपहरी में इधर उधर घूमता फिर रहा है? चल अब बैठ जा नीचे।

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अब में तुरंत नीचे ज़मीन पर बैठ गया, क्योंकि गर्मियों में ठंडे फर्श पर बैठना बहुत अच्छा लगता है और नीचे बैठते ही मुझे बड़ी राहत मिली। दोस्तों उस दिन उन्होंने सफेद रंग के ऊपर पीले रंग के फूलों की आक्रति वाला एक कॉटन का सूट पहना हुआ था, जिसका गला थोड़ा सा बड़ा था और चुन्नी तो वो घर में कभी अपने साथ रखती ही नहीं थी और इसलिए उनके गले से नीचे का हिस्सा साफ साफ चमक रहा था और उस समय मैंने निक्कर और टीशर्ट पहन रखी थी। दोस्तों में क्योंकि बहुत तन्दुरुस्त था और इसलिए मेरी जांघे भी एकदम मस्त थी जिन पर अभी तक बाल भी नहीं आए थे, लेकिन मेरी झाटो के बाल थोड़े लंबे जरुर हो गये थे, मेरा चेहरा गोल और भरा हुआ था जिस पर दाढ़ी मुछ के हल्के हल्के रोए अब आने शुरू हुए थे। दोस्तों उस दिन वो मेरे पास में एक तकिया लगाकर लेट गयी, उनका सर मेरे पैरों के पास था और मैंने आलथीपालती लगा रखी थी। फिर कुछ देर बाद उन्होंने करवट मेरी तरफ ले ली और तब उनकी आँखे अधखुली सी थी जैसे की वो अब नींद में आने वाली हो। दोस्तों उनके ऐसा करने से अब मुझे उनके वो बूब्स उनके बड़े आकार के गले के सूट के ऊपर से आधे बाहर झूलते लटकते हुए दिखाई दे रहे थे।

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दोस्तों मेरी अच्छी किस्मत से उस दिन उन्होंने उस सूट के अंदर ब्रा भी नहीं पहनी थी और इसलिए उनके दोनों बूब्स की निप्पल उस कुर्ते में एक जगह पर उठती हुई मुझे नजर आ रही थी। फिर में कुछ देर बाद उस तरफ से अपना ध्यान हटाकर अपनी किताब को पढ़ने लगा और कुछ देर बाद मुझे एक इंग्लीश का शब्द समझ में नहीं आया तब मैंने दीदी से उसका मतलब पूछा। फिर उन्होंने लेटे लेटे ही मेरे पैरों पर रखी किताब को थोड़ा सा टेढ़ा करके देखा और वो मुझे बताने लगी। दोस्तों उनके ऐसा करने की वजह से दो काम एक साथ हुए एक तो अब उनके बूब्स मुझे पहले से भी ज़्यादा दिखाई देने लगे थे और दूसरा यह कि उनका एक हाथ मेरी जाँघ पर लगा था। अब उसकी वजह से मुझे गुदगुदी का एहसास हुआ, लेकिन इस काम के बाद मेरे साथ एक बड़ी ही अजीब बात हुई में जिसके बारे में मैंने कभी सोच भी नहीं था। अब उन्होंने मुझे उस शब्द का मतलब बताने के बाद अपना हाथ मेरी जाँघ पर से नहीं हटाया और वो करीब करीब औंधे मुहं होकर पड़ गई। अब उस वजह से मुझे बड़ा अजीब सा लगा, लेकिन में डर की वजह से कुछ भी नहीं बोला में अपनी किताब पर ध्यान देने की कोशिश करने लगा था।

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फिर कुछ देर बाद एक घटना और घटित हुई उन्होंने औंधे पड़े पड़े ही एक अंगड़ाई सी ली और अपनी जांघो को सिकोड़ लिया और शरीर को थोड़ा सा अकड़ा सा लिया, उनकी जांघे सलवार से ढकी हुई थी, लेकिन कुर्ता ऊपर से हट गया था। फिर इसी बीच में उन्होंने अपने हाथ की उँगलियाँ मेरे निक्कर के अंदर डालनी चाही, मेरा निक्कर थोड़ा सा ढीला था और इसलिए उन्हे थोड़ी सी मेहनत करने पर ही सफलता भी मिल गई थी। अब उनकी उंगलियाँ मेरे लंड से एक इंच की दूरी पर थी और मेरा भी मन अब बहकने लगा था और जो हाथ उनका मुझ पर था मैंने हिम्मत करके उनकी उस बाह पर अपना एक हाथ टीका दिया और में किताब को पकड़े पढ़ाई करने लगा। दोस्तों अब पोज़िशन यह थी कि वो निक्कर के अंदर कुछ टटोलने की कोशिश कर रही थी और में उनके हाथ और कंधे के नज़दीक उनके बूब्स को छूने की हिम्मत कर रहा था और उनके इतना करीब में इससे पहले कभी भी नहीं गया था और इसलिए मुझे थोड़ा सा डर भी लग रहा था। दोस्तों उनके सूट की बाह छोटी थी और हाथ को इधर उधर करने की वजह से वो थोड़ी और ऊपर हो गयी थी, जिसकी वजह से उनकी बाह के बाल गोरी गोरी बाहों के साथ अब मुझे साफ दिखकर उन्हे और भी सेक्सी बना रहे थे। अब भी उनकी उंगलियाँ बराबर मुझे अंदर से टटोल रही थी और मेरे लंड को वो पकड़ने के लिए बड़ी मेहनत कर रही थी।

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