माँ की चुदाई देख मज़ा आ गया: भाग 4

Ma ki chudai dekh maza aa gaya: Part 4

हेलो! दोस्तों मैं रोहन राय आज आप लोगों के लिए इस कहानी का चौथा भाग लेकर आया हूँ , और इसमें मैं बताऊंगा की कैसे मैंने अपनी माँ और रंडी बाज़ शर्म अंकल को कब? और कहाँ? चुदाई करते हुए देखा था ।
तो जब से शर्मा अंकल का मेरे पापा के गैरहाजरी में आना जाना होने लगा , वैसे ही मेरा उन पर शक होने लगा था।
पर तब भी मैं सोचता था , ना मेरी माँ इतना गिरे हुए आदमी के साथ थोड़ी पेलवाएगी , तो एक दिन मैं और मेरे कुछ दोस्त स्कूल के बाद वही मंदिर के पास वाले मैदान में खेलने गए थे ।
और उस दिन हम कुछ बस्ती के लड़कों से मैच खेलने वाले भी थे , तो खेल शुरू हो गया था और मैं पहला बैट्समैन था ।
खेल का जोश था तब , तो मैं चार ओवर तक टिका रहा और फिर आउट हो गया , तो मैं काफी थक गया था और मुझे प्यास भी लगा था ।
तो मैं अपने दोस्तों से पानी माँगा पर सबके पास बोतल था पर पानी नहीं , इसीलिए मेरे दोस्तों ने ही मुझे अपने बोतल दे दिए और पानी लेन के लिए बोले ।
तो मैं पनि लेन के लिए मंदिर के चापाकल में गया पर वहां का पानी से लोहा वाला पनि निकल रहा था , तो मैं स्टेशन के तरफ जाने लगा ।
तो स्टेशन से पहले ही एक नल है वहां अच्छा पानी आता था और ठीक कुछ दूरी पर “सी–टाइप” रेलवे क्वार्टर है और वहां पर कोई रेलवे कर्मचारी नहीं रहते ।
पर मुझे क्या पता था की , उसी क्वाटर में से एक क्वाटर में कोई रहता होगा , मैं बोतल में पानी भर चूका था और वहां से निकलने वाला था ।
उसी समय मैंने शर्मा अंकल के कार को आते हुए देखा और उसमें शर्मा अंकल के साथ एक औरत भी थी , मैं सोचा ज़रूर कोई रंडी होगी साली ।
पर वो औरत मुँह धक् कर राखी थी , और उन्होंने मुझे देखा नहीं था , क्यों की मैं उन्हें देखते ही छुप गया था और वो दोनों क्वाटर में गए ।
वहां का जगह सुनसान इलाका है और मैं देखने के लिए जाने वाला था की , तभी मैं शर्मा अंकल को उस क्वाटर से निकलते हुए देखा ।
पर वो औरत नहीं निकली और शर्मा अंकल के जाते ही मैं उस क्वाटर के पीछे गया था , पर खिड़की भी बंद था , मैं सोचा धत टेरिकी पूरा मूड का शातियानाश हो गया ।
और मैं सोचा छोड़ो आज मेरा दिन नहीं है और मैं जा ही रहा था की , उस क्वाटर में ठहरी औरत खिड़की खोली पर वो वहीं पर खाड़ी थी ।
पर मैं उस औरत का चेहरा तब देखा नहीं था , लेकिन उसी समय शर्मा अंकल आ गए और वो औरत , शर्मा अंकल के पास गई और बोली ,

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औरत : बड़ा जल्दी आ गए? आप तो ।
शर्मा अंकल : बस यही पास के अस्पताल में गया था ।

और तब मैं देखा की शर्मा अंकल उस औरत को चुम रहे है और वो भी गांड तरीके से और साथ ही उस औरत की पल्लू सरका कर उस औरत की चूचियों को दबा रहे थे , ब्लाउज के ऊपर से ।
और वो औरत भी कुछ कम नहीं थी , सीधे शर्मा अंकल के पैंट को खोलने लग गई और एक दम से घुटनो पर आ गई और फिर जा कर अंकल के कच्छे को को वो औरत उतरी ।
शर्मा अंकल का कच्छा उतारते ही वो औरत शर्मा अंकल के इंच काले बड़े और मोटे लंड को अपनी मुँह में लेकर चूसने लगी ।
शर्मा अंकल भी जोश में आ गए थे और उस औरत की बाल पकड़ कर पेलना शुरू कर दिए और सिसकते हुए जब उस औरत का नाम लिए तब मेरे ज़मीन ताले पैर सरक गया ।

शर्मा अंकल : ईईईसस…उउफफफ… क्या मस्त लंड चुस्ती हो आप जयंती जी…ईईईसस…अअआह…मज़ा आ रहा है…ईईईसस।

मैं तभी यकीं नहीं कर रहा था की वो मेरी ही माँ है , जब की वो मेरी ही माँ थी और वो शर्मा अंकल के लंड को भूखी शेरनी की तरह खा रही थी ।
फिर माँ शर्मा अंकल के लंड को चूसते हुए उसके बड़े टट्टों को भी चूसने लगी , और वो भी पुरे जोश के साथ ।
मेरी माँ , शर्मा अंकल के टट्टों को जब चूस–चाट कर अपने लार से लटपट की वैसे ही शर्मा अंकल मेरी माँ को उठाए और मेरी माँ की साड़ी उघार कर उनकी बैंगनी पेंटी उतरे ।
और फिर शर्मा अंकल मेरी माँ की साड़ी उघार कर माँ को बिस्तर पर घोड़ी बनाए ताकि अंकल , माँ की गांड चाट सके ।
शर्मा अंकल घुटनो पर आ गए और मेरी माँ की गांड को फैला कर अपना पूरा मुँह लगा कर गांड चाटने लगे और वो बहुत गंदा चाट रहे थे ।
मेरी माँ तो पूरी मदमस्त हो गई थी और सिसक रही थी , जब शर्मा अंकल अपना मुँह मेरी माँ की गांड में रगड़ रहे थे तब ।

माँ : ईईईईईससससस…ऊऊऊऊहह… उउफफफ…शर्मा जी आप भी क्या मस्त चाटते हैं ईईईईईसस…उउफफफ
शर्मा अंकल : लललममम…उउउममम …उउमम…ईईईसस…आह!…इतनी मस्त को चाटना तो बनता है और आपकी गांड में लक्स साबुन की ये महक… उफ्फ्फ

मुझसे तो रहा नहीं गया और मैं बोतल को नीचे रखा और सीधा अपने पैंट से लंड निकला और थूक लगा के हिलना शुरू किया ।
उधर शर्मा अंकल मेरी माँ की बूर , गांड दोनों को चाट–चाट के अपने लार से लटपट कर दिए थे और फिर शर्मा अंकल निरोध कंडोम का पैकेट निकले ।
और उसमें बहुत सारे कंडोम थे और ऐसा कंडोम उन दिनों अस्पताल में बहुत मिलता था और एक दम चिकना कंडोम था और कोई फ्लेवर भी नहीं था ।
शर्मा अंकल अपने लंड में कंडोम लगाए और फिर मेरी माँ की गांड में एक थापड़ मरे…चटक…जिससे माँ सिसक उठी ,

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माँ : आह!…ज़रा आहिस्ता से धक्का दीजिएगा शर्मा जी , पिछली बार अपने पेशाब निकल दिया था ।
शर्मा अंकल : और मैं आपकी पेशाब का स्वाद भी तो चखा था ।

मुझे शर्मा अंकल पे गुस्सा आने लगा था , क्यों की वो मादरचोद था और मेरी माँ को रंडी समझ कर ऐसा हरकत कर रहा था ।
और फिर शर्मा अंकल मेरी माँ की बूर में अपना लंड रगड़ते हुए एडजस्ट करते है और फिर माँ की बूर में घुसा के आहिस्ते–आहिस्ते धक्का देने लगते हैं ।

शर्मा अंकल : ईईईसस…अअआह… जयंती जी अगर आपको चाहिए था तो इतने दिनों तक क्यों चुप थी… ईईईसस…अअआह
माँ : आह!…ईईईसस …आह!… आह!… कैसे कहती , आप को तो सभी जानते है और आपके स्वभाव को भी… ईईईसस…उउउहह
शर्मा अंकल : आह!…आह!…ईईईसस… चिंता मत कीजिये इस बारे किसी को पता नहीं चलेगा ।

और शर्मा अंकल थोड़े ज़ोर–ज़ोर का धक्का देने लगते हैं , “थपाक…थपाक…थाप…थाप”, मेरी माँ की सिसक और ज़ोर हो जाती है ,
माँ : आह!…आह!… अअअईईई… ईईईसस…अअआह…आह!… आह!…
शर्मा अंकल : ईईईसस…अअआह…आह!…मज़ा आ रहा है न जयंती जी ।
माँ : हाँ!… ईईईसस…अअआह…आह!… आह!… ईईईसस

और शर्मा अंकल ठीक उसी समय मेरी माँ की गांड में थापड़–पे–थापड़ देते और माँ को मज़ा आता ,और फिर शर्मा अंकल मेरी माँ की गीली बूर से अपना लंड निकलते हैं ।
और मेरी माँ पूरा लेट जाती है बिस्तर पर , मुझे लगा था , अब इनका हो गया है,लेकिन हुआ नहीं था , बस मेरी माँ थक गई थी ।
शर्मा अंकल मेरी माँ को एक तकिया देते है और मेरी माँ उल्टा ही लेटी रहती है और शर्मा अंकल मेरी माँ की टांगों को फैला कर टांगों के बिच आते हैं ।
और मेरी माँ की बड़ी गांड को फैला कर मेरी माँ की गांड की छेद में जीभ लगा कर चाटने लगते हैं और मेरी माँ मुस्कुराते हुए बोलती है ,

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माँ : ईईईसस…अअआह…शर्मा जी आप तो बहुत ही रंगीन किस्म के मर्द लगते हैं…उउफफफ
शर्मा अंकल : उउममहह…ईईईसस… लललममम… सो तो मैं हूँ ही…जयंती जी… लेकिन आपने अभी मेरे रंगीन पान देखा कहाँ है ।

और फिर शर्मा अंकल मेरी माँ की गांड की छेद में थूक चूवाते है और मेरी माँ को पता चल जाता है , इसीलिए वो अपना गांड ऊपर उठा लेती है ।
और फिर शर्मा अंकल अपने लंड से कंडोम निकल कर माँ की पीठ पर फेंकते है और गांड की छेद में अपना लंड के टोपा को आहिस्ता से पेलते हैं ।
जिससे मेरी माँ एक दम मस्त हो जाती है और सिसक जाती है ,

माँ : ईईईसस…अअआह…शर्मा जी ज़रा संभल के ।
शर्मा अंकल : उफ्फ्फ…ईईईसस…लगता है भाई साहब ने यहाँ भी नहीं छोड़ा है आह!… आह!…ईईईसस… आह!

और शर्मा अंकल , माँ की गांड को पेलना शुरू करते है और मेरी माँ अपनी गांड ऊपर उठाए ही रहती है और शर्मा अंकल , माँ की कमर पकड़ कर पेलते ही जा रहे थे ।

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शर्मा अंकल : ईईईसस अअआह जयंती जी अब रहा नहीं जाता…ज़रा ज़ोर से बजता हूँ ।
माँ : अअअईईई…ईईईसस…नहीं शर्मा जी मुझे बाद में बहुत दिक्कत होगी ।

लेकिन ये मादरचोद शर्मा अंकल मेरी माँ की सुने ही नहीं , उन्होंने अपने पैर के एक मोज़े को निकला और मेरी माँ की मुँह में ठूस दिया ।
और फिर शर्मा अंकल , मेरी माँ की बाल को पड़के और जैम कर चोदने लागे , मेरी माँ की हालात ख़राब होने लगी थी और मैं साफ देख रहा था, की मेरी माँ की पैर कैसे दर्द से मूड रहे थे ।
और ये शर्मा अंकल मेरी माँ को चोद रहे थे और साथ ही गंदा–गंदा शब्द भी बोल रहे थे ,

शर्मा अंकल : ईईईसस…अअआह… उफ्फ्फ… चोदी तेरी इस गांड…में अपना नाम लिख दूंगा…अअआह…चोदी ।

शर्मा अंकल पूरा बौखला गए थे और फिर वो मेरी की गांड मरते–मरते एक दम से अपना लंड निकले और धना–धन पूरा लसलसीला गाढ़ा मुठ से मेरी माँ की गांड को भर दिए ।
और मेरी माँ दर्द से रो पड़ी थी और अपने मुँह से मोज़े निकल कर अपने मुँह को दोनों हाथों से छुपा ली थी और शर्मा अंकल मेरी माँ के बगल में लेट गए थे ।
शर्मा अंकल खुद भी अपने मुँह में एक हाँथ से अपना चेहरा छुपा कर गहरी सांसे ले रहे थे मैं उस समय लंड ही नहीं हिलाया लेकिन तब भी मेरा मुठ अपने आप निकल गया था ।
मुझे लगा था , इसके बाद मेरी माँ उठेगी और चलते बनेगी , क्यों की वो रो जो गई थी , लेकिन उससे भी बुरा हुआ ।
मेरी माँ जब अपने चेहरे से हाँथ हटाई और जब मैंने उनके चेहरे पर मुस्कान देखा तो मैं सोचता रह गया , आखिर ये क्यों मुस्कुरा रही है ।
मेरी माँ शर्मा अंकल के तरफ देख कर उनके लंड को पकड़ कर सहलाते हुए कहती है ,

माँ : क्या हुआ शर्मा जी? आप थक गए क्या?
शर्मा अंकल : बहुत थक गया हूँ जयंती जी…बहुत ।
माँ : ठीक है आप आराम कीजिए मैं नाहा कर आती हूँ ।

मैं तब समझा , मेरी माँ चुदक्कड़ बन गई है और उसे मज़ा आने लगा है , और फिर मुझे याद आया की मुझे तो मैच खेलना है ।
पर जब मैं खेल के मैदान में गया तो सभी जा चुके थे और मेरा बैग मेरा एक पड़ोसी दोस्त लेकर गया था और मेरे घर का चाभी भी मेरी माँ वहीं दे गई थी चोदने ।
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