प्रीत चुदी चूतनिवास से-3

(Preet Ki Bur Chudi Choot niwas se- Part 3)

मैंने बिस्तर पर चढ़ कर रानी के फूल से नाजुक शरीर को अपने आगोश में ले लिया।
रानी ने मेरा चेहरा अपने हाथों में लेकर दनादन ढेर सारी चुम्मियाँ मेरे होंठों पर लगा दीं। प्यार से मेरे बालों को सहलाते हुए बोली- चोदनाथ जी महाराज, अब ज़रा मेहरबानी करो, अपनी प्रीत रानी की बेहाल बुर पर… बहुत तड़पा लिया जनाब… अब रहम कर भी दो!

तब तक मैं भी बेताब हो चुका था, अण्डों में भराव महसूस होने लगा था और काफी देर से अकड़े अकड़े लौड़े की जड़ में हल्का सा दर्द उतने लगा था।
मैंने दीपक को आवाज़ लगाई- दीपक… मेरा सूटकेस खोल… उसमें एक हल्के क्रीम शेड का तौलिया रखा है, उसको चार तह करके दे… रानी के चूतड़ों के नीचे लगाना है, नहीं तो होटल वालों की चादर में खून लग जाएगा.. अच्छा नहीं लगेगा… और हाँ वो जो रसगुल्लों का आर्डर किया था न तो तू एक रसगुल्ला लेकर तैयार रह.. जैसे ही रानी की बुर फटे तू झट से उसके मुंह में रसगुल्ला डाल देना… आई समझ कुत्ते?

‘जी सर जी…अभी लाया.’ दीपक की आवाज़ आई!

दीपक ने तौलिया मेरे हाथ में थमाया और बेड की साइड में रसगुल्ले की प्लेट लेकर खड़ा हो गया, मैंने उसे ध्यान से देखा, वो भी नंगा था, अच्छा हट्टा कट्टा बलिष्ठ शरीर था और लंड भी अच्छा लम्बा और मोटा! हमारी चूमा चाटी देख कर लंड पूरा खड़ा हुआ था।

खूब खुश रखेगा मेरी प्रीत रानी को चुदाई में, थोड़ी ट्रेनिंग कण्ट्रोल करने की दे दूंगा मादरचोद को, तो ये भी हरामी भविष्य का चूतनिवास बन सकता है।

मैंने एक तकिया रानी के नितंबों के नीचे जमाया और तौलिये को चार तह करके तकिये पर रख दिया। अब रानी की बुर ऊपर को उठ गई थी और लंड लीलने के लिए तैयार थी, रस फफक फफक के बुर से बाहर रिस रहा था। इस मदमस्त बुर के दर्शन करके मैंने खुद को रानी की हसीन टांगों के बीच में जमाया और लंड की सुपारी बुर के मुहाने पर हल्के से सटा दी।

बुर के चिकने चिकने रस से लौड़े का टोपा पूरा सन गया, रानी ने ज़ोर से सीत्कार भरी और नितम्ब उछाले, उसने अपने दोनों हाथों से चूचे थाम लिए और लगी उनको दबाने! मैंने थोडा सा ज़ोर लगाते हुए लंड की सुपारी बुर में घुसा दी।

रानी ने कराहते हुए कहा- राजा दर्द हो रहा है… थोड़ा हल्के से!
मैंने लंड पकड़ के सुपारी को थोड़ा थोड़ा गोल गोल घुमाया, रानी चिहुंक उठी और आहें पर आहें भरने लगी। थोड़ी सी देर यूँ ही करते हुए मैंने एक पावरफुल शॉट ठोका तो लौड़ा धाड़ से रानी की सील फाड़ता हुआ जड़ तक बुर में जा घुसा।

रानी दर्द से चिल्ला उठी- आ आ आ उम्म्ह… अहह… हय… याह… आ आ आ…
तभी दीपक ने रसगुल्ला उसके मुंह में डाल दिया तो रानी के मुंह से चीख की बजाये घू घूं घूं की आवाज़ निकली।
इधर बुर का पर्दा फटने से ढेर से लहू का फुव्वारा छूटा जिसने रानी की तंग कुमारी बुर को भर दिया, गर्म गर्म चिपचिपे रक्त में लंड डूब गया और काफी सारा खून बुर के बाहर भी आ गया, मेरे अंडे, झांटें और रानी की जांघें खून में सन गईं।
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रानी ने रसगुल्ला खा के फिर से दर्द में कराहना शुरू कर दिया- चोदनाथ, प्लीज़ रुक जा.. बहुत तेज़ दर्द हो रहा है.. हाय हाय हाय मर गई, ऊऊऊहहह… ऊऊऊहहह… आज न बचूंगी… हाय हाय हाय!
रानी पीड़ा से तड़प रही थी।

मैं बिना लंड को हिलाये डुलाये पड़ा रहा और रानी से धीमी धीमी आवाज़ में कहता रहा- प्रीत रानी… घबरा मत रानी… बस ज़रा सी देर दर्द होगा फिर मजा आना शुरू हो जाएगा… एक रसगुल्ला और खा ले… देख फिर कैसे दर्द गायब होता है… आज का दिन बड़ा मुबारक है मेरी जान… आज तू कच्ची कली से फूल बन गई है… आज तेरी बुर का उद्घाटन हुआ है… मैं तुझ पे कुर्बान जाऊं रानी, आज तू मेरी रखैल बन गई है जानू… अरे दीपक के बच्चे ला जल्दी से दूसरा रसगुल्ला!

दीपक ने झट से एक और रसगुल्ला प्रीत रानी के मुंह में घुसा दिया। इधर मैंने रानी के आलीशान चूचियों को सहला सहला के हौले से दबाना शुरू कर दिया, रसगुल्ला खा के भी रानी कुछ देर तक दर्द से हाय हाय करती रही, खून अभी भी निकले जा रहा था। शायद रानी के कौमार्य का पर्दा काफी सख्त था जिसके कारण उसको पीड़ा भी काफी हुई और खून भी काफी बहा।

कुछ मिनटों के बाद जब रानी ने कराहना बन्द कर दिया तो मैं समझ गया कि अब दर्द कम हो गया है, मैंने दो तीन धक्के हल्के हल्के से लगाए, अबकी बार रानी चिल्लाई नहीं बल्कि आँखें मूंदे चुपचाप रही।

अब मैंने रानी के पैर अपने कन्धों पर टिकाये, एक उंगली से रानी की नाभि और दूसरी से उसकी भगनासा (बुर का दाना) को सहलाना शुरू कर दिया, साथ साथ हल्के हल्के धक्के धीरे धीरे मारने लगा।
रानी ने आहें भर के संकेत दे दिया कि दर्द जा चुका है और अब उसको लंड से बुर में चलती हुई रगड़ से आनन्द आने लगा है।
एक मन्द सी मुस्कान उसके होंठों पर खेलने लगी थी।

इतनी देर के मस्ताने खेल खिलवाड़ से मैं भी हद से ज़्यादा गर्म हो गया था, मैंने रानी के कूल्हे जकड़ कर शॉट लगाने शुरू किये। रानी भी अब शॉट का साथ शॉट से देने लगी थी।
हर थोड़ी देर बाद मैं रानी की भगनासा को मसल देता था और मम्मे निचोड़ देता था।

रानी सिसकारियाँ लेने लगी थी, वह तेज़ी से सिर दायें बाएं हिला रही थी, उसके बाल बिखर गए थे और आँखों में गुलाबी गुलाबी डोरे तैरने लगे थे।
मैंने झटकों की रफ़्तार थोड़ी बढ़ा दी और चूचुक अधिक बल से निचोड़ने लगा। रानी मस्तानी होकर कुछ कुछ बकने लगी- चोदनाथ माँ के लौड़े… और तेज़ चोद… बड़ा मज़ा आ रहा है मादरचोद… आह आह आह!

मैंने धक्के तेज़ कर दिए। खून और जूस से भरी हुई बुर पिच्च पिच्च करने लगी थी। मैं लंड को पूरा बाहर खींच के धमाक से धक्का ठोकता तो फचाक की ध्वनि होती।

मैं रानी के ऊपर अपनी कुहनियों के बल लेट गया और रानी के होंठ चूसते हुए मध्यम चाल से धक्के लगाने लगा और अपना शरीर आगे पीछे करते हुए रानी के मुलायम बदन को रगड़ने लगा।
रानी ने भी अपनी जीभ मेरे मुंह में घुसा दी और मज़े में चुसवाने लगी, उसकी बाहें मुझे कस के जकड़े हुए थीं, उसने टाँगें भी कैंची बना के मेरी टांगों में लिपटा ली थीं और नीचे से कूल्हे उछाल उछाल के धक्कों में साथ दे रही थी।

बुर से रस बहे जा रहा था, प्रीत रानी मस्ती में झूमते हुए कभी मेरी पीठ पे नाखूनों से खरोंचती, कभी प्यार से मेरे बालों में उंगलियाँ फिराती। कई बार उसने कामावेश में उत्तेजित होकर अपनी टाँगें भी ज़ोर ज़ोर से मेरी टांगों के पिछले भाग में मारीं।

रानी का रेशमी साटिन जैसा बदन मेरे बदन से चिपक के मेरी वासनाग्नि को अंधाधुंध भड़काए जा रहा था, मेरी सांस तेज़ हो चली थी, माथे पर पसीने की बूंदें उभर आई थीं।
मैंने प्रीत रानी तरफ देखा, वो भी अब गर्म हो चली थी, उसने भी आधी मुंदी हुई मस्त आँखों से मेरी तरफ बड़े प्यार से देखा, दोनों हाथों मेरा चेहरा पकड़ा और फिर अपनी तरफ खींच के मेरे होंठ चूसने लगी।

थोड़ी देर इसी प्रकार चूसने के बाद बोली- चोदनाथ… तुमने कितना मस्त कर दिया है… अब ज़रा भी दर्द नहीं हो रहा… बड़ा मजा आ रहा है… पता है राजा जी, मेरे बदन में फिर से अकड़न महसूस होने लगी है… ऐसा क्यों हो रहा है?

मैंने उसका एक चुम्बन लिया और कहा- रानी… तू चुदासी हो रही है… मैं सब अकड़न ठीक कर दूंगा… तुझे चोद चोद के… अब तो दर्द होने का काम भी खत्म हो चुका… अब तो रानी बस मस्ती और बस मस्ती में डूबे रहना है!

इतना कह कर मैंने दोनों हाथों से प्रीत रानी के उरोज पकड़ लिये और उन्हें भींचे भींचे ही धक्के पे धक्का लगाने लगा। धक्के के साथ साथ चूचुक मर्दन भी खूब ज़ोरों से हो रहा था।
रानी अब मस्तानी होकर चुदाये जा रही थी और साथ में सीत्कार भी भरती जाती थी। कामुकता के नशे में चूर होकर उसकी आँखें मुंद गई थीं, मुंह थोड़ा सा खुल गया था और बुर दबादब रस छोड़े जा रही थी।

अचानक मैंने धक्कों की स्पीड कम कर दी और बहुत ही हौले हौले लंड पेलना शुरू किया, मैं लौड़ा पूरा बुर के बाहर करता और फिर धीरे से जड़ तक बुर के अंदर घुसेड़ देता।

प्रीत रानी छटपटा उठी, कसमसाते हुए रुंधे हुए गले से कहने लगी- चोदनाथ राजा जी… बड़ा मजा आ रहा है… मेरा दिल कर रहा है कि तुम मेरा कचूमर निकाल दो… तुम स्पीड कम कर देते हो तो ये निगोड़ा बदन काट खाने को होने लगता है… अब राजा पूरी ताक़त से धक्के ठोको। मुझे पता नहीं क्या हो रहा है… बस जी कर रहा है कि तुम मुझे दबोच के मेरा मलीदा बना दो!

फिर उसकी आवाज़ और ऊँची हो गई- राजे… तोड़ दो… पीस दो मेरा बदन… मैं दुखी आ गई इससे… हाय… हाय… अब मसलो ना… किस बात का इंतज़ार कर रहे हो… मेरी जान निकली जा रही है… माँ चोद डालो मेरी!

कुछ समय तक यूँ ही चोदने के बाद मैंने एक गुलाटी मारी जिससे मैं नीचे हो गया और प्रीत रानी ऊपर आ गई। मैंने दस बारह खूब तगड़े धक्के ठोके, तो वो पागल सी होकर मुझ से पूरी ताक़त से लिपट गई, उसकी विशाल चूचियाँ मेरी छाती में गड़े जा रही थीं, अकड़े हुए निप्पल चुभ रहे थे और उसकी गर्म गर्म तेज़ तेज़ चलती सांस सीधे मेरे नथुनों में आ रही थी, बुर से रस छूटे जा रहा था।

और फिर जैसे ही मैंने एक तगड़े धक्के के बाद लंड को रोक के तुनका मारा, रानी चरम सीमा पर पहुंच गई, उसने मेरा सिर कस के भींच लिया और नितम्ब उछालते हुए कुछ धक्के मारे।
वो झड़े जा रही थी… अब तक कई दफा चरम आनन्द पा चुकी थी, झड़ती, गर्म होती और ज़ोर का धक्का खाकर फिर झड़ जाती।

ऐसा कई मर्तबा हुआ, अब तक मैं भी झड़ने को हो लिया था, मैंने रानी को उरोजों से पकड़ के ऊपर को किया, फिर दूधों को जकड़े जकड़े ही कई ताक़तवर धक्के ठोके और स्खलित हो गया।
भल्ल भल्ल करते हुए ढेर सारा लावा लौड़े ने प्रीत रानी की ताज़ी ताज़ी सील टूटी बुर में उगल दिया।
इस दौरान प्रीत रानी भी कई बार फिर से झड़ी।

हमारी साँसें बहुत तेज़ चल रही थीं, झड़ के मैं नीलम रानी के ऊपर ही पड़ा हुआ था, रानी आँखें मींचे चुपचाप पड़ी थी और अभी अभी हुई विस्फोटक चुदाई का मजा भोग कर सुस्ता रही थी।

तभी भैं.. भैं.. भैं.. की एक ऊँची मरदाना आवाज़ हमारे कानों में आई।
ध्वनि की दिशा में गर्दन घुमा कर देखा तो दीपक मुट्ठ मार रहा था बहुत तेज़ तेज़!
उसके हाथ बिजली की तेज़ी से उसके फुननाए हुए लंड की खाल को आगे पीछे कर रहे थे।

और यकायक उसने एक ज़ोरदार आह भरी और झड़ गया। साले का वीर्य पिस्तौल से छूटी गोली की रफ़्तार से बहुत सारे बड़े बड़े लौंदों के रूप में पांच छह फुट दूर जाकर फर्श पर गिरा।
मुझे उस पर तरस आ गया, बेचारा अपनी माशूका की बुर का सीलमर्दन घंटे भर से देख रहा था। तो हरामी का मुट्ठ मारना तो लाज़िमी था ही!

स्खलित होकर दीपक वहीं सोफे पर ही निढाल होकर पसर गया।

कुछ देर के बाद जब हमारी स्थिति सामान्य हुई तो मैंने प्रीत रानी के मुंह को प्यार से चूमा। उसके चहरे पे बहुत संतुष्टि का भाव था जैसे कोई बच्चा अपना मनपसंद खिलौना पा के तृप्त दिखाई देता है।
कौमार्य भंग करवा कर चुदी हुई प्रीत रानी बड़ी प्यारी सी गुड़िया सी लग रही थी।

कुंवारी बुर चोदन की सेक्स स्टोरी जारी रहेगी।

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