स्नेहा की मनमोहक कुंवारी गुलाबी चूत

Sneha ki manmohak kunwari gulabi chut

दोस्तो, आज मैं अपनी पहली कहानी लिखने जा रहा हूँ। पसंद आए तो मुझे ज़रूर बताना और कोई गलती हो जाये तो माफ करना…

मेरा नाम सतीश है, ये कहानी है मेरी एक दोस्त के साथ किया गए सेक्स की…

उस लड़की का नाम था स्नेहा और फिगर… फिगर तो पूछो ही मत 34-27-35। मेरा तो उसे देखकर ही खड़ा हो जाता था और पैंट के अंदर से ही सलामी देने को तैयार रहता था।

स्नेहा, मेरे कॉलेज में ही पढ़ा करती थी और मैं भी उसकी चूत पर अपनी बाज़ी मारने के लिए काफी अरसे से तरसा जा रहा था।

मेरे कॉलेज की उस छमिया पर तो सभी लड़के लाइन मारा करते थे, पर वो किसी को भी भाव तक नहीं दिया करती थी।

लेकिन एक दिन मेरी किस्मत खुल गई, जब उसका घर मेरे पड़ोस में बदली हुआ और उस दिन तो मेरे अंदर के शेर ने भी अच्छी खासी दहाड़ ले ली थी।

अब हम रोज ही तांका-झांकी करने लगे थे और वो भी मुझे खूब भाव दिया करती थी। शायद वो भी मुझसे चुदवाना चाहती थी… लेकिन मौका नहीं मिल रहा था।

मैं स्नेहा के घर में रोज देखता तो पता चला कि वो अपने माँ-बाप और अपनी दादी के साथ रहती है, जो हमेशा बीमार ही रहा करती थी।

मेरे लिए सही मौका था, स्नेहा के साथ हमदर्दी जताकर बात करने का… सो मैंने किया भी।

अब हम कॉलेज एक साथ ही जाया करते थे और एक साथ ही आ भी जाया करते थे।

अब मैं उसके घर पर भी आया-जाया करता था और उससे हमदर्दी जताने के बहाने खूब बात करता और धीरे-धीरे उसके काफ़ी करीब भी आ चूका था। मैं अब तलक समझ चूका था कि मेरे पास मस्त मौका था स्नेहा की चूत को बजाने के लिए और फिर एक दिन वो मौका आ ही गया।

हुआ कुछ यूं कि स्नेहा के माँ-बाप कहीं बाहर गए हुए थे…

वो मेरे घर आई और मेरी मम्मी से बोली कि दादी की तबीयत कुछ खराब है और उसे कुछ दवाइयाँ मंगानी हैं, इसलिए सतीश यानि मैं बाज़ार से दवाई ला दूँ…

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मेरी मम्मी ने मुझे ये बात बताई तो मैं तो बहुत खुश हुआ कि शायद आज कुछ मौका मिल जाये।

स्नेहा दवाई का पर्चा और पैसे देकर अपने घर चली गई और मैं बाज़ार।

मैंने जल्दी से दवाइयाँ खरीदीं और स्नेहा के घर पहुँच कर उसका दरवाजा खटखटाया। उसने दरवाजा खोला, मैंने दवाइयाँ उसे दी।

उसने कहा कि अंदर आओ ना।

मैं खुशी-खुशी अंदर जाकर बैठ गया। मैंने देखा कि उसने एक मस्त टॉप और जींस पहन रखी थी।

कुछ देर बाद वो अपनी दादी को दवाई देकर बाहर आई और मुझसे थैंक्स कहा, बाज़ार से दवाई लाने के लिए और मुझसे पूछा कि चाय लोगे?

मैंने मना कर दिया तो वो मेरे पास ही आकर बैठ गई और मुझसे बातें करने लगी।

आप तो जानते ही है कि जब ऐसे प्यासे प्रेमी एक-दूसरे से मिलें तो क्या होता है। कुछ देर तक तो इधर-उधर की बातें करते रहे और फिर वही बाय्फ्रेंड-गर्लफ्रेंड की बातें।

कुछ देर बाद मैंने उसे अपनी बाहों में थाम लिया और वो भी अपनी मुस्कान देते हुए मुझ में सिमट गई।

फिर उसने मेरे चेहरे से चेहरा मिलाया और मुझे घूर के अपनी मदमस्त नशीली आँखों से देखने लगी, उसकी आँखों में भी अब मुझे वासना नज़र आ रही थी।

मैं अब अपने मोटे लण्ड को उसकी चूत में देने के लिए सुलगने लगा था।

अब मैं उसे हौले–हौले बिस्तर पर बिठाकर उसकी टॉप के ऊपर से ही उसके चुचों पर हाथ फेरता हुआ गरमा रहा था।

स्नेहा का एक हाथ अपनी चूत को ऊपर से मसल रहा था तो दूसरा मेरी पैंट के ऊपर से ही लण्ड को सहला रहा था।

मैंने उसके होंठों को एकदम से अपने लबों में भर लिया।

मैं अब बेसबर होकर स्नेहा के चुचों को दबाता हुआ उसके होठों का रस चूसने लगा जिसपर वो भी मुझे सहयोग करती हुई मेरी कपड़ों को खुद ही खोलने लगी। उसके होंठों का रस तो शहद से भी अच्छा लगा मुझे।

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फिर मैंने स्नेहा के टॉप को उतारा। उसने काले रंग की ब्रा पहन रखी थी और उसमे बंद थे उसके बिलकुल सफ़ेद रंग के बूब्स…

उसकी ब्रा उतारते ही उसके बूब्स मेरे हाथों में आ गए क्या बूब्स थे यार उसके… मैं उसके निप्पल को होंठों से चूसने लगा।

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वो सिर्फ़ आह… उः… उफ़… की आवाज़ें निकालने लगी, साथ ही मुझे भी बहुत मज़ा आ रहा था।

मैंने भी अपने बाकी कपड़े उतारे, मैं अब सिर्फ अंडरवीयर में था।

साथ ही साथ मैंने उसकी जीन्स उतार दी। उफ़!!! क्या टांगें थी उसकी और ऊपर से गुलाबी रंग की पैंटी ने तो मेरे होश ही उड़ा दिये… वो पीठ के बल लेट गई।

दिल थाम के अब मैंने उसके पैंटी उतारनी शुरू की। पैंटी उतारने पर मैंने देखा की उसकी चूत एकदम गुलाबी रंग की थी, और बाल हल्के-हल्के ही थे अभी तक शायद उसने अब तक किसी से चुदवाया नहीं था।

मैंने अपना मुंह उसकी गुलाबी चूत पर रख दिया। क्या खुशबू थी उसकी चूत की, उसने मुझे मदमस्त कर दिया।

अब मैं उसकी चूत के छेद को चाटने लगा और उसमें अपनी जीभ डाल के अंदर बाहर करने लगा।

उसे भी मज़ा आ रहा था और वो दबी-दबी आवाज में सिसकारियाँ ले रही थी।

2-3 मिनट बाद ही वो अपनी गाण्ड ऊपर उठाने लगी और उसका पानी निकल गया।

अब उसने मेरा लण्ड अंडरवीयर के ऊपर से ही हाथों में पकड़ लिया और मेरा अंडरवीयर उतार दिया। मेरा 7 इंच लंबा लण्ड देखकर वो डर सी गई, कहने लगी – इतना लंबा होता है ये?

मैंने कहा – इसे चूसो, तो उसने साफ-साफ मना कर दिया

खैर, फिर मैंने उसकी चूत में लण्ड को डालने की कोशिश की तो लण्ड बार-बार फिसल जाता।

मैंने फिर अपने लण्ड और उसकी चूत के छेद पर वैसलीन लगाई और लण्ड अंदर डालने की कोशिश की।

अभी लण्ड उसकी चूत में आधा भी अंदर नहीं गया था की वो चीखने लगी…

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तब मुझे पता लगा की वो वर्जिन थी…

पर मैं भी कहाँ मानने वाला था मैंने उसके होंठों पर अपने होंठ ऐसे चिपका दिये कि जैसे फेविक्विक से चिपका दिये हों।

अब मैंने एक ज़ोर का झटका लगाया तो लगभग सारा लण्ड उसकी चूत में घुस गया… वो चीखना चाह रही थी लेकिन वो चीख नहीं पायी क्यूंकी उसके होंठों से तो मैंने अपने होंठ बिलकुल चिपका ही लिए थे।

मैं थोड़ी देर ऐसे ही रहा फिर जब उसका दर्द कुछ कम हुआ तो मैंने फिर धक्के मारने शुरू किए और फिर अपने लण्ड को उसकी चूत पर टिकाकर अंदर-बाहर करने लगा।

स्नेहा को भी अब मज़ा आने लगा था शायद…

वो अब अपनी दोनों हाथों की उँगलियों से सिसकारियाँ भरती हुई अपने बूब्स को मसल रही थी और साथ ही साथ मैं उससे किस भी कर रहा था।

हमारी ये चुदाई लगभग 10-12 मिनट चली।

बाद में तो वो भी जोर–जोर से अपनी गाण्ड हिलाती हुई आ… आ… आ… करके चिल्ला रही थी।

मेरा पानी निकल गया और इस दौरान वो भी 2 बार झड़ चुकी थी।

कितना मज़ा आया था मुझे उस दिन शायद अब शब्दों में बयान करना मुश्किल है।

हम दोनों सोफ़े पर उस दिन एक-दूसरे से सिमटे हुए बस आह्ह… अहहहहा… करते हुए चुदाई की कामवासना में मग्न थे।

मेरा मन भी किया कि मैं फिर से वही सब करूँ लेकिन डर था कि कहीं मम्मी को शक ना हो जाये।

उसके बाद भी मैंने उसकी कम से कम १०० बार चुदाई की…

आपको मेरे कहानी कैसी लगी… मुझे बताएं…

मुझे सभी लड़कियों, भाभियों और पाठकों के जवाब का इंतज़ार रहेगा…

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