सुनहरे पल

(Sunehare Pal)

प्रेषिका : दिव्या डिकोस्टा

गोवा में लड़कियाँ जल्दी जवान हो जाती है। उसका मुख्य कारण है कि यहाँ सभी लोग मांस खाने शौकीन हैं। यहाँ पर तरह तरह की मछलियाँ, सूअर और बडे का मांस भी बहुत शौक से खाया जाता है। ये सब तामसी भोजन हैँ, इससे लड़कियाँ जल्दी बड़ी दिखने लग जाती है। उनमें गर्मी भी बहुत होती है। जवान होते होते कितनी ही बार चुद चुकी होती हैं। मैं अब जवान हो चली थी, मेरे मम्मे भी थोड़े उभार ले चुके थे। एक लड़का मेरा दोस्त भी बन गया था। एक दिन उसने मुझे चोद भी दिया था। फिर उसने मुझे दो तीन बार और मौका मिलने पर चोदा फिर उसके पिता की बदली हो गई और वो यहाँ से चला गया। बस तब से मैं चुदने के लिये तरसती रही।

शाम को मैं और मेरा छोटा भाई रोज ही पास के गार्डन में घूमने जाते थे। मेरे भाई मुन्ना की उम्र भी लगभग मेरे बराबर ही थी, बस एक साल छोटा था मेरे से।

एक दिन एक प्यारी सी घटना हो गई। मैं कभी सुनहरे पल याद करती हूँ तो बस भैया से चुदने का मन हो उठता है।

हम हमेशा की तरह गार्डन में घूम रहे थे। शाम का धुंधलका बढ़ चला था। बगीचे की लाईटें जल उठी थी। हम दोनों एक छोटी तलाई के किनारे रेलिंग के सहारे खड़े हो कर बाते कर रहे थे कि अचानक मैंने झुरमुट में एक लड़का और लड़की को देखा। वो आपस में लिपटे हुये एक दूसरे को चूम रहे थे।

मैंने मुन्ना को कोहनी मारी …

“क्या है … ?”

“वो देख … वो क्या कर रहे हैं … ”

“अरे हां … ये तो चूमा चाटी कर रहे हैं … ”

“और भी ध्यान से देख ना … ”

“अरे … ये तो कुछ गड़बड़ कर रहे हैं”

“भैया, इसमें मजा आता है क्या … ”

“पता नहीं … हो सकता है !”

“कैसा लगता होगा … तूने कभी किया है ऐसे?” हालांकि मुझे पता था कि कैसा लगता है।

“नहीं किया तो नहीं है … कर के देखें … ?”

“सच्ची … मजा आयेगा तो और करेंगे !” मैंने उत्साहित हो कर भोलेपने से कहा।

“चल उस झाड़ी के पीछे चलते हैं … ” हम दोनों जल्दी से वहां गये तो वहाँ पर पहले से ही एक लड़का और लड़की लिपटे हुये थे। लड़का लड़की के चूतड़ों को दबा रहा था। हम उन्हें अनदेखा करते हुये दूसरी झाड़ी की ओर मुड़ गये। वहाँ कोई नहीं था।

“मुन्ना कैसे करें अब … ?” मैंने मासूमियत से कहा।

“मुझे क्या पता … अच्छा अपन एक दूसरे से लिपट जाते हैं जैसे कि वो कर रहे थे।” मुन्ना बोला।

“अच्छा आ जा … !” मुन्ना ने मुझे लिपटा लिया। मैंने जानबूझ करके अपने मम्मे उसकी छाती पर रगड़ दिये।

“अब चूमें क्या … ?” मैंने उसे उत्साहित किया। मैंने अपने होंठ उसकी ओर बढ़ा दिये। मुन्ना ने भी अपने होंठ मेरे होंठो से चिपका दिये। मुझे सनसनाहट सी होने लगी। तभी मुझे लगा कि मुन्ना का लण्ड खड़ा हो गया है। मैंने मुन्ना के चूतड़ पकड़ कर दबा दिये।

“मुन्ना ऐसे ही ना दबाते हैं … ” मैंने उसे अपनी ओर खींचते हुये कहा। उसके लण्ड का कड़ापन मेरी चूत में गड़ने लगा। उसने भी मेरे चूतड़ पकड़ कर दबा दिये

“ठीक है ना गुड़िया … ऐसे ही दबाते है ना?” उसके लण्ड का कड़ापन मुझे बहुत ही सुहाना लग रहा था। मुझे तो लगने लगा कि बस अब मुन्ना मुझे चोद ही दे। मैंने सोचा कि मुन्ना को अब उत्तेजित करना चाहिये।

“मुन्ना ये नीचे क्या लग रहा है … ?” मैंने भोलेपन से पूछा।

वो शर्मा गया,”ये तो जाने कैसा हो गया है … ” मुन्ना शर्माता हुआ बोला।

“पर मजा तो आता है ना … मैं देखूँ क्या?” मुझे पता था कि वो मना कर देगा। इसलिये जवाब के पहले ही मैंने उसका लण्ड पकड़ लिया।

वो सी-सी कर उठा,”ये क्या कर रही है … ”

“ओह लग गई है क्या ?” मैंने लण्ड छोड़ दिया।

“नहीं नहीं … मजा आता है … !”

“ओह हो … मैं तो डर गई थी।” मैंने फिर से उसका लण्ड पकड़ लिया, पर इस बार उसे दबा भी दिया। मुन्ना ने मुझे कस कर लिपटा लिया और जोर जोर से चूमने लगा। यूं तो आस पास अंधेरा था पर खेल एक बार आरम्भ करना था, फिर बाद में तो हम ये खेल घर पर भी अकेले में खेल सकते थे। मैंने उसका लण्ड जोर जोर से मसल दिया ताकि उसे और मजा आये। कुछ देर तक मैं उसका लण्ड मसलती रही और उसे बहुत ही बैचेन कर दिया … अब मुझे लगने लगा था कि वो मुझे चोदे बिना नहीं छोड़ने वाला …

फिर बोली,”मुन्ना, कोई देख लेगा … बस अब घर चलते हैं … ”

“बस गुड़िया, थोड़ा सा और … ।” पर मैंने उसे मना कर दिया। वो भी मन मार कर मेरे साथ घर की तरफ़ चल दिया। रास्ते भर वो यही बात करता रहा … कि कितना मजा आया। मैं उसे और उत्तेजित करती रही। घर आते ही हमने खाना खाया और कमरे की तरफ़ चल दिये। मैंने अपनी किताबें खोली और पढ़ाई का बहाना करने लगी। मन में तो मुन्ना का लण्ड घूम रहा था। दूसरी मेज़ पर मुन्ना पढ़ रहा था। वो बार बार मेरी तरफ़ ही देख रहा था। रात गहरा गई थी। मम्मी पापा सो चुके थे। मुन्ना ने उठ कर दरवाजा बंद कर लिया और मुड़ कर मेरी तरफ़ देखा।

“चल गुड़िया … वो ही करें … ” मेरा दिल धड़क उठा। सवेरे तक अब हमे कोई छेड़ने वाला नहीं था। हम सुरक्षित भी थे।

“कपड़े तो बदल ले … बस पजामा ही पहनना !”

“आप भी दीदी … बदल लो” हमने दोनों ने कपड़े बदल लिये। मैंने एक ऊंचा सा पुराना स्कर्ट पहन लिया। ताकी बस उसे ऊंचा किया और चूत सामने आ जायेगी। मुन्ना ने बस कहे अनुसार अपना पजामा पहन लिया। उसका बैचेन लण्ड उसमें से साफ़ उभर कर नजर आ रहा था। उसने अपनी बाहें फ़ैला दी, मैं उसमें जाकर समा गई। उसने मुझे लिपटा लिया और मेरी चूत पर अपने लण्ड को दबा दिया। मैंने उसका पजामा नीचे खिसका दिया। उसका लण्ड बाहर आकर किसी मस्त सांड की तरह झूमने लगा। उसने मुझे चूमना चालू कर दिया। अब से उसका लण्ड पकड़ना आसान था। वो मेरे चूतड़ मसलता रहा। मैं भी उसके चूतड़ दबाने लगी। अब उसके लण्ड की बारी थी। मैंने उसे थाम लिया। मुझे वो मोटा लगा … पूरा लण्ड मैंने हाथ में भर लिया और उसकी मुठ मारने लगी। वो लिपट गया और सिसकारी भरने लगा।

अचानक मेरी तेज नजर उसके लण्ड पर पड़ी, मैं बुरी तरह चौंक गई। उसके लण्ड की सुपाड़े से लगी हुई स्किन फ़टी हुई थी।

ओह, तो यह मेरी ही तरह भोला बनने का नाटक कर रहा था। वो ये सब नाटक मजा लेने के लिये कर रहा था। मेरा मन खुश हो गया, कि चुदाई भरपूर होगी। वो तो अपने में मगन कह रहा था

“गुड़िया, इसमें तो बहुत मजा आ रहा है यार !”

“हां मुन्ना, मुझे भी आ रहा है, और दबा पीछे … ” मैं भी अब खुलने लगी।

“गुड़िया, तेरी सू सू कहा है … खड़ा ही नहीं हुआ” मैं धीरे से हंस पड़ी।

“अरे भैया, हमारे ये डण्डा जैसी सू सू नहीं होती है, जैसे कि तेरे मम्मे नहीं है ना”

“अरे हां … तेरे मम्मे तो बता … ” उसने मेरे मम्मे पर हाथ घुमा दिया, फिर कुर्ते के अन्दर हाथ डाल दिया। और उसे टटोलने लगा। मुझे बहुत ही आनन्द आने लगा। मैंने भी तबियत से मम्मे उसके हवाले कर दिये और मसलवाने लगी।

“भैया, थोड़ा जोर से दबा दे ना … ”

“उससे क्या होगा … ” उसने मेरे मम्मे दबा दिये। फ़िर घुण्डी भी घुमा दी। मैं मस्ती में झूम उठी।

“भैया, तुम्हारे डण्डे में जैसा मजा आता है ना, बस वैसा मजा आता है।”

“इतना ज्यादा मजा … निकाल तेरा डण्डा … ” और उसने मेरी चूत पर हाथ मार दिया। पर वहां कुछ होता तो तो पकड़ता ना … उसकी नाटक बाजी चलती रही। पता था कि ये सब तो उसे पता है।

“मुन्ना धीरे से … नाजुक जगह है … हां अब ढूंढ डण्डे को … जरा प्यार से, है ना” उसका हाथ मेरी चूत पर घूमने लगा, डन्डा तो मिला नहीं हां उसकी अंगुली चूत में जरूर घुस गई। मेरे मुख से आह निकल गई।

“मुन्ना खड़े खड़े थक गई, चल आराम से बिस्तर पर करते हैं !”

“गुड़िया कपड़े पूरे उतार दे, मजा आयेगा !” मैंने सहमति में सर हिला दिया। और कपड़े उतार दिये। अब हम दोनों बिस्तर में थे। मैंने अब खुलना ही बेहतर समझा। वर्ना नाटक में कही कोई कसर रह गई तो चुदाई में मजा नहीं आयेगा।

“मुन्ना एक बात कहूँ … सच बताना … तुझे मेरी कसम … !”

“पूछो दीदी … ”

“कभी किसी लड़की को तूने चोदा है तूने?” वो अब झेंप गया।

“नहीं तो दीदी … वो कैसे करते हैं … ?” बड़े भोलेपन से उसने पूछा।

मैंने उसे चूमते हुये कहा,”अरे मैं कुछ कह थोड़े रही हू … तेरा मामला है तू जाने … बता न !”

उसकी नजरें झुक गई। फिर कुछ सोच कर बोला,”नहीं तो दीदी … चल ना अपन मस्ती करें”

“मुझसे झूठ बोलता है … बता कौन थी वो … तेरा लण्ड कह रहा है तूने चोदी है, बड़ा भोला बनता है?” मैंने उसे जोर देकर कहा।

“हां गुड़िया, तेरी ही सहेली है … वो मुझसे बस चुदवाती है, प्यार नहीं करती है।”

“तो अब खुल कर मजे कर ना … आजा … ये देख मेरी चूत … मैं भी चुदा चुकी हूँ … ”

“अरे यार पहले क्यों नहीं बताया … ”

“यह नाटक तो खुलने के लिये किया था … अब तो मुझे चोद दे !”

मुन्ना सारी शरम छोड़ कर मुझे अपनी बाहों में लेकर बिस्तर पर लेट गया और हम अब खुल कर बेशर्मी से वासना का खेल खेलने लगे। मैंने भैया को नीचे चित्त लेटा दिया और उसका लण्ड मलने लगी। वो सिसकारियाँ भरने लगा, आह ऊह्ह करने लगा। मैं उसके ऊपर लण्ड के पास बैठ गई। उसका लौड़ा पकड़ कर मैंने अपनी चूत पर रख कर उसे अन्दर ले लिया। उसका लौड़ा मेरे बोझ से चूत के अन्दर उतर गया। कम चुदने के कारण मेरी चूत अभी पूरी खुली नहीं थी। मुन्ना का लण्ड तो मोटा और लम्बा था, मुझे लगा कि मेरी चूत को पूरी खोल देगा। उसका लण्ड कसता हुआ जैसे तंग गली में जा रहा था। चूत लण्ड की मोटाई के अनुसार फ़ैल कर लण्ड को अपने में समा रही थी। मुन्ना मस्ती में अपनी आंखे किये हुये था। धीरे धीरे लण्ड पूरा घुस गया। मुझे ना तो लगी और ना ही दर्द हुआ। चूत पानी छोड़ रही थी। अब मैंने हिम्मत करके धक्के तेज कर दिये। मैं बड़े आराम मैं चुद रही थी। भैया ने मेरे बोबे दबा डाले और वो अपने चूतड़ नीचे से हिलाने लगा। लण्ड मेरी चूत में असीम आनन्द देने लगा। मैं उसके ऊपर लेट गई और हम लिपट कर चुदाई करने लगे।

“भैया सच कहूँ, ये लण्ड क्या गाण्ड में भी घुस जाता है?”

“दीदी पता नहीं, मैंने कभी गाण्ड नहीं मारी … चल कोशिश करें … ?”

मैं इस एक नये अनुभव के लिये तुरन्त ही तैयार हो गई। तरह तरह से अंगों के इस्तेमाल की सोच ने मुझे रोमंचित कर दिया।

“गुड़िया, चल झुक जा, और गाण्ड मेरे सामने कर दे … मैं लण्ड घुसाने की कोशिश करता हूँ … ” मैं झुक गई, मेरे चूतड़ की दोनों फ़ांके खुल गई। उसे गाण्ड का छेद नजर आने लगा। मुन्ना ने छेद पर लण्ड रख दबाया तो कभी वो नीचे फ़िसल जाये या ऊपर आ जाये। बस थोड़ा सी गाण्ड खुलती पर लण्ड अन्दर नहीं जा पा रहा था।

“मुन्ना तेल लगा कर अंगुली से छेद चौड़ा कर दे … ” मुन्ना ने ऐसा ही किया। तेल लगा कर अंगुली अन्दर घुसेड़ दी। मेरे मुख से मीठी सी आह निकल गई। वो खींच खींच कर अन्दर अंगुली घुमाने लगा, फिर उसने दो अंगुली डाल दी। मुझे इसमें बड़ा मजा आ रहा था। अचानक छेद में लण्ड घुसता सा महसूस हुआ। मैंने अपनी गाण्ड का छेद ढीला कर दिया। मोटा लण्ड था लगा गाण्ड चिर जायेगी। मुझे अब दर्द होने लगा था। शायद उसे भी लग रही थी। उसने बहुत जोर लगाया और लण्ड फिर तो घुसता चला गया। मेरी आंखें उबल पड़ी।

“बस कर मुन्ना … फ़ट ज़ायेगी मेरी … अभी इतना ही काफ़ी है … कल फिर कोशिश करेंगे।”

“हां मुझे भी लग रही है … ” उसने खींच कर अपना कड़क लण्ड बाहर निकाल लिया। मुझे भी चैन की सांस आई। पर दूसरे ही क्षण मेरी चूत पर आक्रमण हुआ और लण्ड मेरी चिकनी चूत में सट से पूरा घुस गया। लण्ड अब फ़्री स्टाईल में चोदने लगा। मैं घोड़ी बनी चुदती रही। मेरे मम्मों की शामत आई हुई थी। बेचारे बेरहमी से मसले जा रहे थे। इस स्टाईल में लण्ड पूरा अन्दर तक चोद रहा था। बहुत देर तक चुदने के कारण मैं चरमसीमा पर पहुंच गई थी। मुझे बस खल्लास होना था। मैं छटपटा उठी, मेरा पानी निकलने को हो रहा था …

मुन्ना बड़ी तेजी से लण्ड चला रहा था। मेरा पानी बस निकला ही चाहता था। मैंने जोर से तकिया भींच लिया और आह कर उठी। मैं झड़ने लगी। पर वो चोदता चला गया। मैं झड़ती रही … और मैंने मुन्ना को रोक दिया।

“दीदी मेरा तो हुआ ही नहीं … ”

“चल खड़ा हो जा … और लण्ड दे मुझे … मुठ मार कर तेरा माल निकाल देती हूँ।” उसे मैंने सामने खड़ा किया और लण्ड मुँह में लेकर नीचे से उसका लण्ड पकड़ कर मुठ मारने लगी। वो तड़प उठा और मेरे मुँह में एक तेज पिचकारी छोड़ दी। मैंने मुठ मारना नहीं छोड़ा। मुठ मारती गई जब तक कि उसके लण्ड में एक भी बूंद रही। सारा वीर्य मैंने पी लिया। अब वो सन्तुष्ट था। उसने एक पांव मेरी कमर में डाला और सुस्ताने लगा। मैं भी उससे लिपटी पड़ी रही। मुझे अब उसके खर्राटे की आवाज आने लगी। मुन्ना सो चुका था। मैं मुस्कराई और उसे प्यार से चूम लिया। उसे चादर ओढ़ा दी और मैं जाकर मुन्ना के बिस्तर पर सो गई। आज की तरकीब और हिम्मत ने काम बना दिया था और अब हम हमेशा ही मजे कर सकते थे। मैंने चादर मुँह तक ओढ़ ली और सपनों में खो गई।

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