किरण आंटी की गाण्ड मारी-1

(Kiran Aunti Ki Gand Mari-1)

Aunty xxx, मेरा नाम राजपाल है। उम्र २५ साल है। बात उस समय की है जब मैं १८ साल का था। मेरे पड़ोस में एक आंटी किरण अपनी बेटी नेहा और ससुर के साथ रहती थी। उनके पति का स्वर्गवास हो चुका था और सास भी नहीं थी। एक बेटा था जो विदेश में रहता था। परिवार धनी था। मेरा और उनका मकान सटा हुआ है और मेरे घर की छत से उनके आंगन में देखा जा सकता था।

एक दिन शाम के समय मैं छत पर घूम रहा था कि अचानक मेरी नजर उनके आंगन में पड़ी। मैंने देखा कि नेहा नाली के पास बैठकर पेशाब कर रही थी। उसकी चिकनी गाण्ड देखकर मेरा लण्ड खड़ा हो गया।

उसने लाल रंग की पैन्टी पहन रखी थी। उसके चूतड़ काफी बड़े थे। मैंने इससे पहले कभी इस तरफ ध्यान नहीं दिया था। वह उठी पैन्टी उपर चढ़ाई और अंदर चली गई। मैंने उस रात सपने में उसे चोदा और मेरा झड़ गया। सुबह मैं जल्दी उठा क्योंकि मुझे उठना पड़ा। नहाकर मैं कपड़े फैलाने छत पर गया तो मैं उसके आंगन में झांका, कोई नहीं था। मैं छत पर टहलने लगा। इस दौरान मैंने उसके आंगन में कई बार झांका। जब मैं वापस जाने लगा तो सोचा एक बार और देख लूँ शायद उसकी गाण्ड दिख जाए।

ज्योंही मैं वहाँ पहुँचा, मैंने इस बार आंटी को पेशाब करते पाया। वह बड़े इत्मिनान से अपनी मैक्सी उठाकर मूत रही थी। उसने काली पैन्टी पहन रखी थी। जब वह उठी तो उसने अपनी पैन्टी में से एक कपड़े का टुकड़ा निकाला और उसे पास रखे कूड़ेदान में डाल दिया। उनका मासिक चल रहा था। वह ज्योंही पीछे मुड़ी मैं तेजी से पीछे हटा पर शायद उसने मुझे देख लिया। मैं डर गया कि अब तो वह मेरी शिकायत मेरे घरवालों से जरुर करेगी। खैर कुछ दिनो तक मैं छत पर नहीं गया।

फिर एक दिन हिम्मत करके मैं छत पर गया। मैंने किरण आंटी को नेहा के साथ टहलते छत पर पाया। किरण आंटी ने मेरी ओर घूर कर देखा फिर दोनो रेलिंग से सट कर मेरी ओर पीठ कर खड़ी हो गई। नेहा जीन्स तथा किरण आंटी मैक्सी पहने हुई थी। वे रेलिंग पर झुककर बातें करने लगी। इस दौरान मैं उनकी गाण्ड निहारता रहा।

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मेरे घर पर कुछ कन्सट्रक्शन का काम चल रहा था। दूसरी मंजिल की छत बन रही थी। चूंकि हमारा हैण्डपंप काफी पुराना था इसलिए हमें किरण आंटी से पानी के लिए कहना पड़ा। खैर वह खुशी से तैयार हो गई। मैंने एक वाटर पंप उनके छत पर टंकी में लगा दिया। मुझे वहाँ करीब एक घण्टा रुकना पड़ता था। चूँकि जून का महीना था इसलिए गर्मी काफ़ी अधिक थी। खैर इस दौरान मैं सीढ़ियों पर बैठा रहता। कभी कभार वह मुझे चाय पानी पूछ लेती।

एक दिन मैं सीढ़ियो पर बैठा था कि आंटी मेरे पास आई और बोली- मैं नहाने जा रही हूँ कोई आये तो देख लेना।

मैंने कहा- ठीक है।

कुछ देर बाद उनका दूध वाला आ गया। मैंने कहा वो नहा रही हैं तुम इंतजार करो।

उसने कहा- आप ही ले लो ! किचन में कोई बर्तन पड़ा होगा।

मैंने सोचा- आंटी से एक बार पूछ लूँ।

मैं बाथरुम की ओर बढ़ा। ज्योंही दरवाजे पर पहुँचा तो देखा दरवाजा पूरी तरह बंद नहीं है। अंदर देखा तो आंटी फर्श पर बैठकर कपड़े साफ कर रही थी, वह पूरी तरह नंगी थी। उनकी गाण्ड मुझे दिखाई दे रही थी। जब वह कपड़ों पर ब्रश लगाने के लिए आगे झुकती तो उनकी गाण्ड ऊपर उठ जाती और छेद दिखाई दे जाता। मेरा लण्ड खड़ा हो गया। मैं पूरी तरह उत्तेजित था। मन कर था कि अंदर घुस जाऊँ और उनकी गाण्ड़ मारने लगूँ।

खैर मैं किचन में गया और एक बर्तन लाकर दूध ले लिया। तभी मेरे घर से पानी के लिए बुलावा आ गया। मैं पानी चलाकर लौटा तो आंटी नहाकर कपड़े फैलाने आ रही थी। मैं सीढ़ियों पर बैठ गया और जब वह सीढ़ियाँ उतरने लगी तो मैं उनकी गाण्ड निहारने लगा। कुछ देर बाद वह तमतमाते हुए आई और मुझसे पूछा- दूध तुमने लिया है?

मैंने कहा- हाँ !

किससे पूछकर?

किसी से नही। क्यो? मैंने कहा- दूधवाले को जल्दी थी तो उसने कहा कोई बर्तन लाकर मैं ही ले लूँ ! गाण्ड मराने जाना था क्या साले को ! वह बुदबुदाई।

इस पर मैं हँस दिया तो वह बोली- वो तेरा यार लगता था क्या? मुझसे नहीं पूछ सकता था?

आप नहा रही थी।

तो आकर दरवाजा तो खटखटाया होता?

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मैं गया था पर आपको उस हालत में देखकर लौट आया।

क्यों इससे पहले तो छत पर से छुप-छुप कर देखता था इस बार क्या हुआ?

मैं सकपका गया।

क्यों जानकर फट गई।

तेरी माँ से तेरी शिकायत करुंगी।

प्लीज आंटी ! ऐसा मत करना ! मैं गिड़गिड़ाया।

ना तुझे सबक सिखाना जरुरी हैं, वह बोली।

मैंने उनके पैर पकड़ लिए और गिड़गिड़ाने लगा- प्लीज आंटी ! इतनी छोटी गलती की इतनी बड़ी सजा मत दो।

सजा तो और भी बड़ी मिलेगी, जब मैं कालोनी के सब लोगों को बताउंगी कि इनका लड़का छत पर से मेरे आंगन में झांकता है और हमारी गाण्ड देखता है।

मेरी बुरी तरह फट गई। मैं थोड़ा और गिड़गिड़ाया।

तब उन्होने पूछा- अच्छा ये बता तू मेरी गाण्ड क्यो देखता है?

बस दो बार देखी है।

और मेरी बेटी की?

एक बार ! वह भी गलती से। देखकर क्या करता है?

मुठ मारता हूँ।

यह बता कि किसकी गाण्ड ज्यादा सेक्सी है?

आपकी !

क्यों?

क्योंकि आपकी ज्यादा चौड़ी और मांसल है और आपका छेद भी बड़ा लगता है अंकल ने काफ़ी मेहनत की थी।

वह थोड़ा मुस्कराई।

मैं समझ गया कि लोहा गर्म हो रहा है।

मैं फिर बोला- जब आप चलती हैं तो आपके दो नितम्ब बारी-बारी ऐसे ऊपर नीचे होते हैं मानो कयामत चल रही हो।

और उन्होने फिर पूछा- और? बस- मैं बोला।

फिर वह बोली- तू बैठ मैं चाय लाती हूँ।

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हमने सीढ़ियों पर बैठ कर चाय पी। इस दौरान वे काफ़ी खुल गई। उन्होने मेरी गर्ल-फ्रेन्ड के बारे में पूछा। उन्होने फिर पूछा कि मैंने किसी को चोदा है कि नहीं।

मैं बोला- नहीं ! अभी तक मौका नहीं मिला।

फिर वो बोली- मैं बर्तन रखकर अभी आई।

जब वह जा रही थी तो मैंने देखा कि उनकी मैक्सी उनकी गाण्ड के ठीक नीचे गीली हो गई थी। मैं समझ गया कि वह उत्तेजित है और उनकी बुर पानी छोड़ रही है। मैंने सोचा- साली बहुत अकड़ रही थी, मादरचोद को इतना उत्तेजित करता हूँ कि झड़ जाए।

वह आई और मेरे पास बैठ गई। मैंने कहा- एक बात पूछूं ? आंटी !

वह बोली- पूछ !

अंकल आपकी गाण्ड मारते थे न?

वह बोली- हाँ !

बहुत मजा आता है क्या मरवाने में?

कभी किसी की ले के देख !

एक बार ली है !

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किसकी?

जहॉ पहले दूध लेने जाता था, उस दूध वाले की एक लड़की थी, मुझसे दो साल छोटी रही होगी। मैं रोज उसके साथ खेलता था। बगल में एक नया मकान बन रहा था। हम रोज उसमें लुक्का-छिप्पी खेलते थे।

अच्छा तो तूने उसे बहलाकर अपना शिकार बनाया?

सुनिए तो आंटी ! एक दिन उसने मुझसे कहा कि उसे मुझे कुछ दिखाना है।

अच्छा ! तो साली ने तुझे अपना शिकार बनाया?

पूरी बात बात तो सुनिए ! वह मुझे एक कमरे में ले गई और कहा- ऊपर कुछ किताबें है, उन्हें उतारिए।

मैंने टाँड पर रखी दो-तीन किताबें उतारी। वे सब अश्लील साहित्य से संबंधित थी।

मैंने उससे पूछा- तुझे पढ़ना आता है?

वह बोली- नहीं !

फिर मैंने कहा- ये तेरे काम की नहीं हैं।

उसने वि किताबें मुझसे ले ली और उन्हें उलटने-पलटने लगी, फिर बोली- एक और होगी !

मैंने उछलकर देखा- वह सही थी।

मैंने उसे उतारा। वह अश्लील चित्रों की पुस्तक थी, उसमें संभोग की विभिन्न क्रियाएँ दर्शाई गई थी।

मैंने पूछा- ये कहाँ से मिली तुझे?

वह बोली- यही थी, कई दिनों से यहीं पड़ी हैं।

वह बोली- ये लोग क्या कर रहे हैं?

मैंने कहा- तू किसी से कहेगी तो नहीं?

वह बोली- नहीं कहूँगी।

मैंने कहा- ये लोग चुदाई-चुदाई खेल रहे है।

यह कौन सा खेल है?

यह बड़ों का खेल है, तू बड़ी हो जाएगी तो तू भी खेल सकेगी !

अभी नहीं खेल सकते- वह बोली।

उसके लिए तेरा पति चाहिए !

तू नहीं खेल सकता?

मैं?

मैं सकपकाया, फिर सोचा कि देखने में क्या जाता है !

फिर उसने अपनी चड्डी सरका दी। मैंने भी अपनी पैंट की जिप खोल कर लूली बाहर निकाली। फिर उसके पीछे चिपक गया। कुछ देर में मेरी लूली बढ़ने लगी और मैंने पहली बार अपनी लूली को लण्ड होते देखा।

मैंने उसकी गाण्ड पर अपना दबाव बढ़ा दिया। उसे भी अच्छा लगा तो उसने और जोर लगाने को कहा।

इधर मेरी बातें सुनकर आंटी की साँसें तेज हो गई। वह बार- बार फिर ! फिर ! कह रही थी।

कहानी जारी है अगले भाग में..

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