लंड के मजे के लिये बस का सफर-6

(Lund Ke Maje Ke Liye Bus Ka Safar- Part 6)

पल्लवी की चुदाई के बाद भूख लगने लगी थी इसलिये मैंने खाने का आर्डर दे दिया।

इधर पल्लवी पेट के बल लेटी हुयी थी, मैंने कैपरी पहनी और टी-शर्ट डाल ली और पलंग के पास आ गया। मेरी नजर पल्लवी के गोल-गोल उभारदार कूल्हों पर पड़ी और मैंने कस कर पल्लवी के कूल्हे को पकड़कर फैला दिया और लार को गांड की छेद में गिराने लगा.
झुकते हुए मैं अपनी जीभ गांड में लगाने वाला था कि पल्लवी ने ‘हूंह..’ करके मुझे झटक दिया। मैं भी बिना किसी प्रतिक्रिया के पल्लवी से अलग होकर पेट के बल लेट गया।

थोड़ी देर बाद मुझे अहसास हुआ कि पल्लवी मेरे ऊपर चढ़ी है और उसने मेरी कैपरी को सरका दिया है और मेरे चूतड़ों को कस कर दबा रही है और फैला रही है और अपनी लार से मेरी गांड को गीला कर रही है।
ओफ्फ… मैं क्या कहूँ! जैसे ही उसकी जीभ मेरे गांड पर चलने लगी, मुझे एक अलग तरह की फिलिंग आने लगी।
“वाऊ पल्लवी … तुमने तो कमाल कर दिया, इसी तरह चाटो।”

तभी चटाक की आवाज आयी, मैंने पलट कर देखा तो पल्लवी बोली- अब तुम मेरी गांड चाटो।
मैंने आश्चर्य से कहा- मैं तो चाटने ही जा रहा था लेकिन तुम्हीं ने तो मुझे रोक दिया था।
“हाँ, हर काम तुम ही पहले क्यों करोगे, कुछ मैं भी तो पहले करूँगी। चलो अच्छे से अपनी जीभ का जलवा दिखाओ. और हां अगर मुझे तुम्हारे लिये दर्द को बर्दाश्त करना पड़ेगा तो मैं बर्दाश्त कर लूंगी।”
“मतलब?”
“बुद्धू … मतलब तुम अपने मुस्टंडे लंड को मेरी गांड का मजा दे सकते हो।”
मैंने कस कर पल्लवी को चिपका लिया।

इससे पहले हम लोग अपने गांड चोदन कार्यक्रम को आगे बढ़ाते, कमरे की घंटी बजी. मैंने पल्लवी की तरफ देखते हुए कहा- चलो पहले खाने का मजा लेते हैं, फिर तुम्हारी गांड का मजा!
कहकर मैंने कैप्री को वापस चढ़ाया और इधर पल्लवी ने अपने को चादर से ढक लिया।

मैंने ऑर्डर को रिसीव किया और खाने के लिये पल्लवी को बुलाया. पर वो आ नहीं रही थी, उसके चेहरे की खुमारी यह बताने के लिये काफी थी कि उसे खाना खाने से ज्यादा इस समय लौड़े की जरूरत थी।
इसी बीच उसने मुझे इशारे से बुलाया और बोली खाना- बाद में … पहले!!
कहकर वो चुप हो गयी।

उसकी आँखें लाल थी, होंठ उसके सूख रहे थे, चेहरे पर उसके बाल बिखर चुके थे।
मैंने उसके बालों पर हाथ फिराते हुए कहा- डार्लिंग पहले कुछ खा लिया जाये, फिर तो पूरी रात पड़ी है।
उसने मेरा हाथ पकड़ा और उठ कर बैठ गयी, कहने लगी- जान! खाना खाने के बाद मुझे गांड चटाई मैं मजा नहीं आयेगा, बड़ा अजीब सा लगेगा.
और फिर आंख मारते हुए बोली- चाहो तो रीतिका की एक बार और ले लेना।

भले ही उसने यह बात मजाक में बोली थी, पर मेरे मन को छू लेने वाली बोली थी।

खैर, मैंने पल्लवी का हाथ अपने हाथ में हौले से लिया और उसे बेड से उतरने का इशारा किया। पल्लवी मेरे पास आकर खड़ी हो गयी। मैं पल्लवी के पीछे हो गया और उसके पेट को सहलाते हुए बोला- जो कह रही हो, उसमें शर्माओगी तो नहीं?
“नहीं!”
मैं उसकी इस बात को सुनकर चुप हो गया और उसके पेट, चूचियों को सहलाते हुए उसकी गर्दन को चूमने लगा।

“एक बार फिर सोच लो!” थोड़ी देर के बाद मैंने फिर बोला।
बदले में वो मेरे लंड को पकड़कर अपनी गांड पर घिसते हुए बोली- तुम्हारे लिये और तुम्हारे साथ ही आई हूं. और उसके बाद भी मेरी जान मुझसे संतुष्ट न रहे तो फिर मेरा जीवन ही नीरस हो गया ना। तुम कुछ भी करोगे मैं मना नहीं करूँगी, अगर मना किया तो तुम रीतिका को जाकर चोद लेना।
मैं उसके चूचों को दबाते हुए बोला- तुम्हारा मन है या मेरे मन को रखने के लिये बोल रही हो?
“नहीं … पार्टनर के साथ मजा लेने के लिये बोल रही हूं।”

अब मेरी उंगली पल्लवी की नाभि के अन्दर चल रही थी और उसकी मुट्ठी में मेरा लंड कैद था, वो उसको पकड़ कर अपनी गांड में घिस रही थी। मेरा हाथ नाभि से नीचे की ओर फिसलता हुआ उसकी चूत की तरफ बढ़ने लगा और उसको मसलने लगा, साथ ही साथ पुतिया को भी मसलने लगा। मैं अपनी उंगली को उसकी चूत के अन्दर-बाहर करने लगा।

पल्लवी अब अपने चरम पर पहुंच गयी थी, उसकी चूत ने पानी छोड़ना शुरू कर दिया था और मेरा हाथ गीला होने लगा था। मैं तुरन्त पल्लवी के सामने आया और घुटनों के बल बैठ गया और उसकी उस चिकनी और गीली चूत पर अपने होंठ रख दिये.

बस मेरा इतना करना ही था कि पल्लवी कांपने लगी। उसने मेरे सिर को इस तरह से भींच लिया कि मेरी नाक उसकी बुर के फांकों के बीच धंसने लगी। इधर मैं भी अपने दोनों हाथ को उठाकर उसके निप्पल मसलने लगा।
हम दोनों अभी इसी क्रिया में खोये हुए थे कि फोन की घंटी बजी।

ट्रू कॉलर में रीतिका का नाम आ रहा था, मैंने फोन को स्पीकर में लिया तो रीतिका की आवाज आई- सक्सेना जी, क्या कर रहे हो?
मैंने कहा- बस खाना खाने की तैयारी कर रहा था और फिलहाल मैं इस समय चटनी चाट रहा हूं।
“अगर आप और पल्लवी जी को ऐतराज न हो तो क्या मैं भी आप लोगों के साथ ज्वाईन कर सकती हूं? भूख भी लग रही है और अकेले खाने का मन भी नहीं हो रहा है।”

मैंने पल्लवी की तरफ देखा तो वो कुछ देर सोचकर फिर फोन को हाथ में लेकर बोली- नहीं रीतिका जी, ऐसी कोई बात नहीं है, आप आ जाइये और हम लोगों को ज्वाईन कर लीजिए।
पल्लवी की बात सुनकर वो चहकते हुए बोली- थैक्स पल्लवी, मैं दो मिनट में आ रही हूं, प्लीज डोर ओपन कीजिए।

इससे पहले मैं या पल्लवी कुछ पहनते, दरवाजा खटखटाने की आवाज आने के साथ साथ दबी आवाज में रीतिका की आवाज आई- प्लीज ओपन द डोर!
मैंने पल्लवी की तरफ देखा, उतनी ही देर में दरवाजा दो-तीन बार खटका दिया गया। मैंने बिना कुछ सोचे समझे दरवाजा खोलकर रीतिका को अन्दर बुला लिया. इतनी देर में पल्लवी बाथरूम में घुस चुकी थी।

रीतिका अन्दर आते ही चारों तरफ देखते हुए मुस्कुराकर बोली- आप तो बोल रहे थे कि खाना खाने की तैयारी कर रहे हैं और फिलहाल आप चटनी चाट रहे है। पर नंगे होकर कौन सी चटनी चाट रहे हैं?
मैं बाथरूम की तरफ गया, पल्लवी का हाथ पकड़ कर बाहर लाया और रीतिका के सामने ही एक बार फिर घुटनों के बल बैठते हुए पल्लवी की चूत फांकों को फैलाकर बोला- मैं यह चटनी चाट रहा था लेकिन तुम्हारा फोन आने से मैं इसे चाटने से रह गया।

तभी रीतिका ने भी अपना पारदर्शी गाउन उतार दिया, जिसके नीचे उसने कुछ भी नहीं पहना हुआ था और पल्लवी के बगल में खड़ी होते हुए वो बोली- थोड़ी चटनी इस कटोरी की भी चाट लो।
मैं पल्लवी की फांकों के बीच अपनी जीभ फिराने लगा और उसके रस का मजा चाट कर लेने लगा.

इधर रीतिका ने अपनी चूत की फांकों को खुद ही फैला लिया और अपनी बुर को मेरी तरफ खोल कर खड़ी हो गयी। मैं बारी बारी से दोनों लड़कियों की चूत को चाट रहा था। उनकी चूतों को अच्छे से गीला करने के बाद दोनों को सोफे पर घूम कर उनकी गांड को फैलाने के लिये कहा।

रीतिका तो पहले से खेली खाई थी तो वो मेरी बात को समझ गयी और उसने पल्लवी को भी खड़े होने की पोजिशन बता दी। अब दोनों ने अपनी-अपनी गांड फैला ली और मैं बारी-बारी से दोनों की गांड को गीला करने लगा।
चूंकि रीतिका की गांड मैं कुछ देर पहले से चोद कर आया था तो मैंने पहले रीतिका की गांड के अन्दर लंड पेल दिया और धक्के लगाने लगा। मेरे धक्के लगाने की आवाज और रीतिका की आवाज से पल्लवी का ध्यान मेरी तरफ गया, वो मुझे रीतिका की गांड की चुदाई करते हुए देख रही थी और गुस्से में मानो कह रही थी कि मेरा ऑफर उसको क्यों दिया.

मैंने उसे इशारे से शांत रहने को कहा और रीतिका की गांड से लंड बाहर करते हुए रीतिका से बोला- पल्लवी को भी गांड चुदाई का मजा चाहिये, तुम उसकी इसमे मदद करो।
रीतिका ने अपनी उंगलियों पर ढेर सारा थूक लिया, पल्लवी की गांड को गीला करने लगी और अपनी उंगली उसकी गांड के अन्दर डालने लगी, पर उंगली अन्दर जा नहीं रही थी।

थोड़ी देर तक मैं देखता रहा, रीतिका पल्लवी की गांड चाट कर भी गीला करने की कोशिश कर रही थी। इसी बीच मैं एक बात नोटिस कर रहा था, जब भी रीतिका अपनी उंगली अन्दर डालने की कोशिश करती, पल्लवी चिहुंक जाती और उसके चेहरे पर एक दर्द सा उभरने लगता।
मुझे यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा, मैंने रीतिका को फिर से अपनी पोजिशन लेने को कहा और खुद पल्लवी के पीछे आ गया, लंड को उसकी गांड में सहलाते हुए उसकी चूत के अन्दर पेल दिया और धक्के मारने लगा।

पल्लवी ‘उम्म्ह… अहह… हय… याह…’ करने लगी।

अब मैं बारी-बारी से कभी रीतिका की चूत और गांड चोदता तो कभी पल्लवी की चूत को अपने लंड का मजा देता। कमरे मैं ‘आह ओह…’ की आवाज हो रही थी। पल्लवी केवल आह-ओह ही कर रही थी जबकि रीतिका ‘और तेज मादरचोद … और तेज हरामी … अपनी कुतिया को और मजा दो!’ आदि शब्द का यूज कर रही थी।

थोड़ी ही देर मैं हम तीनों ही बारी बारी से खलास हो गये। मैंने अपना वीर्य पल्लवी को बिना बताये उसकी चूत में गिरा दिया। रीतिका ने देखा तो बोली- यार मजा खराब कर दिया, मैं तुम्हारा पानी पीना चाहती थी।
फिर खुद ही अपने गाउन से बारी-बारी मेरे लंड को, अपनी चूत और गांड को और पल्लवी की चूत को साफ करते हुए बोली- चलो कोई बात नहीं, मैं इसी से काम चला लूंगी।

फिर मेरे कहने हम तीनों ने साथ ही साथ शॉवर लिया और फिर नंगे ही बैठे हुए हम लोगों ने खाना खाया। इस बीच हमारे बीच किसी तरह की बात नहीं हुई.
खाने के बाद रीतिका वही गाउन पहन कर अपने कमरे में चली गयी.

इधर मैं और पल्लवी बिस्तर पर आ गये। थोड़ी देर तक वो मुझसे चिपकी रही और फिर पलट गयी। मैंने भी बिना किसी देरी के उसकी पीठ को अपने सीने से चिपकाते हुए अपनी टांग को उसकी कमर के ऊपर रख दिया।
कुछ देर बाद पल्लवी मुझसे अलग हुई और मेरे ऊपर बैठते हुए बोली- तुमको मेरी गांड मारनी थी लेकिन नहीं मारी?
मैं उसके बालों की लटों को अपनी उंगलियों के बीच फंसाते हुए बोला- जान, मुझे तुमसे प्यार हो गया है, इसलिये नहीं मारी।
“हम्म! प्यार हो गया है कि उसकी गांड में ज्यादा मजा था?

मैंने उसके गाल पर हल्की सी चपत मारी और बोला- जान, तुम्हारी चूत में ज्यादा मजा था! न तो उसकी गांड में मजा था और न ही चूत में! बस मैं अपनी जान के खूबसूरत फूल से चेहरे पर दर्द नहीं देख सकता था, इसलिये गांड मारने का इरादा त्याग दिया।
मेरी बात सुनकर वो बोली- तुम बहुत कमीने हो!
इतना कहकर पल्लवी ने मेरे गालों को काट लिया और मेरे ही ऊपर लेट गयी।

नींद का मुझे भी पता नहीं चला। पर कोई रात के तीन या चार बजे के आस-पास की बात होगी क्योंकि इसी समय के आस-पास मेरी नींद टूटने लगती है, तो मेरी नींद कच्ची होने लगी और मुझे अहसास होने लगा कि मेरे लंड की चुसाई हो रही है.

मैंने हौले से अपनी आँखें खोली तो देखा कि घने बालों के बीच पल्लवी का चेहरा मेरे लंड की तरफ झुका हुआ है और वो मेरे लंड की चुसाई कर रही है।
मैंने अपनी आँखें वापिस बन्द कर ली और पल्लवी जो मुझे मजा दे रही थी, उसका मैं आनन्द उठाने लगा।

थोड़ी देर चूसने के बाद पल्लवी ने मेरे लंड को पकड़ा और अपने चूत से सेट करते हुए धीरे-धीरे लंड को अन्दर लेने लगी। अब उसकी उंगलियों के बीच मेरे दोनों निप्पल थे. जिस स्पीड में वो मुझे चोदती, उसी स्पीड में वो मेरे निप्पल को नोचती. अब उसकी स्पीड बढ़ती जा रही थी और मेरे निप्पल को नोचना भी बढ़ता जा रहा था.

इसी दर्द के वजह से मैं जाग गया था लेकिन पल्लवी अपनी आँखें बन्द किये हुये मुझे लगातार चोदे जा रही थी। अब उसके इस तरह नोचने से मीठे दर्द के जगह दर्द ने ले ली और जिसको अब बर्दाश्त करना मुश्किल लग रहा था.
पहले तो मैं दाँत भींचकर दर्द को काबू में कर रहा था लेकिन जब बर्दाश्त के बाहर हो गया तो मैंने पल्लवी के दोनों हाथों को पकड़ लिया. जिस चरम को पाने के लिये उसने आँखें बन्द की हुई थी, मेरे हाथ लगाने भर से वो उसकी आँखें खुल गयी.

लेकिन तब तक मेरा भी माल निकल कर उसकी चूत के अन्दर की दीवारों से टकराने लगा था और उसने भी चरम सुख की प्राप्ति कर ली थी।
10-12 बार और उछलने कूदने के बाद पल्लवी शांत हो गयी और एक बार फिर मेरे से चिपक गयी।

थोड़ी देर बाद जब उसने अपनी सांसों को काबू में कर लिया तो मुझसे अलग होकर बगल में लेट गयी। अब मेरी आँखों से नींद ओझल हो चुकी थी लेकिन पल्लवी ने एक बार फिर अपना सिर एक तरफ लुढका दिया और गहरी नींद में चली गयी।
अब मैं अकेला क्या झक मारता, मैंने भी अपनी आँखें बन्द की और सोने का प्रयास करने लगा।

लगभग नौ बजे नींद खुली। हम दोनों जल्दी-जल्दी तैयार होकर ऑफिस में पहुँचे. वहीं पर रीतिका से भी मुलाकात हुयी, जब हम तीनों की नजर एक दूसरे से मिली तो एक मुस्कुराहट के साथ सभी ने एक दूसरे का स्वागत किया.

उसके बाद मीटिंग चालू हुयी जो चलती रही।
जब जैसे जिसकी ट्रेन की टाईमिंग थी, वैसे वैसे उसका छोड़ा जा रहा था, हमारी बारी आने पर हमें भी फ्री कर दिया गया और हमने वापसी के सफर के लिये ऑफिस छोड़ दिया।

तो दोस्तो, मेरी कहानी कैसी लगी?
आप सभी के मेल के इंतजार में आपका अपना शरद सक्सेना।

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