मेरी अधूरी जवानी की बेदर्द चुदाई-2

हाफ गर्लफ्रेंड मेरे पति मुझे सेक्स के लिए तैयार करते नहीं थे, सीधे
ही चोदने लग जाते थे और मुझे कुछ आनन्द आने लगता तब तक वो ढेर हो जाते।
रात में सेक्स 5-7 बार करते, पर वही बात रहती।
फिर मैंने उनको समझाया- कुछ मेरा भी ख्याल करो, मेरे स्तन दबाओ, कुछ हाथ फिराओ !
अब तक मैंने कभी उनके लण्ड को कभी हाथ भी नहीं लगाया था, अब मैंने भी
उनके लण्ड को हाथ में पकड़ा तो वो फुफकार उठा। उन्होंने मेरे स्तन दबाये
पेट और जांघों पर चुम्बन दिए, चूत के तो नजदीक भी नहीं गए।
मैंने भी मेरी जिंदगी में कभी लण्ड के मुँह नहीं लगाया था, मुझे सोच के
ही उबकाई आती थी, अबकी बार उन्होंने चोदने का आसन बदला, अब तक तो वो
सीधे-सीधे ही चोदते थे, इस बार उन्होंने मेरी टांगें अपने कंधे पर रखी और
लण्ड घुसा दिया और हचक-हचक कर चोदने लगे।
मेरी टांगें मेरे सर के ऊपर थी, मैं बिल्कुल दोहरी हो गई थी पर चमत्कार
हो गया, मुझे आनन्द आ रहा था, उनका सुपारा सीधे मेरी बच्चेदानी पर ठोकर
लगा रहा था, मुझे लग रही थी पर आनन्द बहुत आया।

इस बार जब उन्होंने अपने माल को मेरी चूत में भरा तो मैं संतुष्ट थी। फिर
मैंने अपनी टांगें ऊपर करके ही चुदाया, मुझे मेरे आनन्द का पता चल चुका
था। फिर मेरे गर्भ ठहर गया, सितम्बर, 2000 में मेरे बेटा हो गया।
बेटा होने के बाद कुछ विशेष नहीं हुआ ! मैं प्राइवेट पढ़ती रही, मेरे पति
साल में एक बार आते तब मैं ससुराल चली जाती और मेरे पति महीने डेढ़ महीने
तक रहते, मैं उनके साथ रहती और जब वे वापिस चेन्नई जाते तो मैं अपने पीहर
आ जाती। इसका कारण था कई लोंगो की मेरे ऊपर पड़ती गन्दी नज़र !
मेरे ससुराल में खेती थी, जब फसल आती तो वे मुझे मेरा हिस्सा देने के लिए
बुलाते थे। लेकिन ज्यादातर मैं शाम को मेरे पीहर आ जाती थी।
एक बार मुझे रात को रुकना पड़ा, मैं मेरे घर पर अकेली थी, मेरे जेठों के
घर आस पास ही थे, मेरी जिठानी ने कहा- तू अकेली कैसे सोएगी? डर जाएगी तू
! मेरे बेटे को अपने घर ले जा !

मेरे जेठ का बेटा करीब 18-19 साल का था, मैं 27 की थी, मैंने सोचा बच्चा
है, इसको साथ ले जाती हूँ !
खाना खाकर हम लेट गए, बिस्तर नीचे ही पास-पास लगाए हुए थे, थोड़ी देर
बातें करने के बाद मुझे नींद आ गई !
आधी रात को अचानक मेरी नींद खुल गई, मेरे जेठ का बेटा मेरे पास सरक आया
था और एक हाथ से मेरा एक वक्ष भींच रहा था और दूसरे वक्ष को अपने मुँह
में ले रहा था, हालाँकि ब्लाउज मैंने पहना हुआ था।
मेरे गुस्से का पार नहीं रहा, मैं एक झटके में खड़ी हो गई, लाइट जलाई और
उसे झंजोड़ कर उठा दिया !
मेरे गुस्से की वजह से मुंह से झाग निकल रहे थे, वो आँखें मलता हुआ पूछने
लगा- क्या हुआ काकी?
मुझे और गुस्सा आया मैंने कहा- अभी तू क्या कर रहा था?
पठ्ठा बिल्कुल मुकर गया और कहा- मैं तो कुछ नहीं कर रहा था।
मैंने उसको कहा- अपने घर जा !
वो बोला- इतनी रात को?
मैंने कहा- हाँ !

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उसका घर सामने ही था, वो तमक कर चला गया और मैं दरवाजा बंद करके सो गई।
सुबह मैंने अपनी जेठानी उसकी माँ को कहा तो वो हंस कर बात को टालने लगी,
कहा- इसकी आदत है ! मेरे साथ सोता है तो भी नींद में मेरे स्तन पीता है।
मैंने कहा- अपने पिलाओ ! आइन्दा मेरे घर सुलाने की जरुरत नहीं है !
मुझे उसके कुटिल इरादों की कुछ जानकारी मिल गई थी। हाफ गर्लफ्रेंड उसकी माँ चालू थी,
गाँव वालों ने उसे मुझे पटाने के लिए लालच दिया था इसलिए वो अपने बेटे के
जरिए मेरी टोह ले रही थी। उसे पता था उसके देवर को गए दस महीने हो गए थे,
शायद यह पिंघल जाये पर मैं बहुत मजबूत थी अपनी इज्जत के मामले में !
इससे पहले कईयों ने मुझ पर डोरे डाले थे, मेरे घर के पास मंदिर था, उसमें
आने का बहाना लेकर मुझे ताकते रहते थे। उनमें एक गाँव के धन्ना सेठ का
लड़का भी था जिसने कहीं से मेरे मोबाइल नंबर प्राप्त कर लिए और मुझे बार
बार फोन करता। पहले मिस कॉल करता, फिर फोन लगा कर बोलता नहीं ! मैं इधर
से गालियाँ निकलती रहती।

फिर एक दिन हिम्मत कर उसने अपना परिचय दे दिया और कहा- मैं तुमको बहुत
चाहता हूँ इसलिए बार बार मंदिर आता हूँ।
मैंने कहा- तुम्हारे बीवी, बच्चे हैं, शर्म नहीं आती !
फिर भी नहीं माना तो मैंने उसको कहा- शाम को मंदिर में आरती के समय
लाऊडस्पीकर पर यह बात कह दो तो सोचूँगी।
तो उस समय तो हाँ कर दी फिर शाम को उसकी फट गई। फिर उसने कहा- मुझे आपकी
आवाज बहुत पसंद है, आप सिर्फ फोन पर बात कर लिया करें। मैं कुछ गलत नहीं
बोलूँगा। मैंने कहा- ठीक है ! जिस दिन गलत बोला, बातचीत कट ! और मेरा मूड
होगा या समय होगा तो बात करुँगी।
यह सुनते ही वो मुझे धन्यवाद देने लगा और रोने लगा और कहने लगा- चलो मेरे
लिए इतना ही बहुत है ! कम से कम आपकी आवाज तो सुनने को मिलेगी !
मैं बोर होने लगी और फोन काट दिया। उसके बाद वो दो चार दिनों के बाद फोन
करता, मेरा मूड होता तो बात करती वर्ना नहीं ! वो भी कोई गलत बात नहीं
करता, मेरी तारीफ
करता। इससे मुझे कोई परेशानी नहीं थी।

मेरा पति चेन्नई से नौकरी छोड़ कर आ गया था। मेरा बी.ए. हो चुका था, मैंने
गाँव में स्कूल ज्वाइन कर लिया, टीचर बन गई वहाँ भी और टीचर मुझ पर लाईन
मारते, पर मैंने किसी को घास नहीं डाली।
फिर मेरे पति को वापिस चेन्नई बुला लिया तो चले गए तो मैंने भी स्कूल छोड़
दिया और पीहर आ गई !
जब भी मेरे बड़े जीजाजी अजमेर आते तो मुझसे हंसी मजाक करते थे, मैं मासूम
थी, सोचती थी कि मैं छोटी हूँ इसलिए मेरा लाड करते हैं। वे कभी यहाँ-वहाँ
हाथ भी रख देते थे तो मैं ध्यान नहीं देती थी। कभी वो मुझे अपनी बाँहों
में उठा कर कर मुझे कहते थे- अब तुम्हारा वजन बढ़ गया है !
मेरे जीजाजी करीब 46-47 साल के हैं 5’10” उनकी लम्बाई है, अच्छी बॉडी है,
बाल उनके कुछ उड़ गए हैं फिर भी अच्छे लगते हैं। पर मैंने कभी उनको उस नजर
से नहीं देखा था मैंने उनको सिर्फ दोस्त और बड़ा बुजुर्ग ही समझा था।
इस बीच में कई बार मैं अपनी दीदी के गाँव गई। वहाँ जीजा जी मुझसे मजाक
करते रहते, दीदी बड़ा ध्यान रखती, मुझे कुछ गलत लगता था नहीं।
फिर हाफ गर्लफ्रेंड एक बार जीजा जी मेरे पीहर में आये, दीदी नहीं आई थी।
वे रात को कमरे में लेटे थे, टीवी देख रहे थे। मेरे पापा मम्मी दूसरे
कमरे में सोने चले गए। मेरी मम्मी ने आवाज दी- आ जा ! सो जा !
मेरा मनपसंद कार्यक्रम आ रहा था तो मैंने कहा- आप सो जाओ, मैं बाद में आती हूँ।
जीजा जी चारपाई पर सो रहे थे, उसी चारपाई पर बैठ कर मैं टीवी देख रही थी।
थोड़ी देर में जीजाजी बोले- बैठे-बैठे थक जाओगी, ले कर देख लो।

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मैंने कहा- नहीं !
उन्होंने दोबारा कहा तो मैंने कहा- मुझे देखने दोगे या नहीं? नहीं तो मैं
चली जाऊँगी। थोड़ी देर तो वो लेटे रहे, फ़िर वे मेरे कंधे पकड़ कर मुझे अपने
साथ लिटाने की कोशिश करने लगे।

मैंने उनके हाथ झटके और खड़ी हो गई। वो डर गए। मैंने टीवी बंद किया और
माँ के पास जाकर सो गई।
सुबह चाय देने गई तो वो नज़रें चुरा रहे थे। मैंने भी मजाक समझा और इस बात
को भूल गई। फिर जिंदगी पहले जैसी हो गई। फिर मैं वापिस गाँव गई, मेरे पति
आये हुए थे।
अब स्कूल में तो जगह खाली नहीं थी पर मैं एम ए कर रही थी और गाँव में
मेरे जितना पढ़ा-लिखा कोई और नहीं था, सरपंच जी ने मुझे आँगन बाड़ी में लगा
दिया, साथ ही अस्पताल में आशा सहयोगिनी का काम भी दे दिया।
फिर एक बार तहसील मुख्यालय पर हमारे प्रशिक्षण में एक अधिकारी आये,
उन्होंने मुझे शाम को मंदिर में देखा था, और मुझ पर फ़िदा हो गए।
मैंने उनको नहीं देखा !
फिर उनका एक दिन फोन आया, मैंने पूछा- कौन हो तुम?
उन्होंने कहा- मैं उपखंड अधिकारी हूँ, आपके प्रशिक्षण में आया था !

मैंने कहा- मेरा नंबर कहाँ से मिला?
उन्होंने कहा- रजिस्टर में नाम और नंबर दोनों मिल गए !
मैंने पूछा- काम बोलो !
उन्होंने कहा- ऐसे ही याद आ गई !
मैंने सोचा कैसा बेवकूक है !
खैर फिर कभी कभी उनका फोन आता रहता ! फिर मेरा बी.एड. में नंबर आ गया और
मैंने वो नौकरी भी छोड़ दी। फिर उनका तबादला भी हो गया, कभी कभी फोन आता
लेकिन कभी गलत बात उन्होंने नहीं की।
एक बार बी.एड. करते मैं कॉलेज की तरफ से घूमने अभ्यारण गई तब उनका फोन
आया। मैंने कहा- भरतपुर घूमने आए हैं।
तो वो बड़े खुश हुए, उन्होंने कहा- मैं अभी भरतपुर में ही एस डी एम लगा
हुआ हूँ, मैं अभी तुमसे मिलने आ सकता हूँ क्या?
मैंने मना कर दिया, मेरे साथ काफी लड़कियाँ और टीचर थी, मैं किसी को बातें
बनाने का अवसर नहीं देना चाहती थी और वो मन मसोस कर रह गए !
फिर काफ़ी समय बाद उनका फोन आया और उन्होंने कहा- आप जयपुर आ जाओ, मैं
यहाँ उपनिदेशक लगा हुआ हूँ, यहाँ एन जी ओ की तरफ से सविंदा पर लगा देता
हूँ, दस हज़ार रुपए महीना है।
मैंने मना कर दिया। वे बार बार कहते कि एक बार आकर देख लो, तुम्हें कुछ
नहीं करना है, कभी कभी ऑफिस में आना है।

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मैंने कहा- सोचूँगी !
फिर बार बार कहने पर मैंने अपनी डिग्रियों की नकल डाक से भेज दी।
फिर उनका फोन आया- आज कलेक्टर के पास इंटरव्यू है !
मैं नहीं गई।
उन्होंने कहा- मैंने तुम्हारी जगह एक टीचर को भेज दिया है, तुम्हारा नाम
फ़ाइनल हो गया है, किसी को लेकर आ जाओ।
मैं मेरे पति को लेकर जयपुर गई उनके ऑफिस में ! वो बहुत खुश हुए, हमारे
रहने का इंतजाम एक होटल में किया, शाम का खाना हमारे साथ खाया।
मेरे पति ने कहा- तुम यह नौकरी कर लो !
दो दिन बाद हम वापिस आ गए। साहब ने कहा था कि अपने बिस्तर वगैरह ले आना,
तब तक मैं तुम्हारे लिए किराये का कमरे का इंतजाम कर लूँगा।
10-12 दिनों के बाद मेरे पति चेन्नई चले गए और मैं अपने पापा के साथ
जयपुर आ गई। साहब से मिलकर में पापा ने भी नौकरी करने की सहमति दे दी।
मैं मेरे किराये के कमरे में रही, एक रिटायर आदमी के घर के अन्दर था कमरा
जिसमें वो, उसके दो बेटे-बहुएँ, पोते-पोतियों के साथ रहता था। मकान में 5
कमरे थे जिसमें एक मुझे दे दिया गया। बुजुर्ग व्यक्ति बिल्कुल मेरे पापा
की तरह मेरा ध्यान रखते थे।
मैं वहाँ नौकरी करने लगी। कभी-कभी ऑफिस जाना और कमरे पर आराम करना, गाँव
जाना तो दस दस दिन वापिस ना आना !
साहब ने कह दिया कि तनख्वाह बनने में समय लगेगा, पैसे चाहो तो उस एन जी ओ
से ले लेना, मेरे दिए हुए हैं।
मैंने 2-3 बार उससे 3-3 हजार रूपये लिए। साहब सिर्फ फोन से ही बात करते,
मीटिंग में कभी सामने आते तो मेरी तरफ देखते ही नहीं। फिर मेरा डर दूर हो
गया कि साहब कुछ गड़बड़ करेंगे। वो बहुत डरपोक आदमी थे, वो शायद सोचते कि
मैं पहल करुँगी और मेरे बारे में तो आप जानते ही हैं !
फिर मैंने कई बार जीजा जी से बात की, उन्हें उलाहना दिया कि मैं यहाँ
नौकरी कर रही हूँ और आप आकर एक बार भी मिले ही नहीं।

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