शब्बो भाभी चुसवा आई किशमिश 1

Shabbo bhabhi chuswa aai kishmish-1

दोपहर हो चली थी, शब्बो ने खेत में काम करने गए अपने देवर सलीम के लिए खाना बांधा ओर अपनी बेटी कहकशाँ को आवाज़ दी

शब्बो- बेटी कहकशाँ, जा तू खेत में अपने चाचू को खाना दे आ!

कहकशाँ- नहीं जाऊँगी… मुझे अभी हुसैना के घर जाना है।

बाहर शब्बो का शराबी और जाहिल शौहर आलम मियाँ अभी तक चारपाई पे बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था।

शब्बो ने सोचा कि वो उसे ही कह देगी भाई का खाना देकर आने को!

शब्बो खाना बांध कर बाहर लाई और अपने मिंया से बोली- जाओ सलीम को खाना दे आओ!

यह सुनते ही आलम-मियाँ भड़क गए- साली, माँ की लौड़ी, मुझे बोल रही है? तेरे बाप का नौकर हूँ मादरचोदी?

शब्बो कुछ नहीं बोली, वह जानती थी कि इस हरामी पिल्ले को बोलने का कोई फायदा नहीं, यह ना काम का, ना ठुकाई का, बस दुश्मन रोज ढाई सेर अनाज का।

वह खुद ही बुरका पहन खाना लेकर खेतों की ओर चली।

उनके खेतों में सलीम मजदूरों के साथ काम कर रहा था, माथे से बहता पसीना और उसका गठीला बदन जो मेहनत करते करते लोहे सा मजबूत हो गया था।

शब्बो ने खाना खेतों के बीच बने एक छोटी कोठरिया में रख दिया और बाहर काम कर रहे एक मजदूर को बोली- सलीम को बोल कि खाना खा लेगा।

मजूदर ने जाकर सलीम को बोला कि आपकी भाभीजान आपको खाने के लिए बुला रही हैं।

सलीम वहीं काम छोड़ कर चल पड़ा।

कोठरी में पहुँच कर उसने सब मजदूरो को कहा- जाओ, तुम भी खा पी लो!

यह सुन कर सब लोग वहाँ से चले गए, सलीम उस कोठरी के अंदर गया और दरवाजा अंदर से बन्द कर लिया।

शब्बो ने उसे एक तौलिया दिया, सलीम ने अपने माथे का पसीना पोंछा लेकिन उसकी नज़र बिना झुके ही शब्बो से मिल रही थी बल्कि शब्बो अपनी नज़र बार बार चुरा रही थी।

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सलीम ने तौलिया नीचे रखा और दरवाज़ा बंद कर लिया, जाकर चारपाई पर बैठ गया।

सलीम ने एक मिनट के लिए भी अपनी नज़र अपनी शब्बो भाभी जान के बदन से नहीं हटाई।

शब्बो ने पास रखा खाना सलीम की तरफ बढ़ा दिया तो सलीम ने शब्बो का हाथ पकड़ा और उसे खींच कर अपनी गोद में बैठा लिया।

शब्बो- मत कर जाने दे मुझे !

सलीम- अभी नहीं पहले मुझे प्यार करने दो भाभीजान !

शब्बो- देख कोई आ जायेगा…

सलीम- नहीं आएगा, मैं हूँ न, यहाँ मेरी इजाज़त के बिना कोई नहीं आता।

यह यह बोलते ही सलीम ने शब्बो के बोबे, जांघ ओर पीठ पर हाथ फिरने लगा।

शब्बो- रात को करेंगे, अब जाने दे मुझे!

सलीम- भाभीजान, बस एक बार करने दो, फिर चली जाना। मुझसे रात तक सब्र नहीं हो पाएगा !

सलीम ने शब्बो को अपने ऊपर से हटा के साथ में लिटा दिया और झट से खड़ा हुआ, अपनी लुंगी खोली, चड्डी नीचे की और लण्ड को हाथ में पकड़ दो तीन झटके दिए।

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शब्बो उसे ऐसा करते ही देख रही थी कि सलीम चारपाई पर आ गया और अपना लण्ड सीधा शब्बो के होंठों पर रख दिया।

लौड़ा भी बड़ी तेज़ी से खड़ा होकर अपनी औकात पर आ गया। लेकिन शब्बो ने अपना चेहरा एक तरफ कर लिया।

लगभग एक हफ्ते पहले की ही बात है, रात को जब अपने निकम्मे शौहर को छोड़ शब्बो अपनी मर्जी से अपने देवर सलीम के कमरे में आई थी और उसको अपना शौहर बना लिया था।

लेकिन इन औरतों का मूड भी शेयर-मार्किट जैसा होता है, ना जाने कब खुद-ब-खुद चुदवाने आ जाए, ना जाने कब मना कर दे!

सलीम वापस खटिया पर बैठ गया और एक हाथ से भाभी के बूबे दबाने लगा और दूसरे हाथ से उसकी पीठ सहलाने लगा।

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अपना सर उसने भाभी के कंधे पर रखा और उसकी गर्दन को सूंघने और चुम्मियाँ लेने लगा लेकिन अभी अभी शब्बो कुछ खास जवाब दे नहीं रही थी।

सलीम ने अपना हाथ थोड़ा और नीचे किया और भाभी की जांघों को सहलाने लगा।

धीरे धीरे से उसने भाभी के बुरके को ऊपर खींचना शुरू किया। अंदर शब्बो ने केवल गाऊन और उसके नीचे घाघरा ही पहना था, वो भी बिना कच्छी के!

अब सलीम ने अपना हाथ भाभी की जांघों के बीच थोड़ा और अंदर किया और उसकी उंगलियाँ भाभीजान की जांघों को छूने लगी।

वो धीरे धीरे से भाभी की भोंस की गहराई पर उंगली फेरने लगा।

थोड़ी देर बाद, सलीम के सब्र का बांध टूट गया और वो तुरन्त ही अपने घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया।

भाभीजान की दोनों टांगों को उसने अपने कंधों पर लिया और उनके भोंसड़े को लबालब चाटने लगा।

शब्बो भी धीरे धीरे से मस्ती में आने लगी और अपनी उंगलियों से सलीम के बालों को सहारने लगी।

अब सलीम ने भाभीजान की किशमिश (clitoris) को अपने मुँह में लिया और जैसे नवजात बालक अपनी माँ की चुचूक चुसता है, वैसे ही वो शब्बो के दाने को चूसने लगा।

शौहर के प्यार न मिलने से बन्ज़र हो चुकी शब्बो की फ़ुद्दी भी बेटे जैसे देवर की जीभ का प्यार पा कर हरी-भरी होने लगी, धीरे धीरे से पानी छोड़ने लगी।

कुछ मिनट और बीते तो अपनी मुलायम जांघों के बीच शब्बो ने बेटे का सर जोर से दबाया, उसके बालों को जोर जोर से खींचने लगी, मानो सिग्नल दे रही हो कि ‘अब मै उस मुकाम के करीब हूँ तू तेजी से जीभ चला!’

सलीम वैसे तो अलहड़ था लेकिन इशारों ही इशारों में समझ गया और भूखी बिल्ली के माफिक तेजी से अपनी जीभ चलाने लगा।

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थोड़ी ही देर में शब्बो तो ‘हाय…अल्ला’ बोल के झड़ गई और थकी बेहाल होकर खटिया पर लिट कर हांफने लगी।

सलीम ने सोचा कि हाँ, अब देखता हूँ कि भाभी चुदवाने से कैसे मना करती है!

सलीम भी अब खटिया पर चढ़ गया और उसने अपनी भाभी शब्बो की टाँगों को हवा में उठा लिया।

इसकी वजह से शब्बो के भोसड़े के साथ उसका गाण्ड का छेद भी बिल्कुल साफ़ नज़र आ रहा था, अब वो गौर से अपने भाभी के पूरे बदन को मन भर के देखने लगा।

शब्बो ने शरमा कर अपने चहेरे को अपने हाथों से ढक लिया।

यह देख कर सलीम का लौड़ा तो पूरे जोर-शोर से एकदम लोहे के सरिये सा खड़ा हो गया।

सलीम ने ज्यादा देरी न करते हुए लौड़े को अपनी सगी भाभी की फ़ुद्दी के अंदर किया और थोड़ा ऊपर होकर चारपाई के दोनों ओर पैर रख लिए जैसे कोई टट्टी कर रहा हो, शब्बो की दोनों टांगें हवा में थी और सलीम का लण्ड चूत में जाने को बिल्कुल तैयार था।

सलीम ने अपनी कमर ऊपर करके लण्ड को चूत के अन्दर धकेला, भोसड़ी की चटाई करते वक्त लग सलीम के थूक और मुकाम के कारण निकले शब्बो के पानी के कारण उसका भोंसड़ा एकदम गीला व चुदने के लिए एकदम तैयार हो चुका था।

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जैसे ही सलीम ने अपनी कमर से थोड़ा जोर लगाया, उसका पूरा का पूरा लौड़ा, शब्बो की भोंस में समा गया और शब्बो मुख से आह्ह निकल पड़ी।

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