विधवा की अगन-2

(Vidhva Ki Agan-2)

सुनते ही मेरी सांस रुक गई…. हाय राम….रात को कहीं ये….? क्या चुद जाऊंगी….? पर मेरा एक मन कह रहा था कि शायद आज ऊपर वाले की जो इच्छा है….आज होने दो। मेरा मन बहुत ही चन्चल हो रहा था…. मैला भी बहुत हो रहा था…. मेरे जिस्म में एक आज एक तड़प थी, जो शेखर बढ़ा दी थी। मैंने पलट कर शेखर को देखा…. वो मेरे चूतड़ों की गोलाईयों को देखने में मग्न था। मेरे चेहरे पर पसीने की बून्दें छलक आई।

“क्या देख रहे हो….?” मैंने कांपते होठों से कहा।

“जी…. आप इस उमर में भी….लड़कियों की…. सॉरी….” वो कह कर झेंप गया।

“कहो…. क्या कह रहे थे…. लड़कियों की क्या….?” मेरी सां भी तेज हो उठी

वो मेरे पास आकर मेरे ब्लाऊज के बटन लगाने लगा। मेरी सांसे बढ़ गई…. छातियाँ फ़ूलने पिचकने लगी। वासना ने मेरे होश खो दिये…. काश शेखर मेरी छाती दबा दे….!

“सम्भालो अपने आप को मां जी….” पर मुझे कहाँ होश था। मैं धीरे से उसकी छाती से लग गई और उसका शरीर सहलाने लगी।

“मां जी….ये क्या कर रही है आप….!” उसने मेरे सर पर हाथ रख दिया और सहलाने लगा।

“शेखर विधवा की अगन कौन समझ समझ सकता है…. ये तन की जलन मुझे जला ना दे….” मेरा सीना फ़ूलने और पिचकने लगा था। मैंने अपनी छाती उसकी छाती से रगड़ दी।

“मां…. अपने पर काबू रखो…. मन को शांत रखो…. !” शेखर ने लड़खड़ाते स्वर में कहा। वह भी बहक रहा था। उसका लण्ड खड़ा हो चुका था। उसने मेरे बाल खींच दिये और मेरा चेहरा ऊपर उठा दिया। मेरे होंठ थरथराने लगे। शेखर अपना आपा खो बैठा। मेरे से लिपट पड़ा। उसके होंठ मेरे कांपते होठो से आ लगे। आग शान्त होने की बजाए और भड़क उठी। बाहर बादल गरज के साथ बरस रहे थे। उसके हाथ मेरे स्तनों को थाम चुके थे। ब्लाऊज आधा खुला हुआ था….मेरे बोबे बाहर छलक रहे थे। शखर के अन्दर आग सुलग उठी।

“मां…. मुझसे अब नहीं रहा जा रहा है….मेरा लण्ड चोदने के लिये बैचेन हो रहा है….” मेरे सामने ही उसने निर्लज्जता से अपने सारे कपड़े उतार डाले और नंगा हो गया। उसका मोटा और तगड़ा लण्ड देख कर मेरी चूत तड़प उठी। उसने अब मेरा ब्लाऊज उतार डाला और मेरे पेटीकोट का नाड़ा खींच दिया। मेरा पेटीकोट जमीन पर आ गिरा। उसका कड़कता हुआ लण्ड सीधा खड़ा तन्ना रहा था। मैं शरम के मारे सिमटी जा रही रही थी। पसीना पानी की तरह बह निकला…. अंततः मैं बिस्तर पर बैठ गई। उसका लण्ड मेरे मुख के करीब था। उसने और पास ला कर मुँह के पास सटा दिया। मैंने ऊपर देखा…. बाहर बिजली कड़की….शायद बरसात तेज हो चुकी थी।

“मां ….! ले लो लण्ड मुँह में ले लो….! चूस लो….! अपना मन भर लो…. !” उसने अपना लण्ड मेरे चेहरे पर बेशर्मी से रगड़ दिया। उसकी लण्ड की टोपी में से दो बूंद चिकनाई की छलक उठी थी।

“शेखर….! मेरे लाल….! ला दे दे….! ” मैं बैचेन हो उठी। मैंने उसके लण्ड की चमड़ी उपर की और लाल सुपाड़ा बाहर निकाल लिया। और अपने मुँह में रख लिया। मैं लण्ड चूसने में अभ्यस्त थी….उसका सुपाड़ा को मैंने प्यार स्र घुमा घुमा कर चूसा। मन की भड़ास निकालने लगी। इतना जवान लण्ड…. कड़क….बेहद तन्नाया हुआ…. शेखर सिसकारियाँ भरने लगा।

“हाय मां…. ! क्या मेरा निकाल दोगी पूरा….! ” मैंने थोड़ा और चूस कर कर छोड़ दिया फिर शेखर को अपनी नीची निगाहों से इशारा किया। शेखर मुझसे लिपट गया। मेरा नंगा जिस्म उसकी बाहों में झूल गया। मेरा जिस्म अब आग में जल रहा रहा था। मैं बेशर्मी से अपने आपको उससे लिपटा रही थी। उसने मुझे प्यार से बिस्तर पर लेटाया। मैंने शरमाते हुए अपने पांव खोल दिये। शेखर ने मेरी टांगे खींच कर अपने मुख के पास कर ली । मेरी चूत खिल उठी….चूत के पट खुल गये थे….अब कुछ भी अन्दर समेटने को वो तैयार थी। उसने अपने होंठ मेरी चूत से सटा दिये।

मेरी चूत गीली हो चुकी थी। उसकी लपलपाती जीभ ने मेरी चूत को एक बार में चाट लिया और जीभ से मेरी योनि-कलिका चाटने लगा। बीच बीच में उसकी लम्बी जीभ मेरी चूत में भी उतर जाती थी। मुझे ऐसा सुख बहुत सालों बाद मिला था। मेरी चूत मचल उठी ….और मैंने अंगड़ाई लेकर अपनी चूत को और ऊपर उभार दिया। मैं अपने मन की पूरा करना चाहती थी। उसके दोनों हाथ मेरे बोबे को मसल रहे थे। मुझे तन का सुख भरपूर मिल रहा था। मैं अपने अनुसार ही अपना बदन शेखर से मसलवा और चुसवा रही थी।

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“हाय रे….मेरे लाल…. ! तूने आज मेरे मन को जान लिया है…. ! हाय रे…. ! ला अब अब तेरे लण्ड को मस्त कर दूं…. !” मैंने उसे उठा कर सामने खड़ा कर दिया और उसका लण्ड अपने हाथो में ले लिया। मैंने उस पर खूब थूक लगाया और उसे मलने लगी….

“माँ चुदवा लो अब…. ! मुझसे नहीं रहा है…. ! देखो आपकी चूत भी कैसे फ़ड़क रही है…. !” मेरी बैचेन चूत का हाल उससे छुपा नहीं था।

अब मैं उसके लण्ड को मुठ मार रही थी।

“हाय क्या कर रही हो….! मेरा निकल जायेगा ना….!” पर मैंने उसे ओर जोर से मुठ मारने लगी।

“निकल जाने दे ना….! निकाल दे अब…. ! कर दे बरसात…. !” मुझे उसके लण्ड को झड़ते हुए देखना था और उसका स्वादिष्ट वीर्य का भी स्वाद लेना था।

उसका शरीर ऐठने लगा मैं समझ गई थी कि अब शेखर झड़ने वाला है….उसके लण्ड को मैंने और जोर से दबा कर मुठ मारी और उसका लण्ड अपने मुँह में डाल लिया। और लण्ड को जोर से दबा दिया।

“हाय मांऽऽऽऽऽ…. ! मेरा निकला…. ! गया मैं तो…. !” उसकी पिचकारी छूट पड़ी…. उसका वीर्य मेरे मुख में भरने लगा…. फिर से एक बार पुरानी यादे ताज़ा हो गई। सारा वीर्य मैंने स्वाद ले लेकर पी लिया।

“ये क्या…. ! आपने तो मेरा माल निकाल ही दिया…. !”

“तुमने कहा था ना…. ! अपना मन भर लो…. ! वीर्य का मजा कुछ ओर ही होता है…. ! फिर रात भर तो तुम यही हो ना…. ! प्लीज…. ऐसा मौका पता नहीं फिर मिले ना मिले….!” मैंने अब उसे समझाया।